मंत्रपुष्पांजली का अर्थ और महत्व, घालीन लोटांगण के बाद ही क्यों बोली जाती है
महाराष्ट्र में गणपति सीजन में आरती के बाद घालीन लोटांगण फिर मंत्रपुष्पांजली बोलने की परंपरा और उसका मतलब
अभी गणपति का सीजन चल रहा है। महाराष्ट्र के बहुत से घरों में रोज सुबह-शाम आरती के बाद पहले घालीन लोटांगण बोला जाता है, और उसके बाद हाथ में फूल और अक्षता लेकर मंत्रपुष्पांजली बोली जाती है। यह सिर्फ रटा हुआ पाठ नहीं है, बल्कि पूजा को पूरा करने के पीछे इसका खास मतलब है। मंत्रपुष्पांजली के जरिए भगवान को फूल चढ़ाते हुए भक्त अपनी कृतज्ञता और प्रार्थना जाहिर करता है।
मंत्रपुष्पांजली शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है - मंत्र, पुष्प और अंजली। मंत्र यानी पवित्र वैदिक उच्चारण, पुष्प यानी फूल, और अंजली यानी दोनों हाथ जोड़कर या ओंजल में अर्पित करना। इस तरह सीधी भाषा में इसका मतलब है मंत्र बोलते हुए भगवान को फूल चढ़ाना।
मंत्रपुष्पांजली में शुरुआत का जो मशहूर मंत्र है, 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः', उसका संबंध ऋग्वेद के पुरुषसूक्त से है। इसमें देवताओं ने यज्ञ के जरिए यज्ञस्वरूप परमेश्वर की उपासना की, यह भाव व्यक्त होता है। इसके आगे 'राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने' मंत्र में वैश्रवण यानी कुबेर को नमस्कार करते हुए कल्याण की प्रार्थना की जाती है। यानी मंत्रपुष्पांजली में सिर्फ एक देवता की स्तुति नहीं है, बल्कि इसमें वैदिक प्रार्थनाओं का व्यापक भाव दिखता है।
घालीन लोटांगण के बाद ही मंत्रपुष्पांजली क्यों बोली जाती है, इसका भी एक क्रम है। घालीन लोटांगण में भक्त भगवान के चरणों में नम्रता से शरण जाने का भाव व्यक्त करता है। इसके बाद मंत्रपुष्पांजली में हाथ के फूल-अक्षता भगवान को अर्पित करके प्रार्थना की जाती है। कुछ पूजा पद्धतियों में मंत्रपुष्पांजली को पूजा के आखिरी उपचारों में से एक माना जाता है। इसीलिए पहले भक्ति और समर्पण जाहिर करके, फिर असल में फूल चढ़ाने का यह क्रम बना है।
मंत्रपुष्पांजली का केंद्रबिंदु है अर्पण और प्रार्थना। हाथ का फूल श्रद्धा का प्रतीक मानकर भगवान के चरणों में चढ़ाया जाता है। वैदिक मंत्रों में धर्म, कल्याण, समृद्धि और सुशासन से जुड़ी प्रार्थनाओं के संदर्भ मिलते हैं। इसलिए यह प्रार्थना अपनी निजी इच्छा जाहिर करने के साथ-साथ सबके भले की भावना भी सामने लाती है।
एक जरूरी बात यह है कि आज जो मंत्रपुष्पांजली बोली जाती है, वह कोई एक ही लगातार सूक्त नहीं है, बल्कि अलग-अलग ग्रंथों के मंत्रों का संकलन है। जानकारी के मुताबिक इसके मंत्र ऋग्वेद, तैत्तिरीय आरण्यक और ऐतरेय ब्राह्मण जैसे वैदिक ग्रंथों से जुड़े हैं। इसीलिए आरती के बाद बोली जाने वाली यह प्रार्थना भक्ति, वैदिक परंपरा और अर्पण के भाव का एक सुंदर संगम मानी जा सकती है।