बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

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18:47 IST

संत एकनाथ ने हस्तलिखित प्रतियां मिलाकर तैयार की ज्ञानेश्वरी की शुद्ध प्रति

संत ज्ञानेश्वर के ढाई सौ साल बाद पैठण के संत एकनाथ महाराज ने ज्ञानेश्वरी के अलग-अलग पाठ जांचकर उसकी शुद्ध प्रति सिद्ध की।

संत एकनाथ ने हस्तलिखित प्रतियां मिलाकर तैयार की ज्ञानेश्वरी की शुद्ध प्रति तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मराठी संत साहित्य में ज्ञानेश्वरी को सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं माना जाता। वह मराठी भाषा और संत परंपरा की बहुत कीमती धरोहर है। संत ज्ञानेश्वर महाराज ने भगवद्गीता का भावार्थ आम मराठी आदमी तक पहुंचाने के लिए यह ग्रंथ रचा था। लेकिन इस ग्रंथ को आने वाली पीढ़ियों तक उसके शुद्ध रूप में पहुंचाने का बड़ा काम संत एकनाथ महाराज ने किया।

संत ज्ञानेश्वर महाराज ने शके 1212, यानी इस्वी सन 1290 के आसपास नेवासे में ज्ञानेश्वरी पूरी की। इस ग्रंथ को भावार्थदीपिका भी कहा जाता है। गीता का तत्त्वज्ञान संस्कृत की सीमा में बंद नहीं रहा। उन्होंने उसे मराठी की ओवीबद्ध शैली में आम लोगों तक पहुंचाया। इससे गीता के गहरे आध्यात्मिक विचार लोगों को अपनी मातृभाषा में समझने में आसान हो गए। ज्ञानेश्वरी की रचना संत ज्ञानेश्वर ने ही की, पर आगे चलकर उसे सहेजने और शुद्ध करने का काम संत एकनाथ महाराज का अहम योगदान है।

ज्ञानेश्वर के बाद सैकड़ों साल तक ज्ञानेश्वरी की हस्तलिखित प्रतियां बनती रहीं। उस जमाने में छपाई की सुविधा नहीं थी, इसलिए ग्रंथ की नकल हाथ से ही उतारी जाती थी। एक प्रति से दूसरी प्रति बनाते समय लेखकों से शब्द लिखने में गलती हो सकती थी, ओवियों में बदलाव हो सकता था, या कहीं-कहीं अनजाने में मजकूर बढ़ भी सकता था। इस तरह गलत पाठ पैदा होने की गुंजाइश बनी रहती थी। वक्त के साथ ज्ञानेश्वरी की अलग-अलग हस्तलिखित प्रतियों में पाठभेद आ गए। ऐसे में इस अनमोल ग्रंथ का मूल रूप बचाए रखने की जरूरत खड़ी हो गई।

संत ज्ञानेश्वर के करीब ढाई सौ साल बाद पैठण के संत एकनाथ महाराज ने ज्ञानेश्वरी पर खास ध्यान दिया। उन्होंने उपलब्ध हस्तलिखितों का अध्ययन किया, ग्रंथ के पाठभेद जांचे और ज्ञानेश्वरी की शुद्ध प्रति सिद्ध की। परंपरा के मुताबिक यह काम शके 1506, यानी इस्वी सन 1584 में पूरा हुआ। अलग-अलग प्रतियों की तुलना करके जो पाठ गलत या बाद में जोड़े हुए लगे, उन्हें हटाना और मूल आशय से मेल खाने वाला पाठ तय करना उनका बड़ा योगदान था। यानी यह काम सिर्फ धार्मिक भावना से नहीं हुआ। इसके पीछे ग्रंथ की खोज, पाठ की परख और साहित्य को सहेजने की नजर थी।

इसी वजह से संत एकनाथ महाराज को मराठी सारस्वत का आद्य संपादक भी कहा जाता है। आज किसी पुराने ग्रंथ की कई प्रतियां जांचकर, पाठभेदों का अध्ययन करके प्रमाणित पाठ तय किया जाता है, तो उस प्रक्रिया को पाठसंपादन कहते हैं। संत एकनाथ महाराज ने अपने समय के साधनों की सीमा में ऐसा ही अहम काम किया। इसीलिए ज्ञानेश्वरी को सहेजने के इतिहास में उनकी जगह बहुत मोल की है।

ज्ञानेश्वरी की शुद्धि के साथ संत एकनाथ महाराज का संत ज्ञानेश्वर से जुड़ा एक और अहम काम आळंदी में रहा। यह काम ज्ञानेश्वर महाराज के समाधिस्थल को फिर से संवारना था। परंपरा के अनुसार संत एकनाथ महाराज ने आळंदी जाकर ज्ञानेश्वर महाराज की संजीवन समाधि के स्थान की सफाई और जीर्णोद्धार किया। ज्ञानेश्वर महाराज की स्मृति से जुड़ी धार्मिक परंपराओं को भी उन्होंने बढ़ावा दिया। इससे वारकरी संप्रदाय में ज्ञानेश्वर भक्ति की धारा को नई ऊर्जा मिली।

परंपरा है कि संत एकनाथ महाराज ने ज्ञानेश्वरी की शुद्धि का काम भाद्रपद वद्य षष्ठी के दिन पूरा किया। इसलिए यह दिन वारकरी और ज्ञानेश्वरी प्रेमियों के लिए खास याद का दिन माना जाता है। यह दिन सिर्फ एक ग्रंथ की शुद्धि की याद नहीं दिलाता। यह इस बात का भी प्रतीक है कि एक संत ने दूसरे संत की ज्ञान परंपरा की रक्षा की।

ज्ञानेश्वरी के संदर्भ में संत ज्ञानेश्वर और संत एकनाथ के काम को एक-दूसरे का पूरक माना जा सकता है। ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी रची, एकनाथ ने उसके शुद्ध पाठ को संभाला। ज्ञानेश्वर ने संस्कृत की भगवद्गीता का तत्त्वज्ञान मराठी ओवी में लाकर ज्ञान के दरवाजे सबके लिए खोल दिए। एकनाथ ने उस अनमोल खजाने को वक्त के साथ बिगड़ने से बचाने के लिए उसे सहेजा। एक तरह से ज्ञानेश्वर ने ज्ञान का दीप जलाया और एकनाथ ने उस दीप की लौ आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाई।

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