पुराने लीज वाली नवी मुंबई की सोसायटियों से सिडको नहीं ले सकेगा ट्रांसफर फीस, हाईकोर्ट का फैसला
मुंबई हाईकोर्ट ने कहा कि 8 फरवरी 1990 से पहले की लीज वाली सोसायटियों से, जिनके मूल करार में ट्रांसफर शुल्क की शर्त नहीं थी, सिडको यह शुल्क नहीं मांग सकता। राहत हर सोसायटी पर अपने आप लागू नहीं होगी।
नवी मुंबई की हाउसिंग सोसायटियों के फ्लैट मालिकों के लिए मुंबई हाईकोर्ट का एक अहम फैसला आया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जिन सोसायटियों की जमीन का पट्टा यानी लीज 8 फरवरी 1990 से पहले हुई थी और जिनके मूल करार में फ्लैट ट्रांसफर शुल्क की कोई शर्त नहीं थी, उनसे सिडको यह शुल्क नहीं मांग सकता। इस फैसले से पुराने लीज करारों पर बाद के नियमों के सहारे आर्थिक बोझ डालने के सिडको के अधिकार पर रोक लगी है।
हालांकि यह राहत सभी सोसायटियों को अपने आप नहीं मिलेगी। हर सोसायटी को यह लाभ मिलेगा या नहीं, यह उसके मूल करार की शर्तों और तारीखों पर निर्भर करेगा।
मामला क्या था, यह समझ लें। नवी मुंबई में हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट की मालकियत या सदस्यता का हक एक व्यक्ति से दूसरे को जाता है तो सिडको शुल्क लेता है। लेकिन कुछ पुरानी सोसायटियों के मूल लीज करार में फ्लैट ट्रांसफर के लिए सिडको की इजाजत लेने या ट्रांसफर शुल्क भरने की कोई शर्त थी ही नहीं। ऐसे में हाईकोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या बाद में नियम बदलकर पुराने करारों पर भी यह शुल्क लगाया जा सकता है। इस पर जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की बेंच ने फैसला सुनाया।
विवाद की शुरुआत नेरुल की मनमंदिर को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी से हुई। सिडको के एस्टेट ऑफिसर ने एक पत्र भेजकर सोसायटी से 27 फ्लैटों के ट्रांसफर के लिए 24.58 लाख रुपये मांगे थे। सोसायटी का दावा था कि मूल लीज करार में ऐसा शुल्क भरने की कोई शर्त नहीं है, और वह कोर्ट पहुंची। इसी मामले में वाशी की सूर्या को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी और नवी मुंबई को-ऑपरेटिव हाउसिंग फेडरेशन ने भी याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गायत्री सिंह ने पैरवी की।
न्यू बॉम्बे डिस्पोजल ऑफ लैंड्स रेग्युलेशंस, 1975 में 8 फरवरी 1990 को संशोधन किया गया था। इसी संशोधन में फ्लैट ट्रांसफर के लिए मंजूरी लेने और ट्रांसफर शुल्क भरने जैसी बातें जोड़ी गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस संशोधन से पहले हुए लीज करारों और उनकी शर्तों को बदलने के लिए इन नियमों को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। उनकी दलील थी कि जो आर्थिक जिम्मेदारी मूल करार में है ही नहीं, उसे बाद में थोपना ठीक नहीं।
सिडको ने याचिकाओं का विरोध किया। उसकी दलील थी कि ये जमीनें सोसायटियों को रियायती दर पर दी गई थीं और फ्लैटों के ट्रांसफर को नियम के दायरे में रखने के लिए शुल्क का प्रावधान किया गया। सिडको ने यह भी कहा कि इस संशोधन से पहले के नियमों की बस सफाई की गई है।
हाईकोर्ट ने सिडको की यह दलील नहीं मानी। कोर्ट ने कहा कि 1990 का संशोधन, जिसने ट्रांसफर के लिए इजाजत लेना और शुल्क भरना जरूरी किया, एक अहम प्रावधान था। इसे सिर्फ स्पष्टीकरण वाला संशोधन नहीं माना जा सकता। कोर्ट का निष्कर्ष रहा कि जब मूल लीज करार में ट्रांसफर शुल्क की शर्त नहीं थी, तो बाद के नियमों के आधार पर पुराने करारों पर नई आर्थिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
अब सवाल यह कि क्या नवी मुंबई की सभी 2,528 हाउसिंग सोसायटियों को राहत मिलेगी। जवाब है, अपने आप नहीं। कोर्ट का फैसला सिर्फ दो संबंधित सोसायटियों, मनमंदिर और सूर्या, तक सीमित है। बाकी सोसायटियों को इसका फायदा चाहिए तो उन्हें अपने लीज करार की तारीख, मूल शर्तें और ट्रांसफर शुल्क से जुड़े प्रावधान जांचने होंगे। यानी पुरानी सोसायटियों के लिए फैसला अहम है, लेकिन हर सोसायटी की पात्रता अलग से तय होगी।