वर्ल्ड हार्ट डे: घुटनों का दर्द दिल की सेहत पर भी असर डाल सकती है, जानें डॉक्टर की राय
गुडघेदुखी की वजह से कम हो रही चलने-फिरने की आदत हृदय की सेहत पर भी असर डाल सकती है, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, मुंबई के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निहार मोदी ने बताया।
लगातार गुडघेदुखी या जोड़ों के दर्द की वजह से बहुत सारे लोग चलना, एक्सरसाइज करना या कोई भी शारीरिक हलचल करना टाल देते हैं। इसका सीधा असर धीरे-धीरे उनकी फिटनेस पर पड़ने लगता है और दर्द व कम हलचल का एक चक्र बन जाता है। यह सिलसिला सिर्फ घुटनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी सेहत के साथ-साथ हृदय के स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, मुंबई के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निहार मोदी ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है।
डॉ. मोदी के मुताबिक गुडघेदुखी मुख्य रूप से हड्डी, जोड़ों और मसल्स से जुड़ी दिक्कत है, लेकिन इसका असर शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। जब चलना, सीढ़ियां चढ़ना या एक्सरसाइज करना तकलीफदेह हो जाता है, तो इंसान धीरे-धीरे हलचल कम करने लगता है। कुछ समय बाद कम हलचल की वजह से वजन बढ़ सकता है, मसल्स की ताकत घट सकती है और ओवरऑल फिटनेस कम हो सकती है। इसके साथ ही हृदय से जुड़े कुछ खतरे भी बढ़ सकते हैं। हालांकि, डॉ. मोदी ने साफ किया कि गुडघेदुखी से सीधे हार्ट डिजीज नहीं होती, लेकिन अगर इसकी वजह से कोई लंबे समय तक एक्सरसाइज या शारीरिक हलचल नहीं करता, तो इसका असर ओवरऑल हृदय की सेहत पर पड़ सकता है।
रेगुलर एक्सरसाइज और शारीरिक हलचल शरीर को हेल्दी रखने के लिए बहुत जरूरी है। नियमित हलचल से हृदय की कार्यक्षमता बेहतर रहती है, वजन कंट्रोल में रहता है और ब्लड प्रेशर व ब्लड शुगर भी नियंत्रण में रहते हैं। लेकिन जिन लोगों को लगातार गुडघेदुखी रहती है, उन्हें एक्सरसाइज के दौरान दर्द बढ़ने का डर रहता है, जिस वजह से वे चलना या एक्सरसाइज करना टाल देते हैं। कुछ लोगों को साधारण चलना, साइकिल चलाना या सीढ़ियां चढ़ने जैसे रोजमर्रा के काम करने में भी तकलीफ होती है। इससे मसल्स कमजोर होते हैं और आगे चलकर हलचल करना और मुश्किल हो जाता है।
डॉ. मोदी के अनुसार, लंबे समय तक शारीरिक हलचल कम रहने से वजन बढ़ना, हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल में बदलाव और ब्लड शुगर कंट्रोल में न रहना जैसी दिक्कतें हो सकती हैं, और ये सभी फैक्टर हृदय की सेहत के लिए अहम माने जाते हैं। अगर कोई गुडघेदुखी या जोड़ों के दर्द की वजह से कई महीनों तक कम हलचल करता है, तो रेगुलर एक्सरसाइज से मिलने वाले फायदे कम हो सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से हार्ट डिजीज का खतरा है। इसलिए गुडघेदुखी की असली वजह पता करके उसका सही इलाज कराना जरूरी है, ताकि व्यक्ति सुरक्षित तरीके से दोबारा चलना और शारीरिक हलचल शुरू कर सके।
गुडघेदुखी में एक्सरसाइज का मतलब दौड़ना, कूदना या भारी वर्कआउट करना नहीं है। दर्द की वजह और उसकी तीव्रता के हिसाब से सही एक्सरसाइज चुनी जा सकती है, जैसे तैराकी, स्टेशनरी साइकिल चलाना, आरामदायक और समतल जगह पर चलना, या डॉक्टर व फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह से मसल्स मजबूत करने वाली एक्सरसाइज। फिजियोथेरेपी से पैरों और शरीर के मसल्स की ताकत बढ़ने, बॉडी की लचीलापन सुधरने, बैलेंस बेहतर रहने और घुटने की मूवमेंट सुधरने में मदद मिल सकती है। डॉ. मोदी की सलाह है कि अचानक ज्यादा एक्सरसाइज शुरू करने के बजाय धीरे-धीरे शारीरिक हलचल बढ़ानी चाहिए।
डॉ. मोदी ने बताया कि अगर गुडघेदुखी लगातार बनी रहे या दिन-ब-दिन बढ़ती जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। घुटने में सूजन आना, चलते या खड़े रहते वक्त घुटना अस्थिर महसूस होना, चलने में दिक्कत होना या गुडघेदुखी की वजह से रोजमर्रा के काम में परेशानी होना, ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। ऑर्थोपेडिक एक्सपर्ट गुडघेदुखी की सही वजह पता लगाकर उसके हिसाब से सही इलाज बता सकते हैं। जिन लोगों को पहले से हार्ट डिजीज है या हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा है, उन्हें नई एक्सरसाइज शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर बात करनी चाहिए, खासकर ज्यादा जोर वाली या लंबे समय की एक्सरसाइज शुरू करने से पहले। डॉ. मोदी के मुताबिक हेल्दी घुटने और हेल्दी हृदय का हलचल से करीबी नाता है, इसलिए गुडघेदुखी की वजह से लंबे समय तक बैठे रहना जरूरी नहीं है। सही वक्त पर घुटनों की जांच, सही इलाज और अपनी जरूरत के हिसाब से बना एक्सरसाइज प्लान सुरक्षित तरीके से एक्टिव रहने में मदद कर सकता है।