सायबेरिया के अँटी-प्लेग इंस्टिट्यूट की महिला रिसर्चर की अचानक मौत से उठे सवाल
सायबेरिया के प्रमुख अँटी-प्लेग रिसर्च इंस्टिट्यूट में काम करने वाली डारया शिपिलोवा की संदिग्ध और अचानक मौत से दुनिया भर के वैज्ञानिक हैरान हैं।
प्लेग यानी 'ब्लैक डेथ' का नाम सुनते ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। चौदहवीं सदी में इस बीमारी ने दुनिया की एक तिहाई आबादी की जान ले ली थी। विज्ञान की तरक्की से इस पर काबू पा लिया गया और आज इसे इतिहास का एक काला अध्याय माना जाता है।
लेकिन हाल ही में रूस के सायबेरिया इलाके से आई एक खबर ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और रिसर्चरों को चौंका दिया है। सायबेरिया के प्रमुख अँटी-प्लेग रिसर्च इंस्टिट्यूट में काम करने वाली महिला रिसर्चर डारया शिपिलोवा की संदिग्ध और अचानक मौत हो गई, जिससे हर तरफ हैरानी जताई जा रही है।
सवाल उठ रहा है कि जब प्लेग दुनिया से लगभग खत्म हो चुका है, तो रूस की इन गुप्त और बेहद संवेदनशील संस्थाओं में आज भी इस पर रिसर्च क्यों चल रही है। सायबेरिया अपनी भीषण ठंड और दुर्गम इलाकों के लिए जाना जाता है। सर्दियों में यहां का तापमान 0 से माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। ऐसे बर्फ से ढके और सुनसान माहौल में रूस आखिर क्या छिपा रहा है, यह सवाल पूछा जा रहा है। यह सिर्फ एक रिसर्चर की मौत नहीं है, बल्कि दुनिया भर के मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए एक चेतावनी भी है कि कुदरत और लैब के बीच का खेल कितना खतरनाक हो सकता है।
सायबेरिया का नाम आते ही बर्फ की सफेद चादर और हड्डियां जमा देने वाली ठंड याद आती है। यहां तापमान अक्सर माइनस में रहता है। रूस ने इसी ठंडे और सुनसान इलाके में एक बेहद गुप्त और हाई सिक्योरिटी वाला रिसर्च इंस्टिट्यूट बनाया है, जहां दुनिया की सबसे खतरनाक और जानलेवा बीमारियों पर रिसर्च होती है। इस इंस्टिट्यूट का नाम 'अँटी-प्लेग इंस्टिट्यूट' है। रूस का यह हिस्सा इतना अलग-थलग है कि अगर यहां कोई खतरनाक वायरस या बैक्टीरिया लीक भी हो जाए, तो वह फौरन आम आबादी तक नहीं पहुंच सकता। सोवियत दौर के युद्ध के समय से ही सायबेरिया को बायोलॉजिकल रिसर्च का केंद्र माना जाता रहा है।
प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया वक्त के साथ खुद को बदल सकते हैं। इसी वजह से, आधुनिक मेडिकल साइंस ने भले ही इस पर काबू पा लिया हो, रूस इस पर रिसर्च कर रहा है। जैविक हथियारों की होड़ और आगे आने वाली अनजान महामारियों के खतरे से निपटने के लिए रूस अपनी तैयारी मजबूत रखना चाहता है।
ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से सायबेरिया में जमी हुई बर्फ पिघल रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सदियों से इस बर्फ के नीचे दबे पुराने बैक्टीरिया और वायरस फिर से जिंदा हो सकते हैं। इसलिए रूसी वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि प्राचीन प्लेग या कोई नया म्यूटेंट वायरस माहौल में लौट आए, तो इंसानी शरीर पर उसका क्या असर होगा। इसी पृष्ठभूमि में सायबेरिया की उस लैब में रिसर्च चल रही थी, जो अब हादसे या लापरवाही की शिकार हो गई है।