गणेशोत्सव में ढोल-ताशा की परंपरा 1965 के पुणे आंदोलन से जुड़ी, जानिए पूरी कहानी
महाराष्ट्र में गणेशोत्सव के दौरान ढोल-ताशा बजाने की परंपरा दशकों पुरानी है, और इसकी शुरुआत 1965 में पुणे में हुए एक विरोध प्रदर्शन से जुड़ी हुई है।
गणेशोत्सव पूरे देश में मनाया जाता है, मगर महाराष्ट्र में इसका अंदाज ही अलग होता है। यहां बप्पा के आगमन से लेकर विसर्जन तक हर मौके पर ढोल और ताशे की गूंज सुनाई देती है। जब सैकड़ों लड़के-लड़कियां एक साथ ढोल-ताशा बजाते हैं, तो पूरा माहौल जोश और ऊर्जा से भर जाता है।
ढोल-ताशा बजाने की यह परंपरा कई साल पुरानी है और महाराष्ट्र की पहचान बन चुकी है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि यह परंपरा ठीक कब और क्यों शुरू हुई। दरअसल इसका सीधा संबंध एक आंदोलन से जुड़ा है।
बात है 1965 की, जब पुणे में हुई दंगों के बाद पुलिस ने गणेशोत्सव के दौरान गाने बजाने पर रोक लगा दी थी। इस रोक के विरोध में ज्ञान प्रबोधिनी के संस्थापक डॉ. आप्पासाहेब पेंडसे पुणे की सड़क पर अकेले उतर आए और ताशा बजाकर अपना आंदोलन शुरू किया। उनका मकसद साफ था, गणेशोत्सव की जो संस्कृति और शान थी, उसे फिर से खड़ा करना।
आप्पासाहेब के इस अकेले आंदोलन का पुणे के नौजवानों पर गहरा असर हुआ। इसके बाद ज्ञान प्रबोधिनी के छात्रों ने मिलकर पहला ढोल-ताशा पथक बनाया और बड़े ही अनुशासन के साथ ढोल-ताशा बजाकर गणेशोत्सव मनाना शुरू किया।
अब बात करते हैं इस परंपरा की खासियत की। ढोल-ताशा बजाने से पहले मराठा साम्राज्य की वीरता को याद किया जाता है और छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम का जयघोष किया जाता है। ढोल-ताशा वादन बहुत अनुशासित कला मानी जाती है, और एक पथक में 50 से लेकर 500 तक सदस्य शामिल होते हैं। ये लड़के-लड़कियां बिना किसी स्वार्थ के महीनों पहले से इसकी प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं।
इस सालाना उत्सव में कॉलेज के स्टूडेंट्स से लेकर हर तरह के नौकरीपेशा लोग भी शामिल होते हैं। ये लोग अपनी पढ़ाई और काम को संभालते हुए भी महीनों पहले से समय निकालकर ढोल-झांज बजाने की प्रैक्टिस करते हैं। ढोल-ताशा की आवाज से पूरा माहौल उत्साह से भर उठता है और सुनने वाले बप्पा की भक्ति में डूब जाते हैं। पारंपरिक कुर्ता-पायजामा पहनकर और कमर में ढोल-ताशा बांधकर, हर साल गणेशोत्सव के दौरान यह दशकों पुरानी परंपरा आज भी उसी जोश के साथ आगे बढ़ाई जा रही है।