विक्रोळी में इस बार दूर्वा से बना गणपति, थीम 'गुरू से गूगल गुरू'
मुंबई के गणेशोत्सव में हर साल कुछ नया देखने को मिलता है, और इस बार विक्रोली पश्चिम के मशहूर बाल मित्र कला मंडल यानी 'विक्रोली का मोरया' ने सबको चौंका दिया है। मंडल ने इस बार दूर्वा से बनी गणेश मूर्ति मंडप में विराजमान की है, और बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र के गणेशोत्सव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है।
गणपति बाप्पा की पूजा में दूर्वा का खास महत्व होता है, और यही दूर्वा इस्तेमाल करके बाप्पा की मूर्ति बनाने का आइडिया मंडल ने इस साल रखा। यही वजह है कि यह मूर्ति गणेशभक्तों के बीच खास आकर्षण बन गई है।
बाल मित्र कला मंडल की शुरुआत 1972 में हुई थी। धार्मिक उत्सवों के साथ साथ मंडल कई सामाजिक कामों में भी हिस्सा लेता रहा है। इतने दशकों की परंपरा वाले इस मंडल ने इस बार दूर्वा से गणेशमूर्ति बनाकर एक अलग प्रयोग करने का फैसला किया।
मूर्ति के अलावा इस बार मंडल की थीम भी लोगों का ध्यान खींच रही है। इस साल के उत्सव का कॉन्सेप्ट है 'गुरू से गूगल गुरू'। पहले ज्ञान पाने का मुख्य जरिया गुरू हुआ करते थे। गुरू शिष्य परंपरा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान पहुंचता रहा। समय के साथ पढ़ाई का तरीका बदला और टेक्नोलॉजी का असर बढ़ता गया। आज इंटरनेट और सर्च इंजिन के जरिए कुछ ही सेकंड में जानकारी मिल जाती है। ज्ञान के इसी बदलते सफर पर 'गुरू से गूगल गुरू' कॉन्सेप्ट आधारित है।
इस खास गणेशमूर्ति को बनाने वाले मूर्तिकार हैं रतन बागवे। भांडुप के रहने वाले बागवे ने दूर्वा से बाप्पा का यह रूप गढ़ा है। इस बार के देखावे का कला दिग्दर्शन स्वप्नील सामंत ने किया है, जबकि कॉन्सेप्ट लिखने और नरेशन का काम विजय कदम ने किया है। मूर्ति, कला दिग्दर्शन और नरेशन के जरिए मंडल भक्तों को एक अलग अनुभव देने की कोशिश कर रहा है।
गणेशपूजा में दूर्वा का खासा महत्व माना जाता है। गणपति बाप्पा को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है, और गणेशोत्सव में भक्त खासतौर पर बाप्पा को दूर्वा अर्पण करते हैं। यही वजह है कि बाप्पा से धार्मिक रूप से जुड़ी दूर्वा से ही गणेशमूर्ति बनाने का यह आइडिया भक्तों के लिए खास आकर्षण बन गया है।
'विक्रोली का मोरया' का मंडप ब्लूमेन बिल्डिंग के पास, स्टेशन रोड, विक्रोली पश्चिम, मुंबई - 400083 में है। यानी मुंबई के भक्तों को इस बार विक्रोली में यह अलग तरह की गणेशमूर्ति देखने का मौका मिलेगा।
एक तरफ गणपति को प्रिय मानी जाने वाली दूर्वा से बनी मूर्ति, और दूसरी तरफ 'गुरू से गूगल गुरू' जैसी आज के दौर से जुड़ी थीम, इन दोनों वजहों से इस बार का 'विक्रोली का मोरया' खास बन गया है। पारंपरिक आस्था, पर्यावरण का ख्याल और बदलते डिजिटल दौर के ज्ञान के सफर, इन तीनों बातों को एक साथ इस गणेशोत्सव में पेश करने की कोशिश बाल मित्र कला मंडल ने की है।