मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:27 IST

मेळघाट में कुपोषण के आंकड़ों में सुधार, फिर भी चुनौती बरकरार

चिखलदरा तालुका के 229 आंगनवाड़ी केंद्रों से 14,607 बच्चों को पोषण आहार, लेकिन दुर्गम गांवों में निगरानी अब भी मुश्किल

मेळघाट में कुपोषण के आंकड़ों में सुधार, फिर भी चुनौती बरकरार
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

कुपोषण को लेकर देशभर में चर्चा में रहने वाले मेळघाट में स्थिति पहले से बेहतर हुई है, मगर समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। चिखलदरा तालुका में 7 महीने से लेकर 6 साल तक की उम्र के 14 हजार 607 बच्चों को 229 आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए रोज पोषण आहार दिया जा रहा है।

मिली जानकारी के मुताबिक इनमें से 50 बच्चे अति कुपोषित श्रेणी में हैं, जबकि 800 बच्चे मध्यम कुपोषित श्रेणी में आते हैं। बारिश के मौसम में कुपोषण के मामलों पर खास नजर रखने की जरूरत बताई जा रही है।

चिखलदरा तालुका के 143 गांवों में एकात्मिक बाल विकास सेवा योजना के तहत ये 229 आंगनवाड़ी केंद्र चल रहे हैं। इन केंद्रों में बच्चों को रोजाना लापशी, खिचड़ी समेत अलग-अलग तरह का पोषण आहार दिया जाता है। बच्चों का वजन और कद देखकर उनकी पोषण स्थिति तय की जाती है, और उसी आधार पर उन्हें अति कुपोषित, मध्यम कुपोषित और सामान्य श्रेणी में बांटा जाता है। कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पोषण आहार के साथ-साथ जरूरी देखभाल दी जाती है, ताकि उन्हें सामान्य श्रेणी में लाया जा सके।

दुर्गम गांवों में निगरानी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। चिखलदरा तालुका के 229 आंगनवाड़ी केंद्रों की देखरेख के लिए सिर्फ नौ महिला पर्यवेक्षक काम कर रही हैं, यानी हर एक के जिम्मे करीब 25 केंद्र हैं। तालुका का बड़ा भौगोलिक फैलाव, जंगल, खराब सड़कें और वाहन सुविधाओं की कमी की वजह से सभी केंद्रों तक नियमित पहुंचना, वहां जाकर जांच करना और पोषण व्यवस्था का जायजा लेना मुश्किल हो रहा है।

दुर्गम गांवों के कई आंगनवाड़ी केंद्रों की बिल्डिंग और वहां मिलने वाली सुविधाएं भी चिंता की बात हैं। छोटे कमरों में बच्चों को बिठाने के साथ-साथ वहीं खाना बनाना और दूसरी गतिविधियां चलाना पड़ता है। कुछ जगहों पर केंद्रों तक जाने के लिए पक्की सड़क और ठीक-ठाक वाहन सुविधा न होने से आंगनवाड़ी सेविकाओं को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

चूर्णी, मोथा, गोलखेड़ा, खटकाली, सेमाडोह, सलोना, टेंबुरसोंडा, जरीदा और हत्रू जैसे दुर्गम इलाकों में आंगनवाड़ी सेवाओं की नियमित निगरानी खास चुनौती बनी हुई है। इसीलिए सिर्फ आंकड़ों के आधार पर कुपोषण पर काबू पाने का आकलन करने की बजाय, जमीनी स्तर पर पोषण आहार, स्वास्थ्य जांच, साफ-सफाई, आंगनवाड़ी बिल्डिंग और वाहन सुविधा को और मजबूत करने की जरूरत बताई जा रही है।

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