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गाड़ी बेच दी फिर भी चालान और पुलिस पूछताछ का डर, ट्रांसफर अधूरा तो पुराना मालिक फंसेगा

गाड़ी का ओनरशिप ट्रांसफर अधूरा रह जाए तो बेचने वाले के नाम पर चालान, नोटिस और पुलिस पूछताछ आ सकती है। वेस्टर्न इंडिया ऑटोमोबाइल्स एसोसिएशन ने इसके लिए सिफारिशें तैयार की हैं।

सेकंड हैंड गाड़ी बेचकर चाबी खरीदार को थमा देने से बेचने वाले की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। अगर ओनरशिप ट्रांसफर पूरा नहीं हुआ, तो चाबी देने के काफी समय बाद भी पुराने मालिक के पास ट्रैफिक चालान, सरकारी नोटिस और पुलिस की पूछताछ आ सकती है। गाड़ी किसी हादसे या अपराध से जुड़ी निकले तो जांच करने वाले सबसे पहले रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) पर दर्ज नाम तक पहुंचते हैं। फिर बेचने वाले को ही साबित करना पड़ता है कि गाड़ी कब दूसरे के हाथ में गई।

इन खतरों को देखते हुए वेस्टर्न इंडिया ऑटोमोबाइल्स एसोसिएशन (WIAA) ने सिफारिशों की एक सूची बनाई है। वह इसे रीजनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर को सौंपने की तैयारी में है। इसमें तय समय में ऑनलाइन ट्रांसफर, खरीदार की पहचान की जांच, डिजिटल ट्रैकिंग और RTO व पुलिस के बीच बेहतर तालमेल की बातें शामिल हैं।

WIAA के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नितिन दोसा ने कहा, "RTO को तय समय में ऑनलाइन ओनरशिप ट्रांसफर, खरीदार की पहचान की सख्त जांच और पुलिस के साथ बेहतर तालमेल पक्का करना चाहिए, ताकि गाड़ियों का आपराधिक गतिविधियों में गलत इस्तेमाल रोका जा सके।" उन्होंने यह भी कहा, "हम महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्ट कमिश्नर से अपील करेंगे कि साफ गाइडलाइन और ट्रैकिंग सिस्टम लाया जाए, जो ट्रांसफर अटका होने पर असली बेचने वालों को गैर-जरूरी कानूनी झंझट से बचाए।"

WIAA की पहली मांग है कि ट्रांसफर तय समय में हो। एसोसिएशन चाहती है कि ऑनलाइन प्रक्रिया पारदर्शी हो, अर्जी की फौरन रसीद मिले और मालिकाना रिकॉर्ड तय डेडलाइन में अपडेट हो। बेचने वाला अर्जी पूरी होने तक उसे ट्रैक कर सके, और देरी हो तो उसका कोई इलाज भी हो।

दूसरी मांग खरीदार की जांच और हर सौदे के दस्तावेज की है। बेचने वाले को खरीदार की पहचान और पता जांचना चाहिए, जरूरी कागजों की कॉपी रखनी चाहिए, और सौदे का साफ रिकॉर्ड रखना चाहिए, जिसमें बिक्री की रसीद, पेमेंट की जानकारी और गाड़ी सौंपने की तारीख हो। जो खरीदार पहचान का पक्का सबूत न दे सके, उससे सावधान रहने की सलाह है, खासकर सड़क किनारे के सेकंड हैंड गाड़ी डीलरों के मामले में।

तीसरी मांग RTO और पुलिस के रिकॉर्ड जोड़ने की है। गाड़ी किसी दर्ज अपराध से जुड़े तो एक सुरक्षित सिस्टम से अधिकारियों को रजिस्टर्ड मालिक, खरीदार और ट्रांसफर की दर्ज तारीख पता चल जानी चाहिए। चौथी मांग यह है कि ट्रांसफर अटका रहने पर बेचने वाले को बचाया जाए। कई बार जरूरी कागज जमा करने के बाद भी अर्जी पेंडिंग रहती है और सरकारी रिकॉर्ड में पुराने मालिक का नाम बना रहता है। WIAA ऐसा सिस्टम चाहती है जो बिक्री और उसकी प्रगति दर्ज करे, ताकि बेचने वाला दिखा सके कि उसने सारी औपचारिकताएं पूरी कर दी थीं।

दोसा ने कहा, "गाड़ी खरीदना या बेचना ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी भी पक्ष पर टाले जा सकने वाला जोखिम आ जाए। हमें ऐसा सिस्टम चाहिए जो असली बेचने वालों को बचाए, खरीदारों से उनकी जिम्मेदारी निभवाए और मालिकाना रिकॉर्ड को भरोसेमंद और ट्रेस करने लायक बनाए।"

पांचवीं मांग अपराध में गाड़ी के गलत इस्तेमाल पर रोक की है। WIAA रीजनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर को औपचारिक अर्जी देगी, जिसमें खरीदार और बेचने वाले की जिम्मेदारियां बताई जाएंगी और आसान ट्रांसफर, विभागों के बीच मजबूत तालमेल और भरोसेमंद मालिकाना रिकॉर्ड मांगे जाएंगे।

क्रिमिनल लॉ की प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट राजदीप लाहिड़ी ने कानूनी पहलू समझाया। उनके मुताबिक मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 की धारा 50 के तहत बिक्री की सूचना देने और ट्रांसफर पूरा करने की जिम्मेदारी बेचने वाले और खरीदार, दोनों की है। एक ही राज्य में रजिस्टर्ड गाड़ियों में बेचने वाले के पास आमतौर पर सूचना देने के लिए 14 दिन होते हैं, जबकि खरीदार के पास अपने नाम रजिस्ट्रेशन की अर्जी देने के लिए 30 दिन।

लाहिड़ी ने कहा कि नारकोटिक्स, गाड़ी की मदद से डकैती और रेप जैसे मामलों की जांच में ऐसी गाड़ियां सामने आ सकती हैं जो तेजी से या बिना सही कागजों के हाथ बदलती हैं। उनके मुताबिक अपराधी कुछ समय के लिए ली गई सेकंड हैंड दोपहिया या चारपहिया गाड़ी इस्तेमाल करके अपराध के बाद उसे छोड़ सकते हैं। उन्होंने कहा, "जब इन समयसीमाओं को अनदेखा किया जाता है और मालिकाना हक दर्ज नहीं होता, क्योंकि 'बहुत वक्त लगता है' या गाड़ी अस्थायी मकसद से खरीदी गई थी, तो रजिस्टर्ड मालिक का गंभीर मुसीबत में फंसना तय है।"

उन्होंने आगे कहा, "जब गाड़ियां पकड़ी जाती हैं तो पुलिस आखिरी ज्ञात कानूनी मालिक तक पहुंचती है। कैश में सौदे, छोटी बिक्री या मेडिकल इमरजेंसी का हवाला देने से बड़ा अपराध होने पर रजिस्टर्ड मालिक फौरन बरी नहीं हो जाता। सौदा अनौपचारिक तौर पर हो गया, इसका मतलब यह नहीं कि मालिकाना हक खत्म हो गया। उसे RTO के जरिए आधिकारिक तौर पर दर्ज और ट्रांसफर कराना ही होगा। बेकसूर मालिकों को फंसने से बचाने के लिए हर ट्रांसफर में सख्त पालन और सख्त कार्रवाई जरूरी है।"

लाहिड़ी ने यह भी कहा कि चुनावी सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) जैसी प्रक्रिया गाड़ियों के लिए भी होनी चाहिए। उनके मुताबिक ऐसी कवायद से मालिकाना रिकॉर्ड की जांच हो सकती है, ऐसे मालिक पहचाने जा सकते हैं जिनका पता नहीं चलता, और छोड़ी हुई या लावारिस गाड़ियां सिस्टम से हटाई जा सकती हैं। इससे सिस्टम की खामियां भरेंगी, जवाबदेही बढ़ेगी और अपराध में गाड़ियों का गलत इस्तेमाल रुकेगा।

महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्ट कमिश्नर राजेश नार्वेकर से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

सेकंड हैंड गाड़ी खरीदने वालों के लिए दोसा की सिफारिशों पर आधारित सलाह यह है: तय समय में रजिस्टरिंग अथॉरिटी को ट्रांसफर की सूचना दें (धारा 50 के तहत एक ही राज्य में खरीदार को 30 दिन में); बेचने वाले की पहचान RC से मिलाएं; गाड़ी के चेसिस और इंजन नंबर कागजों से मिलाएं; पेंडिंग चालान, बकाया लोन या हाइपोथिकेशन और पुलिस केस देखें; RC, इंश्योरेंस, पॉल्यूशन सर्टिफिकेट और भरे हुए ट्रांसफर कागज लें; रसीद और पेमेंट रिकॉर्ड रखें; इंश्योरेंस अपने नाम कराएं। सड़क किनारे के डीलरों से सावधान रहें। कागज गायब या अस्पष्ट हों, रजिस्ट्रेशन डिटेल मेल न खाएं, तो गाड़ी न खरीदें। ट्रांसफर पूरा किए बिना लंबे समय तक गाड़ी न चलाएं, बिना रसीद के पैसे न दें, और "सिर्फ अस्थायी इस्तेमाल के लिए" वाली समझ पर बिना औपचारिकता पूरी किए गाड़ी न लें।

बेचने वालों के लिए सलाह: आधार, PAN या दूसरे वैध पहचान पत्र से खरीदार की पहचान और पता जांचें और कॉपी रखें; खरीदार की डिटेल, कीमत, पेमेंट और गाड़ी सौंपने की तारीख व समय के साथ लिखित रसीद या एग्रीमेंट बनाएं; parivahan.gov.in पोर्टल पर 24 घंटे के भीतर ट्रांसफर की सूचना दें (धारा 50 में एक राज्य के भीतर 14 दिन हैं); फॉर्म 29 समेत सारी औपचारिकताएं पूरी करें और रसीद व कॉपी रखें; RTO रिकॉर्ड में नया मालिक दिखने तक अर्जी ट्रैक करें; बैंक ट्रांसफर जैसे ट्रेस होने लायक तरीके से पेमेंट लें; बीमा कंपनी को बताएं और बकाया चालान देखें। पहचान जांचे और सौदा दर्ज किए बिना गाड़ी न सौंपें, कैश या बिना दस्तावेज के सौदा न करें, खाली ट्रांसफर फॉर्म पर दस्तखत न करें, चाबी देने से जिम्मेदारी खत्म मान न लें, और ट्रांसफर में वक्त लगने के कारण बिक्री की सूचना देने में देरी न करें। कानूनी जरूरतें अलग से लागू रहती हैं।

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