बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

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22:00 IST

नवरात्रि पर अभिज्ञा भावे बोलीं, स्त्रीशक्ति सिर्फ देवी की पूजा नहीं, बराबरी का सम्मान भी है

'तारिणी' सीरियल में कौशिकी की भूमिका निभा रहीं अभिनेत्री अभिज्ञा भावे ने नवरात्रि के मौके पर स्त्रीशक्ति का मतलब समझाया।

नवरात्रि पर अभिज्ञा भावे बोलीं, स्त्रीशक्ति सिर्फ देवी की पूजा नहीं, बराबरी का सम्मान भी है तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नवरात्रोत्सव को आदिशक्ति का जागर, स्त्रीत्व का सम्मान और स्त्रीशक्ति का उत्सव माना जाता है। इन नौ दिनों में देवी के अलग-अलग रूपों की आराधना होती है। 'तारिणी' धारावाहिक में कौशिकी की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री अभिज्ञा भावे का कहना है कि स्त्रीशक्ति का असली मतलब सिर्फ देवी की पूजा तक सीमित नहीं है। उसमें स्त्री को बराबरी से देखना, उसके विचारों का आदर करना और उसे अपनी इच्छा के मुताबिक जिंदगी जीने की आजादी देना भी शामिल है।

'तारिणी' में कौशिकी एक निडर और जोशीली मीडिया हाउस की मालकिन है। वह अपना न्यूज चैनल चलाती है और अपने काम और फैसलों से अपनी अलग पहचान बनाती है। इसी किरदार के बहाने अभिज्ञा भावे ने स्त्रीशक्ति, समाज में स्त्रियों की जगह और महिलाओं के एक-दूसरे को समझने की अहमियत पर अपनी बात रखी।

स्त्रीशक्ति का मतलब बताते हुए अभिज्ञा ने कहा, "मेरे लिए स्त्रीशक्ति वह है जब पुरुष सच में स्त्री का मान रखते हैं और उसकी शक्ति को समझने की कोशिश करते हैं। स्त्रीशक्ति सिर्फ स्त्रियों के समझने की बात नहीं है। पुरुषों को भी इसे संभालकर रखना चाहिए। स्त्रीशक्ति का मतलब यह नहीं कि हम महिलाओं को अपनी शक्ति दिखानी है; हमारा कहना बस इतना है कि हमें भी बराबर समझिए, हमें हमारी जिंदगी जैसे जीनी है वैसे जीने दीजिए।"

उन्होंने आगे कहा कि समाज को स्त्रीशक्ति को बगावत की नजर से देखने के बजाय उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। उनके मुताबिक स्त्री का सम्मान और उसकी आजादी को स्वीकार करना ही देवी की आराधना का असली हिस्सा है।

अभिज्ञा ने महिलाओं के आपसी सहयोग की अहमियत भी बताई। समाज में स्त्रियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, ऐसे में उनका मानना है कि महिलाओं को एक-दूसरे के साथ खड़ा होना जरूरी है।

इस बारे में अभिज्ञा ने कहा, "मुझे लगता है कि आज के वक्त में सबसे बड़ी जरूरत यह है कि एक स्त्री दूसरी स्त्री को समझे। पूरा समाज हमारे खिलाफ है, उसमें अगर हम भी बंट गए, तो हमारा ही जीना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कम से कम एक-दूसरे को समझने की कोशिश तो करनी चाहिए।"

अगर कोई स्त्री तय दायरे से बाहर जाकर जिंदगी जीती है, तो उसे नकारात्मक नजर से देखा जाता है। अभिज्ञा ने कहा कि इस सोच में बदलाव की जरूरत है। घर हो, कारोबार हो, पढ़ाई हो या समाज का कोई भी क्षेत्र, हर स्त्री को दूसरी स्त्री का साथ मिलना जरूरी है।

अभिज्ञा को लगता है कि स्त्रीशक्ति का अनुभव किसी खास दिन या त्योहार तक सीमित नहीं होता, वह रोज की जिंदगी में महसूस होता है। स्त्री को अक्सर हर फैसला लेते समय कई बातें सोचनी पड़ती हैं। अपनी सुरक्षा से लेकर समाज की अपेक्षाओं तक, कई चुनौतियों से जूझते हुए वह अपनी जिंदगी जीती है।

इस पर अभिज्ञा ने कहा, "'देवीशक्ति' या 'स्त्रीशक्ति' का अनुभव हर पल होता रहता है। आज की दुनिया में कोई भी फैसला लेते समय पुरुष को जिन बातों का सामना करना पड़ता है, उससे ज्यादा चुनौतियां स्त्री के सामने होती हैं, ऐसा मुझे लगता है। स्त्री को बहुत कुछ संभालकर, दबकर, बहुत गहराई से सोचकर और हर चीज को नापतौलकर जिंदगी जीनी पड़ती है। फिर भी वह जीती है, हम जीते हैं, यही मेरे लिए स्त्रीशक्ति है।"

उन्होंने यह भी कहा कि मन में डर और कई तरह के विचार होने के बावजूद जिंदगी में खुशी तलाशते हुए आगे बढ़ना, स्त्रीशक्ति की सुंदर मिसाल है।

नवरात्रोत्सव की परंपराओं के बारे में बात करते हुए अभिज्ञा ने अपने घर के सादे सेलिब्रेशन का जिक्र किया। उनके घर में नवरात्रि पर कोई बड़ा सेलिब्रेशन नहीं होता। वे देवी के दर्शन करती हैं, देवी की झांकियां देखती हैं और घर की देवी की पूजा करती हैं। इसी सादे ढंग से वे यह त्योहार मनाती हैं।

अपने नवरात्रोत्सव के बारे में अभिज्ञा ने कहा, "वैसे देखा जाए तो हमारे घर में नवरात्रि का कोई खास सेलिब्रेशन नहीं होता। देवी के दर्शन के लिए जाना, देवी की झांकियां देखना, बस इतना होता है। गरबा खेलने में मुझे ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। इसलिए नवरात्र मेरे लिए घर की देवी की शांत, सादी और आसान पूजा तक ही है। लेकिन इस त्योहार से मुझे प्रसन्नता मिलती है।"

नवरात्रोत्सव के मौके पर अभिज्ञा भावे के रखे विचार स्त्रीशक्ति को देखने का एक अहम नजरिया सामने रखते हैं। स्त्रीशक्ति सिर्फ ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि बराबरी का आदर, अपनी इच्छा से जिंदगी जीने की आजादी और एक-दूसरे को समझने की भावना है। देवी की आराधना करते हुए अपने आसपास की स्त्रियों का सम्मान करना, उनके फैसलों का आदर करना और जरूरत पर उनके साथ खड़े रहना, इसी से स्त्रीशक्ति का सच्चा उत्सव मनाया जा सकता है।

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