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दिया मिर्जा का दिवाली वीडियो हटाने पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बीएमसी से पूछे सवाल

दिया मिर्जा का दिवाली वीडियो हटाने पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बीएमसी से पूछे सवाल तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 संस्कृति डेस्क

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को बीएमसी और राजनीतिक नेताओं की खिंचाई की। मामला दिया मिर्जा के पटाखा-मुक्त दिवाली अभियान के वीडियो का है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को अभिनेत्री दिया मिर्जा के पटाखा-मुक्त दिवाली अभियान को लेकर महानगरपालिका और राजनीतिक नेताओं को कड़ी फटकार लगाई। दिया ने यह अभियान बिना कोई पैसा लिए चलाया था। कोर्ट ने उन्हें निशाना बनाए जाने पर नाराजगी जताई। सोर्स के मुताबिक 3 नवंबर वह दिन है, जब हाई कोर्ट इस विवाद में दखल देने आया।

राजनीतिक विरोध के बाद बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने दिया का जागरूकता वीडियो हटा दिया था। जस्टिस जी एस कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की डिवीजन बेंच ने इस फैसले को सही नहीं माना। बेंच ने साफ कहा कि पर्यावरण की रक्षा साल के 365 दिन का संवैधानिक आदेश है। यह न तो राजनीति का अखाड़ा है और न ही धर्म की लड़ाई का मैदान।

इस दखल से एक बुनियादी संवैधानिक सवाल खड़ा हुआ है। क्या कोई सरकारी संस्था जनहित का सही संदेश सिर्फ इसलिए वापस ले सकती है कि वह राजनीतिक तौर पर असुविधाजनक हो गया? इसी पर वरिष्ठ वकीलों से बात की गई, और उन्होंने कोर्ट के दखल का जोरदार स्वागत किया।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और बॉम्बे हाई कोर्ट में पर्यावरण मामलों की वकील रोनिता भट्टाचार्य बेक्टर ने कहा, "अपनी आस्था निभाने और पर्यावरण बचाने को आपस में नहीं मिलाना चाहिए। पर्यावरण के अनुकूल जश्न के बारे में जागरूकता फैलाने से किसी धर्म का अपमान नहीं होता। दिया मिर्जा के बयान संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत पूरी तरह सुरक्षित हैं। जो व्यक्ति पर्यावरण बचाने आगे आए, उसे निशाना बनाना बिल्कुल गलत है। हाई कोर्ट ने चुने हुए निकायों से ऐसी अनुचित और छोटी हरकतों से बचने को कहा, यह पूरी तरह सही है।"

सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रेकॉर्ड मोहिनी प्रिया के मुताबिक यह विवाद एक अभिनेत्री के पटाखा-मुक्त दिवाली की बात करने से कहीं आगे जाता है। उन्होंने कहा कि यह अभिव्यक्ति की आजादी, धर्मनिरपेक्षता, पर्यावरण की रक्षा और इस संवैधानिक जिम्मेदारी के संगम पर खड़ा है कि सार्वजनिक संस्थाएं राजनीतिक दबाव से अलग रहकर काम करें।

मोहिनी प्रिया ने यह भी कहा, "संविधान जश्न मनाने के हक और जिम्मेदारी से जश्न मनाने की वकालत करने के हक, दोनों की रक्षा करता है। किसी के लिए राजनीतिक या धार्मिक मंजूरी की जरूरत नहीं होनी चाहिए। नागरिक और जनप्रतिनिधि दिया मिर्जा की राय को खुलकर चुनौती दे सकते हैं, लेकिन सरकारी निकायों को राजनीतिक असहमति और किसी आधिकारिक अभियान को हटाने के कानूनी तौर पर ठोस आधार में फर्क करना होगा। आखिर में धर्मनिरपेक्षता की परीक्षा तब नहीं होती जब सब सहमत हों, बल्कि तब होती है जब विरोध के बावजूद राज्य निष्पक्ष बना रहे।"

उन्होंने चार मुद्दे गिनाए। पहला, अभिव्यक्ति की आजादी राजनीतिक मंजूरी पर निर्भर नहीं हो सकती। अनुच्छेद 19(1)(a) जनस्वास्थ्य और सामाजिक जिम्मेदारी पर बोलने की रक्षा करता है। नेता असहमत हो सकते हैं, पर राजनीतिक असर से किसी नागरिक निकाय को वीडियो दबाने पर मजबूर करना हद पार करना है। दबाव में एक वैध वीडियो हटाने से अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी का गंभीर सवाल उठता है।

दूसरा, धर्मनिरपेक्षता के लिए संस्थाओं की निष्पक्षता जरूरी है। एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा माना था। तीसरा, अनुच्छेद 21 स्वस्थ पर्यावरण का हक देता है, जिसे अनुच्छेद 48A और 51A(g) मजबूत करते हैं। अर्जुन गोपाल बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने जनस्वास्थ्य के लिए पटाखों पर नियम बरकरार रखे थे। चौथा, असली मुद्दा संस्थाओं की स्वतंत्रता है। ई पी रॉयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) के मुताबिक मनमानी समानता के खिलाफ है।

अवाज फाउंडेशन की संस्थापक सुमैरा अब्दुलाली ने कहा, "मैं बॉम्बे हाई कोर्ट का शुक्रिया अदा करती हूं कि उसने दिया मिर्जा का वीडियो दोबारा अपलोड करने का आदेश दिया। वे और बीएमसी कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन कर रहे थे। दिवाली रोशनी से मनाइए, धुएं से नहीं। और कोर्ट के आदेश बिना डर और पक्षपात के लागू हों।"

नागरिक कार्यकर्ता जोरू भठेना ने कहा, "मसला कभी बीएमसी के साथ नहीं था, वे कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन कर रहे थे। मसला यह है कि महानगरपालिका पर वीडियो हटाने का दबाव किसने डाला। विधायक [भाजपा के अमीत साटम] के पास ये अधिकार नहीं हैं। मुंबई में ऐसा पहले भी दिखा, जब विशेषज्ञों की रिपोर्ट कुछ और कहती थी, फिर भी गोखले ब्रिज बंद कर दिया गया।"

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