मुंबई की ड्रैग आर्टिस्ट संस्कृति सावंत बोलीं, खुद को अपनाना सबसे बड़ी बात
संकेत सावंत से जेंटलमन गागा और फिर संस्कृति सावंत बनने तक का सफर, नवदुर्गा पॉडकास्ट में खुलकर सुनाया।
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मुंबई की मशहूर ड्रैग आर्टिस्ट संस्कृति सावंत ने अपनी पहचान बनाने का सफर खुलकर सुनाया। समाज के दायरे, लोगों की नजरें और अपने वजूद को लेकर उठते कई सवाल, इन सबके बीच अपनी पहचान बनाना आसान नहीं होता। फिर भी संस्कृति ने अपनी भावनाओं को अपनाकर उन्हें दुनिया के सामने रखने की हिम्मत दिखाई। उनका सफर संकेत सावंत से शुरू होकर जेंटलमन गागा और फिर संस्कृति सावंत तक पहुंचा। यह सिर्फ नाम या बाहरी रूप का बदलाव नहीं है। यह कला, खुद को खोजने और खुद को जाहिर करने का सफर है।
नवरात्रि उत्सव के छठे दिन के लिए रखे गए इस खास नवदुर्गा पॉडकास्ट में संचालिका लीनल देशमुख ने संस्कृति से बातचीत की। संस्कृति ने बताया कि सफर संकेत नाम से शुरू हुआ था। फिर जेंटलमन गागा के तौर पर पहचान मिली और आखिर में उन्होंने संस्कृति सावंत नाम क्यों अपनाया, यह भी उन्होंने बताया।
नाम के बारे में बात करते हुए संस्कृति ने मराठी संस्कृति, परंपरा और परिवार से अपने रिश्ते की बात की। उन्होंने कहा कि वे सावंत परिवार से आती हैं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर उन्हें गर्व है। बचपन से घर के संस्कार, धार्मिक परंपराएं और भारतीय संस्कृति का असर उनके व्यक्तित्व पर रहा है। ड्रैग आर्टिस्ट के तौर पर काम शुरू करने के बाद उन्हें भारतीय संस्कृति की अलग-अलग चीजें अपनी प्रस्तुति में लाने का शौक हुआ। इसीलिए अपने व्यक्तित्व और जड़ों से जुड़ा नाम संस्कृति चुना, यह उन्होंने साफ किया।
संस्कृति को जेंटलमन गागा नाम से भी जाना जाता है। गागा शब्द से जुड़ा अलगपन और थोड़ा मस्तमौला स्वभाव उनके व्यक्तित्व से मेल खाता है। उनके कलात्मक सफर में इसी नाम से उन्हें पहचान मिली। संस्कृति नाम अपनाने के बाद भी कई लोग प्यार से उन्हें गागा ही कहते रहे। संस्कृति के मुताबिक अपना व्यक्तित्व छुपाने के बजाय उसके अलगपन को अपनाना ज्यादा जरूरी है।
इस बातचीत का सबसे अहम मुद्दा अपने वजूद को स्वीकार करना रहा। संस्कृति ने कहा कि समाज किसी को अपनाएगा या नहीं, इससे ज्यादा जरूरी है कि वह इंसान खुद को अपनाए। पॉडकास्ट से उन्होंने संदेश दिया, "दुनिया आपको अपनाए या न अपनाए, सबसे जरूरी यह है कि आप खुद को अपनाएं।" लैंगिक पहचान, खुद को जाहिर करने की आजादी और समाज की उम्मीदों पर बोलते हुए उन्होंने अपने वजूद पर भरोसा रखने पर जोर दिया।
मुंबई का जिक्र आते ही संस्कृति भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि इस शहर ने उन्हें प्यार दिया और उनके अलगपन के साथ अपनाया। काम के सिलसिले में दूसरी जगह जाना पड़े, तब भी वे लौटकर मुंबई ही आएंगी। उनके लिए मुंबई सिर्फ काम का शहर नहीं, उनकी जिंदगी और पहचान का अहम हिस्सा है।
मनोरंजन क्षेत्र के अनुभवों पर भी उन्होंने बात की। उन्हें इस क्षेत्र में करीब 13 साल हो गए हैं और इस दौरान कई तरह के काम करने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि मनोरंजन क्षेत्र में उन्हें निजी स्तर पर परेशान करने वाला कोई अनुभव नहीं हुआ। काम के दौरान उनकी कला, मेहनत और व्यक्तित्व को अहमियत मिली, ऐसा उन्होंने कहा।
संस्कृति को बचपन से नृत्य और कला का शौक था। स्कूल और कॉलेज के दिनों में उन्होंने कई नृत्य और चित्रकला प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। अपने बेधड़क स्वभाव के बारे में उन्होंने कहा, "मेरी डिक्शनरी में शर्म नाम का शब्द ही नहीं है।" नृत्य और संगीत उनकी जिंदगी का अटूट हिस्सा हैं, इसलिए ड्रैग आर्टिस्ट के तौर पर काम करना उसी कलात्मक सफर का एक हिस्सा है। उनके मुताबिक ड्रैग सिर्फ अलग वेशभूषा बनाने की कला नहीं है। उसमें संगीत, नृत्य, अभिनय, फैशन और खुद को रचनात्मक ढंग से जाहिर करना भी शामिल है।
संस्कृति ने बताया कि वे पिछले सात से आठ साल से ड्रैग शो कर रही हैं। ड्रैग परफॉर्मेंस के अलावा होस्टिंग, स्टाइलिंग और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसिंग में भी सक्रिय हैं। वे "गली फैशन" कार्यक्रम का संचालन भी करती हैं। कलाकार के तौर पर अपना शौक निभाते हुए रोजी-रोटी के लिए अलग-अलग काम करने पड़ते हैं। ड्रैग, स्टाइलिंग, होस्टिंग और इन्फ्लुएंसिंग, ये सब उनके पेशेवर सफर का हिस्सा हैं।
पॉडकास्ट में संस्कृति ने भारतीय संस्कृति की अर्धनारीश्वर की संकल्पना का भी जिक्र किया। भारतीय परंपरा में अर्धनारीश्वर का रूप माना जाता है और कई धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में स्त्री और पुरुष तत्वों की एकता दिखती है। लेकिन असल समाज में अलग लैंगिक पहचान या अभिव्यक्ति वाले लोगों को आसानी से नहीं अपनाया जाता। संस्कृति ने इसी विरोधाभास की ओर ध्यान खींचा। उनकी बातों से सामने आया कि समाज में ऐसे लोगों के लिए ज्यादा समझ, संवेदनशीलता और सम्मान की जरूरत है।
नवरात्रि उत्सव में स्त्रीशक्ति के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। इस बातचीत से यह विचार उभरा कि किसी की पहचान और वजूद को अपनाना सिर्फ उत्सव तक सीमित न रहे, वह असल जिंदगी में भी दिखना चाहिए। संस्कृति का सफर कला से अपनी पहचान बनाने, सांस्कृतिक जड़ों को संभालने और भरोसे के साथ जीने का सफर है। उनके अनुभव से यही संदेश मिलता है कि समाज क्या कहेगा, इससे ज्यादा मायने इसके हैं कि हम खुद को कैसे देखते हैं और अपने वजूद की कितनी इज्जत करते हैं।