सूखे में चारे के लिए जिला योजना निधि का कम से कम 5 फीसदी रखा, राज्य से बाहर ले जाने पर रोक
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महाराष्ट्र सरकार ने सूखे के बीच चारे की कमी से निपटने के लिए जिला वार्षिक योजना निधि का कम से कम पांच फीसदी चारा योजनाओं के लिए तय किया है।
महाराष्ट्र सरकार ने सूखे के हालात में चारे की किल्लत दूर करने के लिए जिला वार्षिक योजना निधि का कम से कम पांच फीसदी हिस्सा चारे से जुड़ी योजनाओं के लिए अलग रखा है। साथ ही चारे के इस्तेमाल और उसकी आवाजाही पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं।
पशुपालन, दुग्ध विकास और मत्स्य व्यवसाय विभाग ने शुक्रवार को एक सरकारी आदेश (GR) जारी किया। इसमें जिला कलेक्टरों को कहा गया है कि वे चारा बैंक बनाएं, सूखे चारे के लिए संदर्भ मूल्य की ऊपरी सीमा तय करें और चारा छावनियों में बायोमेट्रिक ट्रैकिंग शुरू करें।
ये कदम अपर मुख्य सचिव (राजस्व) की अध्यक्षता वाले अध्ययन समूह की सिफारिशों के बाद उठाए गए हैं। कम बारिश से पैदा हुई चारे की कमी से निपटने के उपाय सुझाने के लिए यह समूह बनाया गया था। सूखा प्रबंधन पर कैबिनेट की उप-समिति ने हाल की बैठक में समूह की रिपोर्ट मंजूर कर ली।
राज्य सरकार ने 2026 के खरीफ सीजन में Trigger-1 और Trigger-2 लागू होने वाले 304 तहसीलों में सूखा घोषित किया है। अल नीनो के असर की आशंका को देखते हुए जल संरक्षण के कामों में तालमेल के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय टास्क फोर्स भी बनाई गई है।
GR के मुताबिक जिला कलेक्टर संरक्षक मंत्रियों की मंजूरी से जिला वार्षिक योजना निधि का कम से कम पांच फीसदी देंगे। यह पैसा चारे का उत्पादन बढ़ाने, मौजूदा चारे को बचाने और बेहतर करने, और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की योजनाओं पर खर्च होगा।
कृषि विभाग को रबी सीजन के लिए चारे के बीज पर्याप्त उपलब्ध कराने को कहा गया है। किसानों और पशुपालकों को कम पानी में उगने वाली और एक से ज्यादा बार काटी जा सकने वाली चारा फसलें लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
चारे की खेती के लिए कृषि विश्वविद्यालयों, बीज गुणन केंद्रों, कृषि निगमों और पशुपालन विभाग की जमीन इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है। आदेश के मुताबिक वन भूमि पर मिलने वाला चारा और घास भी काटकर रखी जाएगी और जरूरत पड़ने पर पशुपालकों को बांटी जाएगी। कटाई के बाद खाली खेतों में चारा उगाने में कलेक्टर मदद करेंगे और चारा बैंक बनाने के लिए किसान उत्पादक संगठनों, किसान उत्पादक कंपनियों और स्वयंसेवी समूहों से तालमेल करेंगे।
GR में सूखे चारे के लिए ढुलाई खर्च छोड़कर 12 रुपये प्रति किलो और साइलेज के लिए 8 रुपये प्रति किलो तक की संदर्भ मूल्य सीमा रखी गई है। खरीद इन्हीं सीमाओं के भीतर होगी, और ज्यादा समय तक टिकने की वजह से सूखे चारे को तरजीह दी जाएगी।
सूखे के दौरान चारे का इस्तेमाल पशुओं के खाने के अलावा किसी और काम में नहीं हो सकेगा, जैसे पैकेजिंग, बायोफ्यूल और बिजली बनाना। कलेक्टरों को महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित सीमावर्ती इलाकों से पड़ोसी राज्यों में चारा ले जाने पर कानूनी रोक लगाने को भी कहा गया है। स्थानीय आपूर्ति कम पड़ी तो संभागीय आयुक्त, पशुपालन अधिकारी और जिला कलेक्टर मिलकर आसपास के जिलों से चारा जुटाएंगे।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सरकार राज्य स्तर पर "Chara Chawani Monitoring and Management System" बनाएगी। इसमें चारे की मांग और उपलब्धता, चारा छावनियों का कामकाज, पशुओं का रिकॉर्ड, रोज की हाजिरी, पशु चिकित्सा सेवाएं और खर्च दर्ज होंगे। चारा छावनियों में CCTV निगरानी और बायोमेट्रिक या QR कोड से हाजिरी जरूरी होगी, और पशुओं का सत्यापन नेशनल डिजिटल लाइवस्टॉक मिशन के भारत पशुधन सिस्टम में दर्ज रिकॉर्ड से किया जाएगा।
जिला स्तर की सूखा प्रबंधन समितियों का नए सिरे से गठन होगा। संरक्षक मंत्री समीक्षा समितियों के प्रमुख होंगे और जिला कलेक्टर अमल की देखरेख करने वाली कार्यकारी समितियों की अगुवाई करेंगे। किसी राजस्व मंडल में चारा छावनी खोलना वहां के पशुओं की संख्या और चारे की उपलब्धता पर निर्भर रहेगा।
आदेश में हाइड्रोपोनिक्स और अजोला जैसे वैकल्पिक चारा स्रोतों का ज्यादा इस्तेमाल करने की बात है। पशुपालकों को चारा संरक्षण और प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग देने का भी प्रस्ताव है। सरकार ने चारा उत्पादन, उपकरण, और चारा छावनियों में पानी की सप्लाई और साफ-सफाई के लिए कंपनियों के CSR फंड के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दिया है।
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