सहारा रेगिस्तान में बर्फबारी, तापमान -3 डिग्री तक गिरा, सुनहरी रेत पर बिछी सफेद चादर
अल्जीरिया के ऐन सेफ्रा शहर में सहारा रेगिस्तान की सुनहरी-लाल रेत पर बर्फ की चादर बिछ गई, तापमान माइनस में चला गया
दुनिया के सबसे गर्म और सबसे बड़े रेगिस्तानों में गिने जाने वाले सहारा रेगिस्तान में अचानक बर्फबारी हुई तो किसी को भरोसा नहीं होगा। जिस इलाके में गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, वहां जब लाल-सुनहरी रेत की पहाड़ियों पर सफेद बर्फ की चादर बिछ गई तो यह नजारा हर किसी को हैरान कर गया।
यह दुर्लभ घटना अल्जीरिया के ऐन सेफ्रा शहर में हुई है। इस शहर को सहारा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। एक बेहद गर्म और रेगिस्तानी इलाके में बर्फ पड़ने की तस्वीरें और वीडियो दुनियाभर में चर्चा का विषय बन गए हैं।
ऐन सेफ्रा में सबसे पहले 1979 में ऐसी बर्फबारी की आधिकारिक रिकॉर्डिंग हुई थी। इसके बाद 2016, 2017, 2018, 2021, 2022 और हाल के दिनों में भी इस इलाके में बर्फबारी की घटनाएं दर्ज की गई हैं। यह घटना बेहद असामान्य जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। रेगिस्तान की तेज गर्मी और सूखे मौसम के बावजूद अगर खास तरह की मौसम प्रणाली बने तो वहां भी बर्फबारी हो सकती है, यह इन घटनाओं से साफ हो गया है।
सहारा में बर्फ पड़ने के पीछे कुछ खास मौसमी और वातावरणीय हालात का साथ आना जरूरी होता है। सर्दियों के दिनों में यूरोप की तरफ से आने वाली बेहद ठंडी और तेज हवा दक्षिण की ओर उत्तर अफ्रीका तक पहुंच जाती है। जब यह ठंडी हवा अटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर से आने वाली नम हवा के संपर्क में आती है, तो बर्फबारी के लिए जरूरी पहला कदम तैयार हो जाता है।
रेगिस्तान की हवा में बादल बहुत कम होते हैं। इसी वजह से दिन में सूरज की गर्मी जितनी तेजी से जमीन सोख लेती है, रात होते ही उतनी ही तेजी से यह गर्मी आसमान में उड़ जाती है। इस वजह से सर्दियों की रातों में सहारा का तापमान बहुत तेजी से गिरता है। ऐन सेफ्रा इलाके में जब बर्फबारी हुई तब रात का तापमान गोठणबिंदु से नीचे जाकर -2 डिग्री सेल्सियस से -3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। जब तापमान शून्य से नीचे चला जाता है और हवा में नमी मौजूद हो, तो पानी की बूंदें जमकर बर्फ के क्रिस्टल में बदल जाती हैं और बर्फबारी के रूप में जमीन पर गिरती हैं।
ऐन सेफ्रा में ही यह घटना होने के पीछे वहां की भौगोलिक बनावट की बड़ी भूमिका है। यह शहर समुद्र तल से करीब 1,000 मीटर यानी 3,000 फुट की ऊंचाई पर बसा है और इसके चारों तरफ एटलस पर्वत श्रृंखला है। जब महासागर से आने वाली नम हवा इन ऊंचे पहाड़ों से टकराती है, तो वह ऊपर की तरफ बढ़ती है। हवा जितनी ऊपर जाती है, उतनी ही ठंडी होती जाती है, जिससे हवा में मौजूद भाप का बर्फ में बदलना आसान हो जाता है।
हालांकि, रेगिस्तान में गिरी यह बर्फ ज्यादा देर टिक नहीं पाती। सूरज निकलने के बाद रेगिस्तान की तेज धूप और जमीन की गर्मी की वजह से बर्फ कुछ घंटों में ही तेजी से पिघलने लगती है। सर्दियों की कड़ाके की ठंड वाली रातें और दिन का गर्म मौसम, इन्हीं रेगिस्तानी खासियतों की वजह से यह बर्फ ज्यादा देर नहीं टिकती, लेकिन उतने थोड़े समय में भी प्रकृति का यह अनोखा कमाल देखने को मिल जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक सिर्फ एक बर्फबारी की घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का सबूत मानना ठीक नहीं होगा। फिर भी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जेट स्ट्रीम के बहाव में हो रहे बदलावों का ऐसी असामान्य मौसमी घटनाओं पर कुछ हद तक असर पड़ता हो सकता है, इस पर वैज्ञानिक अभी अध्ययन कर रहे हैं।