गणपती विसर्जन के वक्त शिदोरी देने की परंपरा के पीछे की भावना
गणपती बप्पा को विदा करते वक्त कई घरों में शिदोरी देने की परंपरा निभाई जाती है, जिसके पीछे भक्ति और अपनेपन की भावना जुड़ी है।
गणेशोत्सव का सबसे भावुक पल होता है गणपती बप्पा का विसर्जन। बप्पा को विदा करते वक्त आरती की जाती है, नैवेद्य चढ़ाया जाता है और पूजा-अर्चना होती है। इसी वक्त कई घरों में एक और परंपरा निभाई जाती है, बप्पा को शिदोरी देने की। इस शिदोरी के पीछे भक्ति, अपनापन और बप्पा को प्यार से विदा करने की भावना जुड़ी हुई है।
शिदोरी आखिर होती क्या है, यह समझने के लिए गांव की पुरानी परंपरा को याद करना पड़ेगा। पहले के जमाने में जब कोई लंबे सफर पर निकलता था, तो उसके साथ खाने-पीने का सामान बांधकर दिया जाता था। इसी को शिदोरी कहा जाता था। माना जाता है कि इसी सोच से गणपती बप्पा के विसर्जन के वक्त उन्हें शिदोरी देने की प्रथा कुछ परिवारों में चली आ रही है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक भक्तों का विश्वास है कि विसर्जन के बाद गणपती बप्पा अपने घर यानी कैलाश वापस लौट जाते हैं। इसी भावना के साथ कि बप्पा सफर पर निकल रहे हैं, उनके साथ खाने की शिदोरी दी जाती है। यह परंपरा असल में सफर के लिए जरूरी खाना देने से ज्यादा भक्त के प्यार और लगाव का प्रतीक मानी जाती है।
शिदोरी में कौन-सी चीजें रखी जाएं, इसका कोई एक तय नियम नहीं है। हर परिवार और इलाके की अपनी-अपनी परंपरा के हिसाब से इसमें रखा जाने वाला सामान बदलता रहता है। कहीं दही-भात रखा जाता है, तो कहीं दही-पोहे। कुछ घरों में लड्डू या घर में जो भी मीठी चीज मौजूद हो, वह शिदोरी में रखी जाती है।
इस पूरी परंपरा के पीछे यह भावना काम करती है कि बप्पा हमारे घर से जा रहे हैं। गणपती को परिवार के ही एक सदस्य की तरह मानकर उनकी फिक्र करने का भाव इस रस्म से झलकता है। इसीलिए शिदोरी सिर्फ खाने-पीने की एक थैली नहीं बल्कि भक्ति और अपनेपन की निशानी मानी जाती है।
गणेशोत्सव की कई और रस्मों की तरह शिदोरी देने का तरीका भी हर घर में एक जैसा नहीं होता। यह इलाके, समाज और परिवार के हिसाब से अलग-अलग होता है। कुछ परिवारों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, तो कई घरों में इसे बिल्कुल भी नहीं निभाया जाता।
विसर्जन के वक्त "गणपती बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" का जयघोष गूंजता है। बप्पा को शिदोरी देना, आरती करना और प्यार से विदा करना, इन सारी रस्मों से भक्तों की श्रद्धा और उनका भावनात्मक रिश्ता सामने आता है। शिदोरी की यह परंपरा मुख्य रूप से लोक-परंपरा और पारिवारिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है, और इसका तरीका व इसमें रखे जाने वाले पदार्थ इलाके के हिसाब से अलग-अलग पाए जाते हैं।