मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:59 IST

नवजात दिखे तंदुरुस्त, लेकिन अंदरखाने मेटाबॉलिक बीमारी छुपी हो सकती है: स्क्रीनिंग क्यों जरूरी

नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग और मेटाबॉलिक बीमारियों की जल्दी पहचान पर रिपोर्ट।

नवजात दिखे तंदुरुस्त, लेकिन अंदरखाने मेटाबॉलिक बीमारी छुपी हो सकती है: स्क्रीनिंग क्यों जरूरी
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

बाहर से बिल्कुल हेल्दी दिखने वाले नवजात बच्चे के अंदर भी कोई मेटाबॉलिक बीमारी छुपी हो सकती है। जन्म के बाद पहले कुछ घंटों या दिनों में कुछ अनुवंशिक मेटाबॉलिक बीमारियां बाहर से बिल्कुल नजर नहीं आतीं, जबकि शरीर के अंदर नुकसानदायक तत्व जमा हो सकते हैं या शरीर को जरूरी कोई बायोकेमिकल तत्व कम हो सकता है। इसीलिए बच्चे की सामान्य और फिजिकल जांच के साथ-साथ लैबोरेटरी स्क्रीनिंग करना भी जरूरी बताया गया है।

भारत में बाल स्वास्थ्य से जुड़ी राष्ट्रीय योजनाओं में ऐसी बीमारियों की जल्दी पहचान की अहमियत को माना गया है, लेकिन मेटाबॉलिक बीमारियों के लिए ड्राइड ब्लड स्पॉट स्क्रीनिंग पूरे देश में एक जैसी अनिवार्य नहीं है। यानी यह सुविधा इस पर निर्भर करती है कि आप किस राज्य में हैं, बच्चे का जन्म किस अस्पताल में हुआ है और वहां कौन सी सुविधाएं मौजूद हैं। गंभीर और इलाज योग्य बीमारियों के लिए एक तय नेशनल न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग पैनल होना, उसके साथ आगे की जांच, एक्सपर्ट डॉक्टरों के पास रेफरल और इलाज की उपलब्धता होना पब्लिक हेल्थ के लिहाज से बेहद जरूरी है।

मेटाबॉलिज्म का मतलब है शरीर में होने वाली वे केमिकल प्रोसेस, जिनसे खाए हुए भोजन से एनर्जी और शरीर की ग्रोथ के लिए जरूरी तत्व बनते हैं। इन प्रोसेस के सही तरीके से चलने के लिए एंजाइम्स की जरूरत होती है। अनुवंशिक मेटाबॉलिक बीमारियों में शरीर का कोई खास एंजाइम या ट्रांसपोर्ट प्रोटीन कम हो सकता है या ठीक से काम नहीं करता, जिससे शरीर कार्बोहाइड्रेट, फैट या प्रोटीन के कुछ तत्वों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता।

जन्म के समय बच्चा नॉर्मल इसलिए दिख सकता है क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान मां के शरीर की प्लेसेंटा और मेटाबॉलिज्म बच्चे के खून में मौजूद कुछ पदार्थों को रेगुलेट या शरीर से बाहर निकालते रहते हैं। जन्म के बाद बच्चे के शरीर को यह काम खुद करना पड़ता है, इसलिए कुछ बीमारियों के लक्षण नियमित दूध पिलाना शुरू होने के बाद, बच्चे के कुछ समय भूखे रहने पर या इंफेक्शन का एक्स्ट्रा स्ट्रेस आने पर सामने आ सकते हैं। ऐसे में शरीर में कुछ असामान्य तत्व जमा हो सकते हैं, जिसका असर दिमाग, लिवर, दिल या दूसरे अंगों पर पड़ सकता है।

न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग से फिनाइलकेटोन्यूरिया (पीकेयू), गैलेक्टोसीमिया, मेपल सिरप यूरिन डिजीज, बायोटिनिडेज डेफिशिएंसी और कुछ फैटी एसिड ऑक्सिडेशन डिसऑर्डर जैसी दुर्लभ बीमारियों की पहचान में मदद मिल सकती है। इन बीमारियों में बच्चा जन्म के समय पूरी तरह हेल्दी लग सकता है और तुरंत कोई लक्षण नहीं दिखते, लेकिन जल्दी पहचान और सही समय पर इलाज से गंभीर सेहत समस्याएं और कई बार लंबे समय की या हमेशा के लिए रहने वाली दिक्कतें टाली या कम की जा सकती हैं। हर मेटाबॉलिक बीमारी का इलाज अलग होता है, कभी कुछ चीजें खाने से परहेज, कभी स्पेशल डाइट या फॉर्मूला, तो कभी हार्मोन रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ सकती है।

स्क्रीनिंग टेस्ट का रिजल्ट नॉर्मल रेंज से बाहर आने का मतलब यह नहीं कि बच्चे को बीमारी है ही। इसका मतलब है कि आगे की क्लिनिकल जांच और कन्फर्मेटरी टेस्ट तुरंत कराना जरूरी है, और कई बार आगे की जांच के बाद रिपोर्ट नॉर्मल भी आ सकती है। कोई बीमारी कन्फर्म होने के बाद उसी हिसाब से इलाज तय किया जाता है। जेनेटिक काउंसलिंग से परिवार को यह समझने में मदद मिलती है कि बीमारी अनुवंशिक रूप से कैसे आगे बढ़ सकती है, अगली प्रेगनेंसी में इसका खतरा कितना हो सकता है और जेनेटिक टेस्टिंग के कौन से ऑप्शन मौजूद हैं। जल्दी पहचान और सही इलाज-देखभाल से बच्चे की सेहत और विकास पर पड़ने वाले लंबे असर में काफी सुधार हो सकता है।

न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग से हर मेटाबॉलिक बीमारी की पहचान हो ही जाएगी, ऐसा जरूरी नहीं, इसलिए डॉक्टर की क्लिनिकल जांच जरूरी है। फिर भी पैरेंट्स के लिए अपने नवजात बच्चे की स्क्रीनिंग करवाना अहम बताया गया है। बच्चा बाहर से हेल्दी दिखना अच्छी बात है, लेकिन इससे उसकी सेहत की पूरी जानकारी नहीं मिलती। न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग खून की कुछ बूंदों से, कम समय में होने वाला एक ऐसा मौका है, जिससे कुछ छुपी हुई बीमारियां हमेशा के लिए नुकसान होने से पहले पकड़ी जा सकती हैं। सही समय पर की गई जांच, उसके बाद सही फॉलो-अप और इलाज बच्चे के भविष्य के लिए बड़ा फर्क ला सकते हैं।

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