मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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12 साल की लड़ाई के बाद हाईकोर्ट का आदेश, शिल्पा सोनावणे को अंग्रेजी लेक्चरर बनाए सरकार

12 साल की लड़ाई के बाद हाईकोर्ट का आदेश, शिल्पा सोनावणे को अंग्रेजी लेक्चरर बनाए सरकार तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 राजनीति डेस्क

बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने में शिल्पा सोनावणे को अंग्रेजी लेक्चरर नियुक्त करने को कहा है, पर बकाया वेतन नहीं मिलेगा।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह शिल्पा मारुति सोनावणे को अंग्रेजी के लेक्चरर के पद पर नियुक्त करे। यह फैसला 12 साल के इंतजार के बाद आया है। कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति की महिला के लिए तय पद से उन्हें मनमाने ढंग से वंचित किया गया, क्योंकि खुली श्रेणी की दो महिलाओं को आरक्षित पदों के मुकाबले नियुक्त कर दिया गया था।

जस्टिस सुमन श्याम और जस्टिस गौतम ए. अंखड की डिवीजन बेंच ने 2023 के महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण (MAT) के आदेश में बदलाव किया। न्यायाधिकरण ने उनकी नियुक्ति का निर्देश देने से मना कर दिया था। हाईकोर्ट के मुताबिक राज्य को फैसला अपलोड होने के तीन महीने के भीतर महाराष्ट्र में किसी भी उपलब्ध जगह पर उन्हें नियुक्त करना होगा। कोई जगह खाली न हो तो सुपरन्यूमरेरी पद बनाना होगा। नियुक्ति आगे की तारीख से होगी और बकाया वेतन या लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि उन्होंने काम नहीं किया।

जुलाई 2013 में MPSC ने चार विषयों के लिए ग्रुप A लेक्चरर के 92 पदों का विज्ञापन निकाला था। सोनावणे ने अनुसूचित जाति की महिला श्रेणी में अंग्रेजी के पद के लिए लिखित परीक्षा और इंटरव्यू पास किया और जुलाई 2014 में उनके नाम की सिफारिश हुई। अनुसूचित जाति की महिलाओं में वे दूसरे नंबर पर थीं, फिर भी उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। हाईकोर्ट ने पाया कि खुली श्रेणी की दो महिलाओं को आरक्षित रिक्तियों में गिना गया। राज्य न इसकी वजह बता पाया और न ही यह बता पाया कि सोनावणे की पात्रता में क्या कमी थी।

राज्य ने कोर्ट में दलील दी कि 66 अनुबंध पर काम कर रहे अंग्रेजी लेक्चरर नियमित किए जा चुके हैं और 26 पद बचे थे। उसके मुताबिक अनुसूचित जाति के पांच पद योग्यता के आधार पर भरे गए। राज्य ने 2025 के एक प्रस्ताव का हवाला दिया, जिसमें मंजूर पद घटाकर 51 कर दिए गए और 37 लेक्चरर ज्यादा हो गए। उसने यह भी कहा कि MPSC की सिफारिश से नियुक्ति की गारंटी नहीं मिलती। हाईकोर्ट ने ये दलीलें नहीं मानीं और कहा कि बाद में स्टाफ में हुए बदलाव से उनकी पहले की गई अनदेखी सही नहीं ठहराई जा सकती।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आर.के. सभरवाल (1995) और रितेश आर. साह (1996) के फैसलों का हवाला दिया। इनके मुताबिक खुली योग्यता से चुने गए उम्मीदवारों को खुले पदों के मुकाबले गिना जाना चाहिए, आरक्षित पदों के मुकाबले नहीं। हाईकोर्ट ने कहा कि खुली श्रेणी की दो महिलाओं को अनुसूचित जाति की महिला वाली रिक्तियों में समायोजित करना अवैध और मनमाना था और इससे सोनावणे के समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ।

कल्याण की रहने वाली और अंग्रेजी में MA कर चुकी सोनावणे ने कहा, \"यह आदेश एक अच्छा पहला कदम है, लेकिन पूरा न्याय नहीं है। मेरा पद 12 साल पहले मौजूद था, पर सरकार ने गैरकानूनी तरीके से मेरी जगह किसी और को नियुक्त कर दिया। इन 12 सालों में मुझे जो आर्थिक और करियर का भारी नुकसान हुआ, वह कभी भरा नहीं जा सकता।\" उन्होंने बताया कि अनिश्चितता की वजह से वे अविवाहित रहीं। प्राइवेट नौकरी भी नहीं मिल पाई, क्योंकि संस्थानों को डर था कि सरकारी नियुक्ति आते ही वे छोड़ देंगी।

सोनावणे के मुताबिक 2014 में नियुक्ति होती तो आज उनकी कमाई 1.5 लाख रुपये महीने से ज्यादा होती। उन्होंने बताया कि घर पर भी तंगी रही। पिता रिटायर हैं, मां गृहिणी हैं और छोटे भाई-बहन अभी पढ़ रहे हैं। उनके अनुसार MAT के पास 58 उम्मीदवार गए थे, जिनमें 17 की नियुक्ति हुई, 40 छूट गए और एक ने याचिका वापस ले ली। न्यायाधिकरण के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने वाली वे अकेली थीं। अब उन्हें उम्मीद है कि सरकार तीन महीने में नियुक्ति आदेश जारी कर देगी।

MPSC के सचिव सौरभ कटियार और राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सरकारी वकील एन सी वालिम्बे से टिप्पणी के लिए संपर्क किया गया। खबर लिखे जाने तक दोनों का जवाब नहीं आया।

MAT में उम्मीदवारों की पैरवी करने वाले वकील राजेश्वर पांचाल ने कहा, \"मैंने सोनावणे समेत उन दुर्भाग्यशाली उम्मीदवारों का केस लड़ा, जिन्हें MPSC की सिफारिश के बावजूद सरकारी पॉलिटेक्निक में अंग्रेजी लेक्चरर की नियुक्ति नहीं मिली। राज्य का कहना था कि कोई रिक्ति नहीं है। हमने न्यायाधिकरण से सुपरन्यूमरेरी पद बनाने का निर्देश देने की मांग की थी, पर उसने सिर्फ सहानुभूति जताई और मामला सरकार के संभावित नीतिगत फैसले पर छोड़ दिया। मुझे खुशी है कि उन्हें आखिरकार न्याय मिला। हालांकि बकाया वेतन और लाभ मिलते तो यह कड़ा संदेश जाता कि न्यायपालिका ऐसी साफ प्रशासनिक गलतियां बर्दाश्त नहीं करेगी।\"

हाईकोर्ट में सोनावणे की पैरवी करने वाले वकील सिद्ध विद्या ने कहा, \"अंबादास दावले मामले में हाईकोर्ट ने अनुबंध वाले लेक्चरर को समाहित करने की इजाजत सिर्फ इस साफ समझ पर दी थी कि MPSC से चुने गए उम्मीदवारों का नुकसान नहीं होगा। फिर भी राज्य ने उलटा किया। मेरी मुवक्किल की अनुसूचित जाति की महिला वाली सीट खुली योग्यता से चुने उम्मीदवार को देना आरक्षण को उलट देना है। खुली योग्यता वाले चयन आरक्षित सीटें नहीं खा सकते। आरक्षण फर्श है, छत नहीं। एक दशक तक न्याय के पीछे भागने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने गलती सुधारी है। फिर भी वेतन, सीनियरिटी और प्रमोशन, जो उनसे गलत तरीके से छीने गए, उन्हें मिलने चाहिए।\"

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