गुरूवार, 29 अक्टूबर 2026

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विश्व स्ट्रोक दिवस पर मुंबई के डॉक्टर बोले, स्ट्रोक में हर मिनट कीमती, तुरंत इलाज जरूरी

विश्व स्ट्रोक दिवस पर मुंबई के डॉक्टर बोले, स्ट्रोक में हर मिनट कीमती, तुरंत इलाज जरूरी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सेहत PT24 स्वास्थ्य डेस्क

परेल के ग्लेनीगल्स अस्पताल में प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉक्टरों ने वक्त पर इलाज और लक्षणों की पहचान पर जोर दिया।

विश्व स्ट्रोक दिवस यानी 29 अक्टूबर के मौके पर बुधवार दोपहर परेल के ग्लेनीगल्स अस्पताल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। इसमें बड़े डॉक्टरों का सबसे ज्यादा जोर इस बात पर रहा कि स्ट्रोक के मामले में रफ्तार ही सब कुछ है। उनके मुताबिक ज्यादातर बीमारियों में वक्त पर इलाज से नतीजे बेहतर होते हैं, लेकिन स्ट्रोक में यह बिल्कुल जरूरी है।

तीसरी मंजिल के भरे हुए ऑडिटोरियम में डॉक्टरों की टीम ने कहा, "स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हर मिनट मायने रखता है। हमें कम उम्र के लोगों में और कभी-कभी बच्चों में भी स्ट्रोक दिखता है। यह गर्भ से कब्र तक का मामला है।" डॉक्टरों ने यह भी कहा कि उम्र बढ़ने के साथ स्ट्रोक ज्यादा आम हो जाता है।

डॉक्टरों ने यह भी कहा, "वक्त पर जांच, स्पेशलाइज्ड स्ट्रोक केयर और रिहैबिलिटेशन जान बचाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि इनसे लंबे समय की विकलांगता कम होती है।" बताया गया कि स्ट्रोक के 4 से 4.5 घंटे के भीतर इलाज शुरू हो जाए तो अच्छे नतीजे मिलते हैं। 24 घंटे के भीतर किया गया इलाज भी फायदेमंद हो सकता है।

अस्पताल में न्यूरोलॉजी, स्ट्रोक और न्यूरोक्रिटिकल केयर के रीजनल डायरेक्टर डॉ. शिरीष हस्तक ने कहा, "आज विश्व स्ट्रोक दिवस है, लेकिन अगर इसे स्ट्रोक को समझने या स्ट्रोक रोकने का दिवस कहा जाए तो मुझे ज्यादा खुशी होगी।" उन्होंने एक स्ट्रोक सर्वाइवर डॉ. (पीएचडी) कृष्णा नाइक का उदाहरण दिया। नाइक ने पहचान लिया कि अचानक शुरू हुए लक्षण स्ट्रोक का इशारा हो सकते हैं और वे वक्त पर अस्पताल पहुंच गए, जिससे उनका इलाज बहुत जल्दी शुरू हो सका।

अस्पताल पहुंचते ही कोड स्ट्रोक चालू किया गया और 10 मिनट में उनका ब्रेन एमआरआई हो गया। इसके बाद डॉ. हस्तक और उनकी टीम ने उन्हें देखा और अगले 10 मिनट में थक्का घोलने वाली दवा दी गई। आधे घंटे में उनके हाथ और पैर की ताकत लौट आई। कल वे कॉन्फ्रेंस में मुस्कुराते हुए और लोगों से हाथ मिलाते हुए घूम रहे थे।

इंटरवेंशनल न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरोसर्जन डॉ. नितिन डांगे ने कहा, "स्ट्रोक का इलाज मेरा जुनून है। जागरूकता ही सब कुछ है। अगर आपको जरा भी शक हो कि कुछ गड़बड़ है, तो अस्पताल की ओर भागिए। घर पर तरह-तरह के इलाज मत आजमाइए।" अस्पताल में न्यूरोलॉजी, स्ट्रोक और न्यूरोक्रिटिकल केयर के डायरेक्टर डॉ. पंकज अग्रवाल ने कहा कि असली संदेश यह है कि "स्ट्रोक = वक्त = दिमाग। स्ट्रोक कई चेहरों वाला शैतान है।"

कॉन्फ्रेंस में कई स्ट्रोक सर्वाइवर्स ने अपनी कहानी सुनाई। इनमें प्रवीण खटू, सतीश निकम, डॉ. (पीएचडी) कृष्णा नाइक और तेजल भट्ट शामिल थे। खटू का दायां हाथ अपने आप खिंचने और हिलने लगा और उन्हें अलग-अलग रंग दिखने लगे, तब वे अस्पताल भागे। नाइक के मुताबिक परेल के एक नुक्कड़ पर उन्हें हल्का चक्कर आया और हाथ कमजोर पड़ गया, तब उन्होंने लक्षण पहचाने और अस्पताल पहुंचे।

निकम ने बताया कि उनका इलाज अनरप्चर्ड एन्यूरिज्म का हुआ और वक्त पर कैरोटिड स्टेंटिंग की गई। तेजल भट्ट के पति आदित ने बताया कि पत्नी के बाएं हाथ में कमजोरी आई, संवेदना नहीं रही और तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, तो वे घाटकोपर के अपने घर से परेल के ग्लेनीगल्स अस्पताल तक दुआओं के सहारे उड़ते हुए पहुंचे। बताया गया कि तेज इलाज से सभी के नतीजे अच्छे रहे और सर्वाइवर्स खुद को "फर्स्ट क्लास" महसूस कर रहे थे।

कंसल्टिंग न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. संगीता रावत ने बचाव पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अच्छा संतुलित खानपान, कसरत, नींद की क्वालिटी और मात्रा, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण और निगरानी, और तंबाकू व धूम्रपान को ना कहना जरूरी है। रावत ने सवाल किया, "मेरे लिए तो बात यह है कि किसी को स्ट्रोक होना ही क्यों चाहिए?"

कंसल्टिंग न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. कुशल भाटिया ने कहा कि "स्ट्रोक सिर्फ मरीज को नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है।" कंसल्टिंग न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. मयूर घरत ने कहा, "कुछ लोगों को 'मिनी स्ट्रोक' होता है, जिसमें एक-दो लक्षण दिखते हैं और कुछ मिनट में ठीक हो जाते हैं। फिर भी इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और ऐसा क्यों हुआ, यह जांचना बहुत जरूरी है।"

कॉन्फ्रेंस में स्ट्रोक के लक्षणों की पहचान के लिए BE FAST नाम का संक्षिप्त रूप बताया गया, जो अपने नाम से ही फुर्ती की अहमियत बताता है। इसका हर अक्षर एक लक्षण की ओर इशारा करता है। B यानी बैलेंस: अचानक संतुलन या तालमेल बिगड़ना। E यानी आंखें: एक या दोनों आंखों की रोशनी अचानक चली जाना। F यानी चेहरा: चेहरे के एक तरफ का लटकना या असमान होना। A यानी बाजू: अचानक हाथ में कमजोरी या शरीर के एक तरफ कमजोरी। S यानी बोली: बोलने, शब्द ढूंढने या अपनी बात कहने में दिक्कत। T यानी टाइम: तुरंत एम्बुलेंस बुलाना और सबसे नजदीकी स्ट्रोक-रेडी सेंटर पहुंचना।

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