पुणे के साहित्यकारों की दिवाली सीख: खुशी अपने तक न रखें, दूसरों तक पहुंचाएं
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पुणे के तीन साहित्यकारों ने बताया कि वे दिवाली कैसे मनाते हैं: दिवाली अंकों के पढ़ने से लेकर जरूरतमंदों की मदद और अकेले लोगों के साथ वक्त बिताने तक।
दिवाली का नाम आते ही दीयों की रोशनी, रंगोली, पकवानों की खुशबू और रिश्तेदारों से मुलाकात याद आती है। पुणे के साहित्यकारों के लिए यह त्योहार इतने तक सीमित नहीं है। उसमें साहित्य, संस्कृति और समाज की समझ भी जुड़ी होती है। दिवाली अंक पढ़ना, साहित्य का पकवान बांटना, परिवार के साथ वक्त बिताना, जरूरतमंदों की मदद करना और बदलते दौर में त्योहार मनाने के नए तरीके, इन सबके जरिए उन्होंने दिवाली के मायने बताए हैं। उनका कहना है कि दिवाली की असली खुशी अपने तक रखने में नहीं, दूसरों तक पहुंचाने में है।
साहित्यकार चंद्रलेखा बेलसरे के मुताबिक साहित्यकारों के लिए दिवाली सिर्फ दीपोत्सव नहीं, साहित्य का उत्सव होती है। दिवाली अंकों की तैयारी जून से शुरू हो जाती है और दशहरे तक अंकों का काम पूरा करके उन्हें पाठकों तक पहुंचाने की भागदौड़ रहती है। वे रिश्तेदारों और दोस्तों को पकवान के साथ दिवाली अंक के रूप में साहित्य का पकवान भी भेंट करती हैं और यह परंपरा उन्होंने निभाई है। कहानी, कविता और सामाजिक, राजनीतिक व शैक्षणिक विषयों से भरे इन अंकों को पढ़ना पाठकों के लिए खास मौका होता है। साथ ही वे गांव के खेत मजदूरों, जरूरतमंद परिवारों और उनके बच्चों को कपड़े, पकवान और खाने की चीजें देकर उनके चेहरे पर खुशी लाने की कोशिश करती हैं। उनका कहना है कि पटाखों पर खर्च करने की बजाय वही पैसा जरूरतमंदों की मदद में लगाने से ज्यादा संतोष मिलता है।
मिलिंद जोशी के मुताबिक संवाद के साधन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ने से आमने-सामने की मुलाकातें कम हो गई हैं। इसलिए त्योहार के बहाने एक-दूसरे के घर जाने, बातचीत करने और खुशी बांटने की परंपरा को फिर से निभाने की जरूरत है। वे एक साल दिवाली पर घूमने बाहर जाते हैं और अगले साल घर पर रहकर परिवार के साथ त्योहार मनाते हैं। घूमने के मुकाबले उन्हें घर में पकवान बनाना, सजावट करना और त्योहार की तैयारी में शामिल होना ज्यादा पसंद है। पुणे में दिवाली की सुबह, दिवाली की दोपहर और दिवाली की शाम जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की नई सोच जड़ पकड़ रही है। उनका संदेश है कि बदलते वक्त की इन बातों को अपनाते हुए पुरानी परंपराओं का अपनापन और आमने-सामने मिलने की गर्मजोशी बचाए रखनी चाहिए।
साहित्यकार शैफाली वैद्य दिवाली को इंसानियत और संवेदनशीलता की नजर से देखती हैं। नौकरी या पढ़ाई के लिए परिवार से दूर रहने वालों को दिवाली पर अकेलापन ज्यादा चुभता है। मुंबई में करियर की शुरुआत में उन्होंने खुद यह अकेलापन झेला था, इसलिए ऐसे लोगों को त्योहार की खुशी में शामिल करने की अहमियत वे समझती हैं। उनके मुताबिक अकेले रहने वाले बुजुर्गों, काम के सिलसिले में घर से दूर रह रहे नौजवानों और त्योहार में भी काम करने वाले कर्मचारियों को वक्त, अपनापन और एक छोटा सा तोहफा देना चाहिए। महंगे तोहफों से ज्यादा जरूरी है एक-दूसरे के साथ बिताए पल। बुजुर्गों की यादें सुनना, बच्चों को पारंपरिक खेल और किताबें देना, स्थानीय कारीगरों की बनाई चीजें भेंट करना और घर में काम करने वाले कर्मचारियों को बोनस व छुट्टी देना, इन सबसे भी दिवाली की खुशी बढ़ाई जा सकती है।
इन साहित्यकारों की बातों से दिवाली के कई मायने सामने आते हैं। किसी के लिए यह साहित्य का मौका है, किसी के लिए रिश्ते जोड़ने का, तो किसी के लिए जरूरतमंद की जिंदगी में खुशी का दीया जलाने का बहाना। इन सभी विचारों में एक बात साझा है: त्योहार मनाते वक्त इंसानियत, अपनापन और सामाजिक जिम्मेदारी को बनाए रखना।
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