वाराणसी के विशालाक्षी मंदिर में गिरा था सती का आभूषण, 51 शक्तिपीठों में गिनती
वाराणसी के मीर घाट के पास बसा विशालाक्षी मंदिर 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है और इसे मणिकर्णी देवी के नाम से भी जाना जाता है।
वाराणसी की गलियों में बसा विशालाक्षी मंदिर सिर्फ भक्ति की जगह नहीं है, यह पुरानी धार्मिक परंपराओं से जुड़ा एक अहम स्थल भी है। मीर घाट के पास बने इस मंदिर की गिनती 51 शक्तिपीठों में होती है। यहां देवी विशालाक्षी की पूजा शक्ति के रूप में की जाती है।
इस मंदिर की खासियत यह बताई जाती है कि इसकी पहचान काशी की परंपराओं के साथ-साथ दक्षिण भारतीय संस्कृति से भी जुड़ी हुई है। मंदिर की पौराणिक कथा देवी सती के आभूषण से जुड़ी है, और इसे मणिकर्णी देवी के नाम से भी जाना जाता है।
हिंदू पौराणिक कथा के मुताबिक राजा दक्ष के यज्ञ में देवी सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद भगवान शंकर सती का शरीर लेकर हर तरफ घूमने लगे। मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े पृथ्वी पर जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ बन गए। इन्हीं में से जिस जगह देवी का आभूषण गिरा, वहां आज देवी विशालाक्षी का मंदिर दिखाई देता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी सती के कान का मणिजड़ित आभूषण इसी जगह गिरा था, इसी वजह से उन्हें मणिकर्णी नाम से जाना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में विशालाक्षी देवी की प्रतिमा स्थापित की गई है। यहां भैरव रूप में देवी की पूजा की जाती है।
मंदिर की एक और खास बात इसकी प्राचीन वास्तुकला है। काशी के पुराने धार्मिक स्थलों के बीच यह मंदिर दक्षिण भारतीय मंदिर शैली की झलक दिखाता है।
अगर मंदिर की जगह की बात करें तो देवी विशालाक्षी का मंदिर वाराणसी के लाहोरी टोला इलाके में मीर घाट के पास है। श्रद्धालु यहां दर्शन के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर और काल भैरव मंदिर भी जाते हैं। काशी की तंग गलियां, पुराने घाट और मंदिरों की परंपराएं इस तीर्थयात्रा को खास बना देती हैं।
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