महिलाओं की नजर से न्याय: 'पूजा मेरी जान' से 'दायरा' तक पांच कहानियां
हिंदी फिल्मों और ओटीटी की पांच कहानियां न्याय, सहमति और जवाबदेही को महिलाओं के नजरिए से दिखाती हैं।
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क्राइम, न्याय और जवाबदेही पर बनी कहानियों में कई साल तक मर्द ही बीच में रहे। जांच अफसर, वकील, पुलिस वाले या अपने तरीके से इंसाफ दिलाने वाले, हर जगह उन्हें ही दिखाया गया। लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और ओटीटी की कहानियों ने धीरे-धीरे यह नजरिया बदला है और अब इन चर्चाओं के बीच में महिलाओं को जगह दी है। अपने लिए जवाबदेही मांगने से लेकर समाज को अपने सच की परिभाषा तय न करने देने तक, ये कहानियां न्याय की प्रक्रिया में महिलाओं की आजादी और फैसला लेने की ताकत को अहमियत दे रही हैं।
'पूजा मेरी जान' पर हो रही बात के साथ उन दूसरी फिल्मों और वेब सीरीज को देखना भी जरूरी है, जिनमें न्याय, सहमति, जवाबदेही और किसी हालात को देखने के नजरिए जैसे सवाल इसी तरह बीच में रखे गए हैं।
पहली है 'पूजा मेरी जान', जो Zee 5 (हिंदी) पर स्ट्रीम हो रही है। यह फिल्म सहमति, इनकार, आसक्ति और समाज के नजरिए जैसे पेचीदा मुद्दों पर बहस को आगे बढ़ाती है। मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म एक महिला के आसपास घटने वाले हालात को केंद्र में रखकर जवाबदेही और किसी घटना को देखने के नजरिए पर अहम सवाल उठाती है। जब कोई महिला इनकार करती है तो क्या होता है और उसके उस फैसले को कितनी जल्दी शक या आलोचना की नजर से देखा जा सकता है, फिल्म यह टटोलती है। न्याय सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का आखिरी फैसला नहीं है। सहमति, निजी हदें और अपनी पसंद को सही ठहराने के लिए महिलाओं पर आने वाला दबाव भी उतने ही अहम पहलू हैं, यह फिल्म यही रेखांकित करती है।
दूसरी है 'दायरा' (JioHotstar)। मेघना गुलजार की इस फिल्म में करीना कपूर खान डीसीपी अजूनी कोहली के रोल में एक बेहद उलझी हुई जांच के बीच में हैं। एक महिला पुलिस अफसर के तौर पर अजूनी को संस्थागत नियम और प्रक्रिया, जनता का दबाव और भावनात्मक माहौल में इंसाफ आखिर कैसा होना चाहिए, इन बड़े सवालों से जूझना पड़ता है। जांच की अगुआई का हक अपनी महिला नायिका को देते हुए फिल्म सही कानूनी प्रक्रिया और फौरन इंसाफ की मांग के बीच की लकीर पर भी सवाल उठाती है। जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की बड़ी बहस में अजूनी का नजरिया अहम साबित होता है।
तीसरी है 'पिंक' (Amazon Prime Video)। मुख्य धारा की फिल्मों में सहमति का मुद्दा साफ तौर पर उठाने वाली अहम फिल्मों में 'पिंक' गिनी जाती है। तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और एंड्रिया तारियांग ने तीन युवतियों के किरदार निभाए हैं। एक अनचाही घटना के बाद उनकी पसंद और बर्ताव की कड़ी जांच-पड़ताल होती है। अमिताभ बच्चन ने अदालत में उनका पक्ष रखने वाले वकील दीपक सहगल का रोल किया है, फिर भी फिल्म का मुख्य मुद्दा महिलाओं को अपनी निजी हदें तय करने का हक देने से जुड़ा है। महिला के कपड़ों, जीवनशैली, रिश्तों या अतीत से उसकी सहमति की अहमियत तय की जा सकती है, इस सोच को फिल्म डटकर चुनौती देती है।
चौथी है 'दिल्ली क्राइम' (Netflix)। इस वेब सीरीज में शेफाली शाह ने डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी का किरदार निभाया है। अलग-अलग सीजन में वर्तिका एक तजुर्बेकार पुलिस अफसर के रूप में दिखती है, जो पेचीदा मामलों की जांच करते हुए संस्थागत दबाव, जनता के गुस्से और कानून-व्यवस्था संभालने वाले सिस्टम से रखी जाने वाली उम्मीदों का सामना करती है। क्राइम कहानियों के पुराने ढांचे में यह सीरीज एक अहम बदलाव लाती है। जांच जिस पीड़ित के आसपास घूमती है, वह सिर्फ महिला होने तक सीमित नहीं रहती। महिला खुद जांच अफसर, फैसले लेने वाली और इंसाफ के लिए कोशिश करने वाली प्रोफेशनल भी हो सकती है, यह सीरीज दिखाती है।
पांचवीं है 'थप्पड़' (MX Player)। यह फिल्म न्याय की सोच को आम क्राइम कहानियों से आगे ले जाकर शादी के रिश्ते के दायरे में रखती है। तापसी पन्नू ने अमृता का रोल किया है। एक पार्टी में उसका पति उसे थप्पड़ मार देता है और उसके बाद अमृता को अपने रिश्ते के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ता है। हम क्या मानने को तैयार हैं और अपने लिए कौन-सी हदें तय करनी हैं, इस पर वह पक्का रुख अपनाने लगती है। निजी आजादी फिल्म के न्याय संबंधी नजरिए का केंद्र है। अमृता के लिए सवाल यह नहीं है कि दूसरों की नजर में यह वाकया कितना गंभीर है। असली सवाल यह है कि क्या उसे यह तय करने का हक है कि उसकी निजी हद पार हुई है।
'पूजा मेरी जान' और 'दायरा' से लेकर 'पिंक', 'दिल्ली क्राइम' और 'थप्पड़' तक, ये कहानियां दिखाती हैं कि न्याय के दायरे में महिलाओं का चित्रण किस तरह बदल रहा है। महिलाएं अब सिर्फ हिफाजत, बचाव या बदले का इंतजार करने वाले किरदार नहीं रहीं। वे जांच अफसर, प्रोफेशनल, फैसले लेने वाली और अपनी हदों और अपनी कहानी की परिभाषा तय करने का हक मांगने वाली महिलाओं के रूप में सामने आ रही हैं।
इससे भी अहम बात यह है कि ये कहानियां न्याय की सोच को बड़ा कर रही हैं। न्याय सिर्फ इतना नहीं है कि अदालत या पुलिस थाने में क्या होता है। इसमें यह भी आता है कि महिलाओं की बात कैसे सुनी जाती है, उनके बारे में कैसे नतीजे निकाले जाते हैं, उन पर भरोसा किया जाता है या नहीं और अपनी जिंदगी की कहानी खुद कहने की आजादी उन्हें दी जाती है या नहीं।
'पूजा मेरी जान' Zee 5 (हिंदी) पर खास अंदाज में स्ट्रीम हो रही है।