मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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22:32 IST

गौरी पूजा 2026: महाराष्ट्र में गौरी आगमन और पूजन की परंपरा क्या कहती है

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव के दौरान गौरी आगमन और गौरी पूजन का खास महत्व है, जानिए इसकी परंपरा और तरीका

गौरी पूजा 2026: महाराष्ट्र में गौरी आगमन और पूजन की परंपरा क्या कहती है
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव के दौरान गौरी के आगमन और गौरी पूजन को बहुत महत्व दिया जाता है। गणपति बाप्पा के आने के बाद कई घरों में गौरी का आगमन कराया जाता है और उनकी मनोभाव से पूजा की जाती है। गौरी को देवी पार्वती का रूप माना जाता है, तो कुछ परंपराओं में इन्हें महालक्ष्मी का स्वरूप भी माना जाता है। इसी वजह से गौरी पूजन को भक्ति के साथ साथ सौभाग्य, समृद्धि और मंगल से भी जोड़कर देखा जाता है। घर की बेटी, मां और समृद्धि की प्रतीक के तौर पर गौरी को देखा जाता है।

गौरी पूजन की परंपरा कैसे शुरू हुई, इसके पीछे अलग अलग पौराणिक कथाएं और इलाके के हिसाब से अलग अलग परंपराएं मिलती हैं। गौरी को पार्वती का रूप मानने की धार्मिक मान्यता होने की वजह से इनकी पूजा देवी की शक्ति और मातृत्व से जुड़ी मानी जाती है। महाराष्ट्र के कई परिवारों में यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। मगर गौरी की स्थापना, पूजा का तरीका, नैवेद्य और विसर्जन में इलाके और परिवार की परंपरा के हिसाब से फर्क देखने को मिलता है।

गौरी पूजन के साथ सुहागिन औरतों को हल्दी कुंकू देने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। कुछ घरों में गौरी के सामने सुहागिनों को वाण दिया जाता है, जिसमें घर की परंपरा के मुताबिक अलग अलग चीजें शामिल की जाती हैं। इस रिवाज को सौभाग्य और मंगल की भावना जाहिर करने वाला माना जाता है।

गौरी आगमन के दिन घर की सफाई करके दहलीज पर रंगोली बनाई जाती है। फूलों की सजावट और तोरण से घर को सजाया जाता है। इसके बाद घर में चली आ रही रीत के हिसाब से गौरी की स्थापना की जाती है। कुछ परिवारों में गौरी को मुखौटे के रूप में सजाया जाता है, तो कहीं कहीं कलश या किसी खास प्रतीकात्मक रूप में उनकी स्थापना करने की परंपरा है।

स्थापना के बाद गौरी को साड़ी, गहने, फूलों की माला और दूसरे शृंगार से सजाया जाता है। कुछ घरों में गौरी का परंपरागत तरीके से साज शृंगार किया जाता है। इस सजावट के पीछे देवी का स्वागत करने और उनके प्रति आदर जताने की भावना मानी जाती है।

गौरी पूजन के दिन कई तरह के पारंपरिक पकवानों का नैवेद्य दिखाने का रिवाज है। पुरनपोली, मसाले भात, अलग अलग सब्जियां, कोशिंबीर, मीठे पकवान, फल और पंचपकवानों का नैवेद्य कुछ घरों में तैयार किया जाता है। मगर नैवेद्य के पकवान हर परिवार की रीत रिवाज और इलाके के हिसाब से अलग अलग हो सकते हैं।

महाराष्ट्र में गौरी पूजन का कोई एक तरीका नहीं है, बल्कि अलग अलग हिस्सों में अलग अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। कहीं गौरी को महालक्ष्मी का रूप मानकर पूजा की जाती है, तो कुछ परिवारों में उन्हें पार्वती के रूप में पूजा जाता है। गौरी की मूर्ति का स्वरूप, सजावट, नैवेद्य, पूजा और विसर्जन का दिन भी स्थानीय रिवाज के हिसाब से बदलता रहता है।

गौरी पूजन के बाद तय परंपरा के मुताबिक गौरी का विसर्जन किया जाता है। कुछ घरों में गौरी और गणपति के विसर्जन के समय में फर्क होता है। विसर्जन का तरीका और दिन परिवार की रीत के हिसाब से तय होता है।

गौरी पूजन सिर्फ एक धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि परिवार के लोगों को साथ लाने वाला त्योहार भी है। घर की सजावट, पारंपरिक पकवान, पूजा, आरती, हल्दी कुंकू और सुहागिनों को वाण देने की रीत से इस त्योहार को सांस्कृतिक रंग मिलता है। गौरी पूजन के जरिए देवी के प्रति श्रद्धा जताने के साथ साथ परिवार में सुख, शांति और समृद्धि के लिए दुआ मांगी जाती है।

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