लड़कों के लंबे बाल: क्या समाज को तय करने का हक है कि बाल कितने बड़े हों?
लंबे बाल रखने वाले लड़कों को आज भी घर और दफ्तर में ताने सुनने पड़ते हैं, जबकि भारतीय परंपरा में लंबे बालों की जगह रही है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
अगर आप भी लंबे बाल रखना चाहते हैं, या रखे हुए हैं और घर वाले बार-बार इस पर ताने मारते हैं, तो यह खबर आपके ही काम की है। भारतीय समाज में कई ऐसे सामाजिक नियम चलते हैं, जिनका शायद कौड़ी भर भी फायदा नहीं है। खासकर मध्यमवर्गीय समाज में ऐसा ज्यादा दिखता है। इसका एक ट्रेंडी रूप यह है कि लड़का लंबे बाल रखे तो उसे टोका जाए, उस पर एतराज किया जाए, या लंबे बालों को किसी बुरी संगत की निशानी मान लिया जाए। सच यह है कि हेयरस्टाइल और किसी के व्यक्तित्व के बीच ऐसा कोई रिश्ता है ही नहीं।
आज भी कई घरों में यही सुनने को मिलता है कि लंबे बाल वाले लड़के बेशिस्त होते हैं या समाज में अच्छे नहीं लगते। मां-बाप अक्सर नौकरी, इंटरव्यू और दफ्तर के माहौल का हवाला देकर कहते हैं कि बाल छोटे रखो, यही अच्छे लड़के की पहचान है। पर सवाल यह उठता है कि मर्दों के बाल कितने लंबे हों, यह तय करने का हक समाज को किसने दिया? और क्या भारतीय संस्कृति में लंबे बालों को हमेशा बुरा ही माना गया?
भारतीय इतिहास और धार्मिक परंपराओं में लंबे बालों के कई रूप दिखते हैं। भगवान शिव की जटाओं को धार्मिक और आध्यात्मिक अहमियत मिली हुई है। कई ऋषि-मुनियों की तस्वीरों में जटाएं दिखती हैं। कुछ ऐतिहासिक राजाओं, योद्धाओं और तपस्वियों के चित्रों में भी लंबे बाल मिलते हैं। परंपरा में बाल सिर्फ सुंदरता की निशानी नहीं थे। कुछ संदर्भों में उन्हें तपस्या, ताकत, वैराग्य या किसी खास धार्मिक पहचान से जोड़ा गया।
छोटे बालों की छवि ब्रिटिश राज से जुड़ती है। उस दौर में सेना, सरकारी दफ्तरों और संस्थाओं में अनुशासन, एकरूपता और तय पोशाक को अहमियत दी जाती थी। फौजी सेवाओं में बाल छोटे रखने के पीछे साफ-सफाई, सहूलियत, वर्दी में एक जैसा दिखना और अनुशासन जैसे व्यावहारिक कारण भी थे। ब्रिटिश प्रशासन से जुड़ी संस्थाओं के नियमों और पश्चिमी पेशेवर छवि का असर भारतीय संस्थाओं और समाज पर भी पड़ा। उसी दौर में ब्रिटिश सांस्कृतिक दबदबे ने भारतीय शिक्षा पद्धति, साहित्य और सामाजिक रिवाजों को लेकर कई पूर्वाग्रहों को भी बल दिया, और छोटे बालों की ब्रिटिश फौजी परंपरा भारतीय समाज में भी जम गई।
आजादी के बाद भी कुछ पश्चिमी पेशेवर पैमाने इज्जत की निशानी बन गए। काला कोट पहनना, साफ-सुथरा दिखना और छोटे बाल रखना, इन सबको कई जगह एक साथ जोड़ दिया गया। नतीजा यह कि लंबे बाल रखने वाले लड़कों को कभी नौकरी में, कभी पढ़ाई में तो कभी घर में फालतू की आलोचना झेलनी पड़ती है।
असल में किसी की काबिलियत, ईमानदारी या प्रोफेशनलिज्म उसके बालों की लंबाई से तय नहीं होता। काम की जगह पर साफ-सफाई, सुरक्षा और ठीक पोशाक जरूरी हो सकती है। लेकिन हर मर्द एक ही तरह का हेयरस्टाइल रखे, यह जिद बिल्कुल अलग बात है। ब्रिटिश फौज में दाढ़ी, धार्मिक चिन्हों और सिर के पहनावे को लेकर नियम थे। फिर भी इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है कि अंग्रेजों ने भारतीय मर्दों को बाल छोटे रखने के लिए देशव्यापी मुहिम चलाई।
संस्कृति पर गर्व करने का मतलब यह नहीं कि हर कोई लंबे बाल रखे। और आधुनिक दिखने के लिए हर किसी को बाल छोटे करने की भी जरूरत नहीं। हर आदमी को अपनी पसंद का हेयरस्टाइल चुनने की आजादी होनी चाहिए, यही सही भावना है।
आखिर में सवाल बालों की लंबाई का नहीं है। सवाल यह है कि हम अपनी पसंद का फैसला खुद लेते हैं या समाज के डर से लेते हैं। अगर भारतीय संस्कृति में विविधता की जगह है, तो किसी नौजवान ने लंबे बाल रख लिए तो उसके संस्कारों और व्यक्तित्व पर सवाल उठाने की जरूरत ही क्या है? व्यक्ति की अच्छाई उसके बर्ताव और काम से तय होनी चाहिए, हेयरस्टाइल से नहीं।
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