मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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मुंबई में धर्मों की संसद: साथ रहने की हिम्मत पर विद्वानों और नागरिकों ने की चर्चा

मुंबई में धर्मों की संसद: साथ रहने की हिम्मत पर विद्वानों और नागरिकों ने की चर्चा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 राजनीति डेस्क

मरीन लाइन्स के बहाई सेंटर में 31 अक्टूबर को हुए मुंबई पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन्स 2026 में ध्रुवीकरण, पूर्वाग्रह और आपसी भरोसे पर बात हुई।

मुंबई पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन्स 2026 का आयोजन 31 अक्टूबर को मरीन लाइन्स के बहाई सेंटर में हुआ। इसका विषय था "साथ रहने की हिम्मत" (The Courage to Live Together)। कार्यक्रम इंटर-रिलीजियस सॉलिडैरिटी काउंसिल (IRSC) ने सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म (CSSS) के साथ मिलकर बुलाया था। इसमें विद्वान, सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि, धर्मगुरु और आम नागरिक जुटे।

दिन भर धार्मिक ध्रुवीकरण, पूर्वाग्रह, सामाजिक बंटवारे और अविश्वास जैसी चुनौतियों पर बात हुई। पैनल में शामिल जानकारों ने सिर्फ संवाद तक बात नहीं रखी। उन्होंने यह भी रखा कि साथ रहने, गरिमा और सामाजिक न्याय के लिए क्या किया जा सकता है।

IRSC के संयोजक प्रभुजी केशव चंद्र दास ने कहा कि साथ रहने के लिए अलग-अलग धर्मों की अपनी मान्यताओं और रास्तों का सम्मान करते हुए एक-दूसरे की गरिमा के लिए खड़े होने की हिम्मत चाहिए। उनके मुताबिक यह आपसी धार्मिक संवाद से हो सकता है। IRSC के सह-संयोजक और CSSS के निदेशक इरफान इंजीनियर ने कहा, "धार्मिक संस्थाओं को अपना असर और अपने संसाधन साझा सामाजिक चुनौतियों से निपटने में लगाने चाहिए।"

शांति के काम से जुड़ी उर्मि चंदा ने 1893 में शिकागो की वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन्स में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण को याद किया और धार्मिक स्वीकार्यता के उसके संदेश की बात की। दर्शनशास्त्र के विद्वान प्रो. प्रदीप गोखले ने कहा कि एकता के लिए ऐसा नजरिया चाहिए जो इंसान को केंद्र में रखे और अलग-अलग धार्मिक, और अहम बात यह कि गैर-धार्मिक, सोच को भी जायज माने। गोखले ने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं को आलोचनात्मक नजर से परखना जरूरी है, खासकर वहां जहां वे पितृसत्ता या किसी को बाहर रखने की सोच को बनाए रखती हैं।

इन भाषणों के बाद पहला पैनल "सार्वजनिक जीवन में धार्मिक ध्रुवीकरण" विषय पर हुआ। संचालन IRSC की सह-संयोजक रुक्मिणी अय्यर ने किया। वक्ताओं में डॉ. एस्ट्रिड लोबो गजीवाला, प्रो. कृष्ण अभिषेक घोष, प्रो. ज़रीन शफ़ी, चिंतन गिरीश मोदी, Tahirih Makhija और सबाह खान थे। इस चर्चा में असहज सवालों से कतराया नहीं गया।

गजीवाला ने सहनशीलता से आगे बढ़कर स्वीकार्यता की ओर जाने की बात कही। उनके शब्दों में, "अंतरधार्मिक शादियों का समर्थन करना और धार्मिक समुदायों के भीतर असहमत लोगों को बदलाव के संभावित वाहक मानना।" चिंतन गिरीश मोदी ने कहा, "अपने परिवार और समुदाय के भीतर के पूर्वाग्रह का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए।" Makhija ने जोर देकर कहा कि "एकता के लिए एकरूपता जरूरी नहीं है", जबकि खान ने कहा कि "सार्थक संवाद में असहजता भी हो सकती है और रोजमर्रा की कट्टरता को चुनौती भी देनी पड़ सकती है।"

आखिर में IRSC की कोर कमेटी के एक सदस्य ने कहा, "बदलाव विचारों के आदान-प्रदान से शुरू होता है। शुरुआत बातचीत से होती है, सुनने और समझने की इच्छा से, और फिर उस पर अमल होता है। पूर्वाग्रह गहरे बैठा है और कई तरीकों से उसे ताकत मिलती है, इसलिए यह समझना होगा कि यह एक बार की कोशिश नहीं है।"

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