मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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19:49 IST

काम ईमानदारी से किया तो अफसर बन गए हीरो, तुकाराम मुंढे को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा

महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे की कार्रवाइयों ने उन्हें सोशल मीडिया पर स्टार बना दिया है, लेकिन सवाल यही है कि अपना काम ठीक से करने पर अफसर हीरो क्यों बन जाते हैं।

काम ईमानदारी से किया तो अफसर बन गए हीरो, तुकाराम मुंढे को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

भारत में सरकारी अफसर अगर बस अपना काम ठीक से कर दे, तो उसे खबर नहीं बनना चाहिए। मगर हर कुछ साल में कोई न कोई अफसर सिर्फ इसी वजह से चर्चा में आ जाता है। 51 साल के तुकाराम मुंढे इस वक्त वही चेहरा हैं। लाखों सरकारी कर्मचारियों की भीड़ में कुछ गिने-चुने अफसर ही ऐसे बनते हैं, जो अचानक पब्लिक फिगर बन जाते हैं।

मुंढे महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर हैं। मई में चार्ज लेने के बाद से उन्होंने कई बड़ी एनफोर्समेंट ड्राइव चलाई हैं। उनकी टीमों ने रेस्टोरेंट और दूसरे फूड बिजनेस की चेकिंग करते हुए कीड़े-मकोड़े, गंदगी और एक्सपायर हो चुका खाना पकड़ा है। इसके अलावा मुंढे ने यह भी सामने रखा कि अस्पताल आम मेडिकल सामान पर कितना कम खर्च करते हैं और मरीज से कितना ज्यादा वसूल लेते हैं।

इन्हीं कार्रवाइयों के वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए हैं और मुंढे रातों-रात सेलिब्रिटी जैसे बन गए हैं। सैकड़ों लोगों ने कमेंट में लिखा है कि काश उनके राज्य में भी फूड सेफ्टी की गड़बड़ियां ठीक करने के लिए ऐसा ही कोई अफसर भेज दिया जाए।

मुंढे अकेले नहीं हैं। दिल्ली के पास गुरुग्राम में डिस्ट्रिक्ट टाउन प्लानर आर एस बत्थ को भी अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर कार्रवाई करने के लिए तारीफ मिली है।

रिटायर्ड सिविल सर्वेंट कमल कांत जसवाल कहते हैं, "जो काम नॉर्मल होना चाहिए था, वही अब एक्सेप्शनल हो गया है।" उनका कहना है कि आम लोगों के लिए देरी, दफ्तरों के चक्कर और लापरवाही इतनी आम बात बन चुकी है कि अगर कोई अफसर ठीक से काम कर दे, तो वह अपवाद जैसा लगने लगता है।

इससे पहले भी कई अफसर सिर्फ नियम से काम करने पर मशहूर हुए हैं - 1990 के दशक में चीफ इलेक्शन कमिश्नर रहे टी एन शेषन, 1980 के दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी की गलत तरीके से पार्क की गई गाड़ी टोइंग करवाने पर "क्रेन बेदी" कहलाईं किरण बेदी, 2012 की एक जमीन डील में दखल देने वाले अशोक खेमका, और 2020 में दिल्ली के दंगों के दौरान भीड़ के सामने डटे पुलिस अफसर नीरज जादौन।

जसवाल यह भी कहते हैं कि हजारों अफसर बिना किसी पब्लिसिटी के अपना काम करते रहते हैं, बस उनका काम सीधे आम आदमी से जुड़ा नहीं होता इसलिए दिखता नहीं।

दिल्ली में एक फाइनेंस कंपनी में काम करने वाले 43 साल के राजेश सिंह बताते हैं कि जो काम 24 घंटे में हो जाना चाहिए, उसके लिए उन्हें छह महीने तक इंतजार करना पड़ा, वो भी बिना किसी गारंटी के।

मगर नियम सख्ती से लागू करने वाले अफसर की आलोचना भी होती है - यह कहते हुए कि जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया जा रहा है। फूड और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों ने मुंढे पर सवाल उठाए हैं, जिसे मुंढे ने खारिज करते हुए कहा है कि उनकी कार्रवाई सबूत के आधार पर होती है और लाइसेंस सिर्फ गंभीर मामलों में सस्पेंड किए जाते हैं। बत्थ पर भी आरोप लगा है कि उनकी कार्रवाई कमजोर लोगों पर ज्यादा असर डालती है, जिस पर बत्थ का कहना है कि वे सिर्फ टाउन-प्लानिंग नियमों के तहत काम करते हैं।

जसवाल समझाते हैं कि किसी रेहड़ी वाले का ठेला कानून की नजर में अवैध हो सकता है, पर उसी परिवार की रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया भी हो सकता है। पुष्पा सुंदर, जो खुद कुछ समय सिविल सर्वेंट रहीं और डेवलपमेंट के मुद्दों पर लिखती रही हैं, कहती हैं कि जो अफसर गलत मांगें मानने से इनकार करते हैं, उन्हें राजनीतिक दबाव और तबादलों का सामना करना पड़ता है।

जसवाल खुद बताते हैं कि 1974 में जब वे तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश के उत्तरकाशी में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे, एक बड़े मंत्री का विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे। नियमों के खिलाफ जाने वाली मंत्री की कई मांगें उन्होंने ठुकरा दीं। मंत्री चुनाव जीत गए और जसवाल के मुताबिक उन्हें जल्द ही "मार्चिंग ऑर्डर" मिल गए। मगर जब वे अगली पोस्टिंग के लिए निकले, तो लोग कई किलोमीटर तक गर्मी में खड़े होकर उन्हें विदा करने आए।

सुंदर के मुताबिक सोशल मीडिया ने भी यह खेल बदल दिया है - जो कार्रवाई कभी सिर्फ एक जिले तक सीमित रहती थी, वह अब घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। पिछले महीने BBC से बात करते हुए मुंढे ने कहा था कि उनकी कार्रवाई पब्लिक हेल्थ को ध्यान में रखकर की जाती है और जो बिजनेस नियमों का पालन करते हैं, उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है।

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