चीन टैक्स छूट घटाकर यूरोप पर बना सकता है दबाव, इलेक्ट्रिक कारों पर नजर
चीन और यूरोपियन यूनियन के बीच गाड़ियों के कारोबार की खींचतान अब सिर्फ आयात शुल्क और इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं रही।
चीन और यूरोपियन यूनियन के बीच गाड़ियों के कारोबार को लेकर चल रही खींचतान अब सिर्फ आयात शुल्क और इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं रह गई है। चीन अपने इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्यात कर में मिलने वाली छूट घटाने की संभावना को यूरोप के साथ चल रही व्यापार बातचीत में दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
एक विश्लेषण सामने आया है, जिसके मुताबिक चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्यात पर अभी करीब 13 टक्के की कर छूट मिलती है। इसे धीरे-धीरे कम करने पर विचार चल रहा है।
चीन में बनने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्यात पर मिलने वाली यह छूट गाड़ी कंपनियों के मुनाफे में अहम रोल निभाती है। छूट कम हुई या बंद हो गई, तो चीन से यूरोप को कार भेजने वाली कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
बड़ी कंपनियां अपनी कीमत, तकनीक और ब्रांड की ताकत के दम पर यह झटका झेल सकती हैं। लेकिन छोटे निर्माताओं पर इसका ज्यादा असर पड़ने की आशंका है। इसलिए छूट घटाने का फैसला चीन के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि व्यापार नीति का एक अहम विकल्प भी बन सकता है।
यूरोपियन यूनियन पहले ही चीन से आने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुकी है। EU का तर्क है कि चीनी गाड़ी कंपनियों को सरकारी मदद का फायदा मिलता है, जिससे यूरोपीय निर्माताओं पर दबाव आ रहा है। अब चीन ने भी यूरोप की तरफ से आ रहे व्यापारिक दबाव का जवाब देने के लिए कई विकल्प खुले रखे हैं।
खास तौर पर चीनी हाइब्रिड वाहनों की यूरोप में बिक्री पर पाबंदी लगाने की चर्चा का बीजिंग ने विरोध किया है। चीन का रुख है कि कोई भी निर्यात पाबंदी WTO के नियमों के मुताबिक हो और दोनों पक्षों के हितों का ध्यान रखकर ही लगाई जाए।
चीन-EU टकराव का असर सिर्फ गाड़ियों के क्षेत्र तक सीमित रहने की संभावना कम है। दुर्लभ खनिजों और उनकी प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पर चीन का बड़ा नियंत्रण है। इलेक्ट्रिक कार, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा क्षेत्र के लिए जरूरी इन खनिजों की सप्लाई पर पाबंदी लगाने की क्षमता चीन के पास है।
इस वजह से यूरोप के लिए चीन पर निर्भरता एक अहम आर्थिक और औद्योगिक मुद्दा बन गई है। इस बीच EU का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़ रहा है और 2025 में यह करीब 360.6 अब्ज यूरो तक पहुंच गया था। इसलिए ब्रुसेल्स की तरफ से चीन पर व्यापारिक दबाव बढ़ने की संभावना है, और बीजिंग की तरफ से उसका जवाब भी मिल सकता है।