मुंबई के कोलीवाड़ों की 12 साल से अटकी सीमा तय करने की प्रक्रिया तीन महीने में पूरी होगी
राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने मुंबई के कोलीवाड़ों की हदें तय करने का काम तीन महीने में पूरा करने का फैसला लिया है।
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मुंबई के पारंपरिक कोलीवाड़ों की हदें तय करने का मामला पिछले 12 साल से अटका पड़ा था। अब इसके आगे बढ़ने का रास्ता खुल गया है। राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने इस बारे में अहम फैसला लिया है। उन्होंने कोलीवाड़ों के सीमांकन की प्रक्रिया आने वाले तीन महीने में पूरी करने का निर्णय किया है। इस फैसले से मुंबई में कोली समाज की पारंपरिक बस्तियों की जमीन की हदें तय होने का रास्ता साफ होगा।
इस फैसले के तहत शिवड़ी, सायन, कोलाबा, माहिम, माहिम मार्केट और मांडवी के कोलीवाड़ों की हदें तय करने के काम को रफ्तार दी जाएगी। इसके अलावा प्रिंसेस डॉक मांडवी, वर्ली और कफ परेड के कोलीवाड़ों की हदों का सीमांकन करने का भी फैसला हुआ है।
मुंबई के कोलीवाड़ों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत है। लेकिन कई जगह जमीन की हदें साफ न होने की वजह से वहां रहने वालों को तरह-तरह की प्रशासनिक दिक्कतों से जूझना पड़ता है। इसीलिए कोलीवाड़ों की हदें आधिकारिक तौर पर तय करना जरूरी माना जा रहा है।
सीमांकन का यह मामला सालों से लटका हुआ है। मुंबई के कोलीवाड़ों के सीमांकन की प्रक्रिया 2012 में शुरू हुई थी। इसके बाद 2018-19 में असल में पैमाइश की गई और 2022 के आसपास नक्शे उपलब्ध हुए। मगर कुछ हदों पर स्थानीय लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई, इसलिए प्रक्रिया अब तक पूरी तरह विवाद से मुक्त नहीं हुई है। इस बीच कोलीवाड़ों की जमीन को लेकर अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के दावे भी इस मामले की बड़ी चुनौती हैं। मुंबई के कुछ कोलीवाड़ों की जमीन पर म्हाडा, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और दूसरे प्राधिकरणों की आपत्तियों का मुद्दा पहले विधान परिषद में उठाया जा चुका है।
कोलीवाड़े सिर्फ रिहायशी इलाके नहीं हैं, वे मुंबई की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का अहम हिस्सा हैं। मछली पकड़ना, मछली सुखाना, नावें रखना और जाल की देखभाल करना जैसे कई धंधों के लिए कोली समाज इन इलाकों का इस्तेमाल करता है। इसलिए कोली समाज के संगठनों की मांग है कि सीमांकन करते वक्त सिर्फ रिहायशी इमारतों को न देखा जाए, बल्कि पारंपरिक धंधे के लिए इस्तेमाल होने वाली जगहों को भी गिना जाए।
कोलीवाड़ों की हदें आधिकारिक तौर पर तय हो जाएं तो जमीन के रिकॉर्ड में साफ-सफाई आने में मदद मिल सकती है। आगे होने वाले विकास कामों, पुनर्विकास प्रोजेक्ट और जमीन के इस्तेमाल के फैसलों में भी आधिकारिक नक्शों का सहारा मिल सकता है। लेकिन सीमांकन पूरा होने का मतलब यह नहीं कि उन जमीनों की मिल्कियत अपने आप रहने वालों के नाम हो जाएगी। मालिकाना हक और दूसरे कानूनी सवालों के लिए अलग प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।
राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने तीन महीने की जो मियाद बताई है, उससे अटकी प्रक्रिया को रफ्तार मिलने की उम्मीद है। फिर भी सीमांकन करते वक्त ऐतिहासिक कागजात, स्थानीय लोगों की आपत्तियों और अलग-अलग प्राधिकरणों के दावों पर गौर करना जरूरी होगा। अब मुंबई का कोली समाज इस पर नजर रखे हुए है कि असल पैमाइश, नक्शों की जांच और आखिरी हद तय करने का काम कितनी तेजी से पूरा होता है।