बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

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21:13 IST

महिषासुर से देवी की जंग नौ दिन क्यों चली, नवरात्र की पूरी कथा और उसका मतलब

नवरात्र के नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की पूजा होती है। जानिए देवी को महिषासुर को मारने में इतना वक्त क्यों लगा और इस कथा का संदेश क्या है।

महिषासुर से देवी की जंग नौ दिन क्यों चली, नवरात्र की पूरी कथा और उसका मतलब तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नवरात्र नौ शक्तियों के जागरण का त्योहार है। इन नौ दिनों में हम देवी के नौ रूपों की पूजा करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि देवी ने महिषासुर को मारने में पूरे नौ दिन क्यों लगाए?

महिषासुर बहुत खतरनाक राक्षस था। उसका अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था और वह घमंड में चूर हो गया था। उसे वरदान मिला था कि कोई भी पुरुष उसे नहीं मार सकेगा। इसी वजह से वह देवताओं को भी सताने लगा और सारे देवता उससे डरने लगे।

आखिर में ब्रह्मा, विष्णु और महेश समेत सारे देवता एक साथ आए। उन सबके तेज से एक देवी का जन्म हुआ, यही हमारी दुर्गा माता हैं। देवताओं ने अपने-अपने सबसे ताकतवर हथियार देवी को सौंप दिए। देवी के दस हाथ थे और हर हाथ में अलग हथियार था।

इसके बाद देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच जंग छिड़ गई। महिषासुर बड़ा चालाक था और बार-बार अपना रूप बदल लेता था। कभी वह भैंसा बन जाता, कभी हाथी और कभी इंसान। इसलिए उसे मारना आसान नहीं था।

देवी ने उसके हर रूप का सामना किया। दुर्गा सप्तशती में बताया गया है कि देवी ने नौ दिनों में उसकी अलग-अलग बुरी शक्तियों को खत्म किया और दसवें दिन, यानी विजयादशमी को उसका वध किया। इसीलिए हम उस दिन को दशहरे के तौर पर मनाते हैं। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है। मगर यह सिर्फ एक लड़ाई नहीं थी, इसके पीछे एक बड़ा संदेश भी है।

देवी ने नौ दिन तक जंग इसलिए लड़ी क्योंकि यह लड़ाई बाहर की नहीं, हमारे अपने मन की थी। हमारे मन में भी महिषासुर जैसी कई बुराइयां बैठी होती हैं, जैसे अहंकार, लोभ, गुस्सा और जलन। महिषासुर का सबसे बड़ा दुश्मन उसका अपना अहंकार था, जो लगातार बढ़ता जा रहा था। देवी का हर वार उसके अहंकार को तोड़ने के लिए था, क्योंकि अहंकार एक दिन में नहीं जाता।

देवी के नौ रूप दरअसल हमारे अंदर की नौ शक्तियां हैं। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा जैसा हर रूप हमें जिंदगी की अलग-अलग मुश्किलों से लड़ना सिखाता है। जब तक हम अपने अंदर का अहंकार खत्म नहीं करते, तब तक कामयाबी नहीं मिलती। यही अहंकार हमें नीचे ले जाता है, और यही सबक देवी ने इस जंग से दिया है।

महिषासुर का मतलब है हमारे मन की उलझन और अज्ञान। वह जैसे बार-बार रूप बदलता था, वैसे ही हमारे मन में भी अलग-अलग विचार आते रहते हैं और हमें भटकाते हैं। इन भटकते विचारों को रोकने के लिए ज्ञान की जरूरत होती है। देवी के दस हाथ दस दिशाओं की रक्षा का प्रतीक हैं और उनका सिंह हिम्मत का। यानी जब हम हिम्मत से और सही रास्ते पर चलते हैं, तभी अपने अंदर के महिषासुर को मार सकते हैं।

नवरात्र हमें यही सिखाती है। सिर्फ उपवास रखना और पूजा करना ही नवरात्र नहीं है। अपने गुस्से, लोभ और अहंकार पर काबू पाना ही देवी की सच्ची पूजा है। अपने विचार हमेशा साफ रखिए और अच्छे रास्ते पर चलिए, यही असली भक्ति है। हर साल आने वाली नवरात्र हमें यही संदेश देती है कि हमें अच्छा इंसान बनकर जीना चाहिए।

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