शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

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2017 की गिरफ्तारी गैरकानूनी, हाईकोर्ट ने कारोबारी को 5 लाख मुआवजा देने को कहा

2017 की गिरफ्तारी गैरकानूनी, हाईकोर्ट ने कारोबारी को 5 लाख मुआवजा देने को कहा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
जुर्म PT24 अपराध डेस्क

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कारोबारी बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल की 2017 में हुई गिरफ्तारी को गैरकानूनी करार दिया है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अग्रवाल को मुआवजे के तौर पर 5 लाख रुपये दे। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने डेवलपर भावेश सेठ के साथ मिलकर अग्रवाल को जबरन वसूली के झूठे मामले में फंसाया।

मामला अंधेरी ईस्ट की न्यू आरती को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के रिडेवलपमेंट से जुड़ा है। घटना 4 अगस्त 2017 की है। अग्रवाल सोसायटी में फ्लैट रखने वाली अपनी 70 साल की सास की तरफ से बातचीत कर रहे थे। वे डेवलपर भावेश सेठ और कमलेश वोरा से बात कर रहे थे कि या तो फ्लैट बेच दिया जाए, या रिडेवलप हुई बिल्डिंग में बड़ा फ्लैट और ट्रांजिट रेंट मिले।

दोनों पक्ष मरीन लाइंस में डेवलपरों के दफ्तर में मिले और 1.64 करोड़ रुपये की कीमत पर सहमति बनी। डेवलपरों ने सौदे के एडवांस के तौर पर अग्रवाल को 2 लाख रुपये नकद दिए। कुछ ही मिनट बाद पुलिस दफ्तर पहुंची, अग्रवाल को हथकड़ी लगाई और आजाद मैदान पुलिस स्टेशन ले गई। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 384 यानी जबरन वसूली के तहत FIR दर्ज की गई।

अग्रवाल का कहना है कि वह रकम प्रॉपर्टी का जायज एडवांस थी, वसूली का पैसा नहीं। उनका आरोप है कि रिडेवलपमेंट के घोटालों पर परदा डालने के लिए डेवलपरों ने एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर की मदद से उन्हें फंसाया।

हाईकोर्ट ने पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ियां पाईं। गिरफ्तारी के फॉर्म में बदलाव किए गए थे और FIR व गिरफ्तारी के समय में भी फर्क था। कोर्ट को इसका कोई सबूत नहीं मिला कि गिरफ्तारी से पहले अग्रवाल को कानूनी नोटिस का पालन करने का असली मौका दिया गया। कोर्ट ने गिरफ्तारी और उसके बाद की हिरासत को गैरकानूनी बताया। मजिस्ट्रेट ने बिना पर्याप्त कारण दर्ज किए आगे की कस्टडी मंजूर की, इस पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई। 22 अक्टूबर 2026 के फैसले में कोर्ट ने पुलिस के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया और मजिस्ट्रेट की भूमिका की जांच शुरू कराई।

अग्रवाल ने कहा, "इंसाफ हमेशा होता है। ये मेरी जिंदगी के सबसे भयानक नौ साल थे, फिर भी मुझे हमारी न्याय व्यवस्था पर भरोसा था।" उन्होंने बताया कि उन्होंने बिना वकील के खुद अपना केस लड़ा। उनके मुताबिक नाम के साथ FIR जुड़ी होने पर जीना जजों के सामने खड़े होकर केस लड़ने से कहीं मुश्किल था। सामाजिक, पेशेवर और मानसिक, हर तरह की दिक्कतें झेलनी पड़ीं। मतभेद होने पर लोग इसी बात को हथियार बनाकर उनका मुंह बंद कराते थे। यह बात फैलने के बाद कारोबार में भी कई नुकसान हुए। विदेश नहीं जा पाने से कई अहम मौके और बिजनेस ट्रिप छूट गए। अग्रवाल के शब्दों में नुकसान इस फेहरिस्त से कहीं बड़ा है।

अग्रवाल ने यह भी कहा कि फैसले से FIR का दाग तो हट गया, लेकिन बाकी नुकसान की भरपाई नहीं हुई है। अगर डेवलपर और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, तो वे हर कानूनी चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

भावेश सेठ ने आरोपों से इनकार किया है। उनका दावा है कि अग्रवाल के खिलाफ उनके घर और दफ्तर पर और भी शिकायतें हैं। सेठ ने कहा, "हम सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे और हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देंगे। मैं अपनी शिकायत पर कायम हूं। हमारे पास सारे सबूत हैं कि अग्रवाल हमसे भारी रकम मांग रहे थे।"

असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर महेश लामखड़े को हाईकोर्ट ने राज्य को सस्पेंड करने का आदेश दिया है। उन्होंने सेठ से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया। लामखड़े ने कहा, "मेरी पूरी नौकरी में मेरा रिकॉर्ड साफ रहा है। राज्य ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपील की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मामला अभी विचाराधीन है, इसलिए ज्यादा नहीं कह सकता, लेकिन मैंने कुछ गलत नहीं किया।"

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