संत नामदेव की विठ्ठल भक्ति में माँ गोणाई और पत्नी राजाई का योगदान, अभंगों में झलकी भावनाएं
संत नामदेव महाराज की विठ्ठल भक्ति में उनकी माँ गोणाई और पत्नी राजाई के अभंगों में वात्सल्य, नाराजगी और श्रद्धा एक साथ दिखती है।
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महाराष्ट्र की संत परंपरा में संत नामदेव महाराज का स्थान बहुत अहम है। अपने अभंगों के जरिए उन्होंने विठ्ठल भक्ति की महिमा दूर-दूर तक पहुंचाई। विठ्ठल के साथ सखा भाव का रिश्ता जोड़ने वाले नामदेव महाराज सिर्फ वारकरी संप्रदाय के श्रेष्ठ संत नहीं थे। वे ऐसे संतकवि थे, जिन्होंने भक्ति के जरिए परमेश्वर को अपना बनाने का आदर्श सामने रखा।
नामदेव महाराज के भक्तिमय जीवन को देखें तो उनके परिवार की स्त्रियों का योगदान भी उतना ही महत्त्वपूर्ण ठहरता है। उनकी माँ गोणाई और पत्नी राजाई ने भी अपनी भावनाएं, घर-गृहस्थी के अनुभव और विठ्ठल के प्रति आस्था अभंगों के माध्यम से व्यक्त की।
नामदेव महाराज के घर का माहौल ही विठ्ठलमय था। परिवार के हर सदस्य का विठ्ठल से अपना अलग रिश्ता था। माँ गोणाई के मन में बेटे के लिए वात्सल्य था, जबकि पत्नी राजाई के मन में गृहस्थी की जिम्मेदारियों का एहसास था। इन दोनों भावनाओं के केंद्र में विठ्ठल ही थे। इसी वजह से उनके अभंगों में भक्ति का एक अलग, मानवीय और यथार्थवादी रूप देखने को मिलता है।
गोणाई का विठ्ठल से रिश्ता बेहद आत्मीय था। बेटे ने पूरा जीवन विठ्ठल भक्ति में लगा दिया, यह देखकर उन्हें खुशी होती थी। लेकिन गृहस्थी की तरफ हो रही अनदेखी उन्हें बेचैन करती थी। एक माँ के नाते उनकी अपेक्षा थी कि नामदेव गृहस्थी की जिम्मेदारी भी निभाएं।
नामदेव महाराज विठ्ठल की भक्ति में इतने डूब जाते थे कि उन्हें बाकी बातों का होश नहीं रहता था। ऐसे में गोणाई के मन की उलझन उनके अभंगों में सामने आती है। वे मानो विठ्ठल से जवाब मांगती हैं। उनकी शिकायत का भाव यह होता है कि मेरे बेटे को तूने भक्ति की धुन लगा दी, अब उसकी गृहस्थी की जिम्मेदारी कौन उठाएगा।
इस शिकायत में विठ्ठल के प्रति अविश्वास नहीं है। उसमें बेटे के लिए प्रेम है और विठ्ठल पर अपना हक है। जिस हक से कोई माँ बेटे की भलाई के लिए उसके करीबी से बात करती है, उसी सहजता से गोणाई विठ्ठल से संवाद करती हैं। गोणाई के भावविश्व में भक्ति और मातृत्व का सुंदर मेल दिखता है।
नामदेव महाराज की पत्नी राजाई का जीवन भी भक्ति और गृहस्थी के संघर्ष को दिखाता है। एक तरफ पति की विठ्ठल भक्ति थी, दूसरी तरफ घर की रोजमर्रा की जरूरतें, आर्थिक तंगी और परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी। ऐसे हालात में राजाई को गृहस्थी की गाड़ी खींचनी पड़ती थी।
राजाई के अभंगों में यह भावना दिखती है कि नामदेव महाराज जब विठ्ठल के नामस्मरण में लीन रहते थे, तब घर के कामकाज पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता था। घर में अनाज की कमी हो और परिवार की जरूरतें पूरी न हो रही हों, तो सिर्फ भक्ति में रमे रहने का क्या फायदा, यह सवाल उनके मन में उठना स्वाभाविक था।
इससे उनके अभंगों में गृहस्थी का दुख, आर्थिक चिंता और विठ्ठल के प्रति नाराजगी झलकती है। फिर भी इस नाराजगी को सिर्फ अविश्वास की नजर से नहीं देखा जा सकता। वह गृहस्थी संभालने वाली एक स्त्री की व्यथा है। भक्ति के आदर्श के साथ-साथ असल जिंदगी की मुश्किलों का एहसास कराने वाला यह स्वर है।
राजाई के अभंगों की खासियत उनकी यथार्थवादिता है। संतों के जीवन का भक्तिमय पहलू हमें जाना-पहचाना लगता है, लेकिन उस भक्ति का परिवार के बाकी सदस्यों की जिंदगी पर क्या असर पड़ता होगा, इस पर कम ही सोचा जाता है। राजाई के भावविश्व से यह पहलू सामने आता है।
राजाई के भक्ति सफर में विठ्ठल के प्रति नाराजगी और श्रद्धा दोनों भाव साथ-साथ दिखते हैं। गृहस्थी के संकटों ने उन्हें बेचैन किया, फिर भी उन्होंने विठ्ठल से अपना रिश्ता नहीं छोड़ा। उल्टे, अपने दुख और परेशानियों की बात उन्होंने उसी से की।
वारकरी भक्ति परंपरा में देवता से संवाद करने को खास अहमियत दी गई है। भक्त को देवता के सामने सिर्फ स्तुति ही करनी हो, ऐसा नहीं है। अपने मन का दुख, गुस्सा, अपेक्षाएं और बेबसी भी उसके सामने रखी जा सकती हैं। गोणाई और राजाई के अभंगों में यह भावना महसूस होती है।
उनकी श्रद्धा थी कि विठ्ठल भक्त का सहारा है। इसलिए गृहस्थी की मुश्किलों के दौर में भी उसके पास दौड़ जाने की भावना उनके अभंगों में दिखती है। उनके भावविश्व से यह अर्थ निकलता है कि भक्ति सारे सवाल खत्म होने के बाद पैदा होने वाली अवस्था नहीं है। भक्ति का मतलब है सवाल और संकट होते हुए भी परमेश्वर से जुड़े रहने की वृत्ति।