सरकारी अस्पतालों की दवाओं की जांच अब ड्रग डिटेक्शन मशीन से, दो-तीन मिनट में नतीजा
सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के आठ विभागों में ड्रग डिटेक्शन मशीनें लगाई हैं। संदिग्ध नमूने आगे लैब में भेजे जाएंगे।
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सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले हर मरीज को अच्छी और भरोसेमंद दवाइयां मिलें, इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने राज्य में आधुनिक 'ड्रग डिटेक्शन मशीन' की व्यवस्था शुरू कर दी है। राज्य के आठ विभागों में ये मशीनें पहुंचा दी गई हैं। इनसे दवाओं के नमूनों की शुरुआती जांच सिर्फ दो से तीन मिनट में हो सकेगी। जांच में जो नमूने शक के दायरे में आएंगे, उन्हें आगे लैब में परखने के लिए भेजा जाएगा। यह जानकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने दी। वे आरोग्य भवन में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे। इस मौके पर सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त डॉ. संजय काटकर और डॉ. सुनील भोकरे मौजूद थे। मशीन का डेमो भी दिखाया गया। यह मशीन नोबेल विजेता भारतीय वैज्ञानिक सर सी. व्ही. रमण के नाम से जानी जाने वाली 'रमण इफेक्ट' तकनीक पर चलती है।
अब तक दवा की क्वालिटी की जांच तभी होती थी जब कोई शिकायत आती थी। अब सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं की दवाओं के नमूनों की नियमित जांच होगी, और अचानक भी जांच की जाएगी। दवा की खरीद से लेकर अस्पताल तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया में क्वालिटी कंट्रोल, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना इस पहल का मुख्य मकसद है। मंत्री आबिटकर ने कहा, "सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले लोगों को अच्छी क्वालिटी की दवाएं मिलना बेहद जरूरी है। दवाओं की क्वालिटी के लिए सिर्फ शिकायतों पर निर्भर न रहकर नियमित और अचानक जांच की व्यवस्था खड़ी की गई है। आधुनिक तकनीक की मदद से संदिग्ध दवाओं के नमूने वक्त रहते पहचानकर उन्हें लैब में परखा जा सकेगा। इससे दवा खरीद और सप्लाई व्यवस्था पर ज्यादा असरदार निगरानी रखी जा सकेगी।"
आठों विभागों में दो-दो सदस्यों की अलग टीमें बनाई गई हैं। यानी कुल 16 अधिकारी दवाओं की जांच का काम संभालेंगे। सभी अधिकारियों को मशीन चलाने की ट्रेनिंग दी जा चुकी है और ये टीमें आयुक्त के मार्गदर्शन में काम करेंगी। हर महीने ये टीमें बिना किसी तय क्रम के, यानी रैंडम तरीके से दवाओं के नमूने इकट्ठा करके जांच करेंगी। इसमें जिला अस्पतालों, महिला अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के तहत आने वाली दूसरी स्वास्थ्य संस्थाओं की दवाएं शामिल होंगी। मेडिकल सामान खरीद प्राधिकरण के जरिए होने वाली सप्लाई, जिला स्तर की व्यवस्था से मिलने वाली दवाएं, और स्थानीय फंड और स्थानीय खरीद से ली गई दवाओं की भी जांच होगी। एक मशीन की कीमत करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपये है। इससे शुरुआती रिपोर्ट जल्दी मिल जाती है, इसलिए अलग-अलग स्वास्थ्य संस्थाओं की दवाओं की जांच ज्यादा तेजी से हो सकेगी।
मशीन से होने वाली जांच शुरुआती स्तर की है। किसी नमूने में नेगेटिव या संदिग्ध नतीजा दिखा, तो उसे दर्ज करके नमूना सरकार से मान्यता प्राप्त बाहरी लैब में भेजा जाएगा। विभाग के मुताबिक राज्य में इस जांच के लिए 12 मान्यता प्राप्त लैब हैं। नमूना भेजने के करीब आठ दिन में रिपोर्ट मिलेगी। टेंडर में जमा किए गए दवा के नमूनों और असल में सप्लाई की गई दवाओं में कोई फर्क हो, तो वह भी इस जांच से पकड़ में आ सकता है। लैब की जांच में दवा की क्वालिटी में कमी, नकलीपन या नियमों के खिलाफ कोई बात मिली, तो मौजूदा नियमों के हिसाब से आगे कार्रवाई होगी। दवाओं पर नियामक कार्रवाई की जिम्मेदारी अन्न और औषध प्रशासन की है, फिर भी संदिग्ध नमूनों की जानकारी उस तक पहुंचाकर जरूरी कार्रवाई के लिए पीछे लगे रहने का काम सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग करेगा। फिलहाल यह जांच सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अस्पतालों के लिए खरीदी गई दवाओं तक ही सीमित रहेगी। गैर-सरकारी अस्पतालों से जुड़े मामले अन्न और औषध प्रशासन के दायरे में आते हैं।
विभाग ने बताया कि इस सिस्टम का उपकरण 'थर्मो साइंटिफिक' कंपनी का है और अलग-अलग देशों की नियामक एजेंसियां दवाओं की जांच और नकली दवाएं पकड़ने के लिए ऐसे उपकरण इस्तेमाल करती हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, नाइजीरिया, केन्या, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब समेत करीब 50 देशों में इस तरह के उपकरण इस्तेमाल होने की जानकारी दी गई।
राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के और करीब और बेहतर बनाने के लिए आरोग्य संवाद यात्रा भी शुरू की गई है। गांव और बस्ती स्तर के लोगों से बात करके देखा जाएगा कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का असल में कितना फायदा मिल रहा है, मौजूदा सुविधाओं में क्या कमियां हैं और कौन से सुधार जरूरी हैं। राज्य में करीब 1 हजार 970 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 10 हजार 846 उपकेंद्र विकसित करने की योजना है। वहां दवाएं, इंजेक्शन और डे-केयर सुविधाओं समेत जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने की कोशिश है।
स्वास्थ्य तंत्र में स्टाफ बढ़ाने के लिए 4 नवंबर को यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान में 1 हजार 440 डॉक्टरों को एक साथ नियुक्ति पत्र देने की योजना है। इसके अलावा 1 हजार 900 कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है और परीक्षा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अगले आठ से पंद्रह दिन में नियुक्ति पत्र दिए जाने की उम्मीद है। इन नियुक्तियों से दुर्गम, आदिवासी, कोकण और ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत होंगी। स्वास्थ्य कर्मचारियों की मांगों को देखते हुए 15 हजार कर्मचारियों को अतिरिक्त पदों पर समायोजित करने का फैसला भी लिया गया है। 15 अगस्त को 125 स्वास्थ्य संस्थाओं का लोकार्पण हो चुका है और 125 और संस्थाओं का लोकार्पण होना है।
तालुका और विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से बनी आरोग्यवर्धिनी समितियों के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित समीक्षा होगी। विधायक हर तीन महीने में स्वास्थ्य सुविधाओं का मुआयना करें, जबकि मंत्रालय स्तर पर हर छह महीने में समीक्षा करके जरूरी सुधार तय किए जाएंगे। ग्राम स्तर की जनआरोग्य समितियों, जलापूर्ति और स्वच्छता समितियों और अलग-अलग स्वास्थ्य संस्थाओं से जुड़ी समितियों को ऑनलाइन जोड़ने का काम भी चल रहा है। इससे लोग स्वास्थ्य सेवाओं की दिक्कतों की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। इस साल 10 लाख जनआरोग्य समिति सदस्य जोड़ने का लक्ष्य है और विभाग के मुताबिक अब तक करीब साढ़े छह से सात लाख सदस्य जुड़ चुके हैं।
महात्मा फुले जनआरोग्य योजना में महंगी पेट स्कैन सुविधा को शामिल करने की योजना है, और स्वास्थ्य मंत्री ने साफ किया कि इस सुविधा के लिए अस्पताल मरीजों से कोई पैसा न लें। योजना के अमल में गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई की जा चुकी है। दवा खरीद समेत विभाग के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ई-नाइन सिस्टम खड़ा करने का काम भी चल रहा है। दवाओं की क्वालिटी, स्वास्थ्य संस्थाओं का बुनियादी ढांचा, डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की उपलब्धता और तकनीक की मदद से होने वाली निगरानी, इन सबमें तालमेल बिठाकर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को ज्यादा जवाबदेह बनाने पर जोर है। स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने कहा कि लोगों को अच्छा इलाज मिले, सेहत पर अपनी जेब से होने वाला खर्च घटे और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा और मजबूत हो, इसके लिए विभाग कई उपाय लागू कर रहा है।
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