राष्ट्रीय विरामचिन्ह दिवस: 24 सितंबर को समझिए कॉमा और फुलस्टॉप जैसे चिन्हों की अहमियत
हर साल 24 सितंबर को मनाया जाने वाला 'राष्ट्रीय विरामचिन्ह दिवस' भाषा में सही जगह पर कॉमा, फुलस्टॉप और सवालिया निशान लगाने की अहमियत की याद दिलाता है, ताकि लिखने वाले की बात वैसी ही समझ आए जैसा वो कहना चाहता है।
बोलते वक्त हम कहां रुकना है, कैसे आवाज में उतार-चढ़ाव लाना है और अपनी बात कैसे कहनी है, ये सब अपने आप समझ आ जाता है। लेकिन वही बात जब हम कागज पर या मोबाइल-कंप्यूटर की स्क्रीन पर लिखते हैं, तो ये सारा काम विरामचिन्ह करते हैं। भाषा में शब्दों का जितना महत्व है, उतना ही या उससे भी ज्यादा महत्व उन शब्दों के बीच के भाव को सही ढंग से पहुंचाने वाले विरामचिन्हों का होता है। इन्हीं विरामचिन्हों की भाषा में जगह, इनकी सटीकता और अहमियत को रेखांकित करने के लिए हर साल 24 सितंबर को 'राष्ट्रीय विरामचिन्ह दिवस' यानी National Punctuation Day पूरे उत्साह से मनाया जाता है।
विरामचिन्ह सिर्फ लिखने के निशान भर नहीं हैं, बल्कि ये भाषा की सांस हैं। अगर किसी वाक्य में सही जगह पर कॉमा, फुलस्टॉप या विस्मयादिबोधक चिन्ह न लगा हो, तो पढ़ने वाले के लिए लिखने वाले की असली बात समझना मुश्किल हो जाता है। कई बार एक छोटे से कॉमा की गलत जगह की वजह से पूरे वाक्य का मतलब उलटा हो जाता है या अनर्थ हो जाता है। यही वजह है कि छात्रों, लेखकों, पत्रकारों, टीचरों और डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर लगातार लिखने वाले हर आम इंसान के लिए विरामचिन्हों की सही जानकारी होना बहुत जरूरी हो गया है।
विरामचिन्हों का हमारी जिंदगी में कितना बड़ा रोल है, ये समझने के लिए एक आसान सा उदाहरण काफी है। "भागो, भागो पकड़ो मत" इस वाक्य में अगर "भागो भागो," के बाद कॉमा लगाया जाए, तो इसका मतलब बनता है 'भाग जाओ, पकड़ो मत।' लेकिन अगर वही कॉमा "भागो, भागो पकड़ो," के बाद लगाया जाए, तो मतलब पूरी तरह बदल जाता है और बनता है 'भागने वाले को पकड़ो।' विरामचिन्हों में यही जादू और ताकत छुपी है।
कॉमा (,), फुलस्टॉप (.), सवालिया निशान (?), विस्मयादिबोधक चिन्ह (!), और एकहरे या दोहरे कोटेशन चिन्ह ("" / '') जैसे बुनियादी चिन्हों का सही इस्तेमाल किया जाए, तो लिखी हुई बात पढ़ने वाले तक आसानी से और सहज तरीके से पहुंचती है। गलत विरामचिन्ह लगाने से पढ़ने वाला कंफ्यूज हो जाता है और भाषा की क्वालिटी भी गिरती है। इसीलिए भाषा में साफगोई और सटीकता बनाए रखने के लिए इन चिन्हों की सही जानकारी होना जरूरी है।
24 सितंबर को मनाया जाने वाला 'राष्ट्रीय विरामचिन्ह दिवस' लोगों को अपने लिखने का स्तर सुधारने का मौका देता है। इस मौके पर देशभर के अलग-अलग शिक्षण संस्थानों, भाषा के जानकारों और साहित्यिक संगठनों की तरफ से कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्कूल और कॉलेजों में स्टूडेंट्स के लिए निबंध प्रतियोगिताएं, वाक्य बनाने की स्पर्धाएं और 'शुद्धलेखन और विरामचिन्ह' विषय पर एक्सपर्ट्स के लेक्चर रखे जाते हैं। आज के डिजिटल दौर में मैसेजिंग ऐप्स और सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल की वजह से अक्सर जल्दबाजी में लिखते वक्त विरामचिन्हों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। लोग शॉर्टकट इस्तेमाल करने पर ज्यादा जोर देते हैं, जिस वजह से भाषा की असली खूबसूरती कम होती जा रही है। ऐसे में राष्ट्रीय विरामचिन्ह दिवस हमें ये याद दिलाता है कि भाषा सिर्फ शब्दों की बनावट नहीं है, बल्कि विरामचिन्हों की वजह से उसमें असली जान और मतलब आता है।
आज की इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के दौर में ऑफिशियल ई-मेल, न्यूज लिखने, ब्लॉग्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स में सही भाषा को बहुत अहमियत दी जाती है। गूगल जैसे सर्च इंजिन पर ऊंची रैंकिंग पाने के लिए भी लिखी हुई सामग्री का ढांचा साफ और पढ़ने वाले को समझ आने लायक होना जरूरी होता है। सही विरामचिन्हों की वजह से लिखे हुए की पढ़ने में आसानी बढ़ती है, जिससे पढ़ने वाला उस लेख पर ज्यादा वक्त बिताता है। आखिर में, राष्ट्रीय विरामचिन्ह दिवस हमें अपनी भाषा का सम्मान करने और लिखने में अनुशासन लाने के लिए प्रेरित करता है। नेचुरल, सटीक और इंसानी भावनाओं से जुड़ा हुआ लेखन करने का एक ही रास्ता है, और वो है विरामचिन्हों का सही अभ्यास।