मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
18:59 IST

एम्स नागपुर और IIT बॉम्बे मिलकर बनाएंगे सस्ती मेडिकल तकनीक, देश में ही होगा विकास

भारतीय चिकित्सा संसदीय मंच के सम्मेलन में एम्स नागपुर के डॉक्टरों ने आईआईटी बॉम्बे के साथ मिलकर स्वदेशी मेडटेक तकनीक विकसित करने की बात कही।

एम्स नागपुर और IIT बॉम्बे मिलकर बनाएंगे सस्ती मेडिकल तकनीक, देश में ही होगा विकास
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

भारतीय चिकित्सा संसदीय मंच यानी आईएमपीएफ के राष्ट्रीय नीति शिखर सम्मेलन में डॉक्टरों और एक्सपर्ट्स ने इस बात पर जोर दिया कि मेडिकल तकनीक को मरीजों की असली जरूरतों से जोड़ा जाए और देश में ही ऐसी तकनीक बने, ताकि बाहर से मंगाई गई महंगी मशीनों पर निर्भरता कम हो। इसके लिए अस्पतालों, रिसर्चरों और इंडस्ट्री को आपस में मिलकर काम करने की सलाह दी गई।

गुजरात के वापी में हुए इस सम्मेलन का विषय था 'स्वस्थ भारत से सक्षम भारत: भारत में मेडटेक पहुंच की नई परिकल्पना'। यहां एम्स नागपुर के एक्सपर्ट्स ने कहा कि अस्पताल और मेडिकल कॉलेज सिर्फ विदेश में बनी तकनीक को खरीदने या टेस्ट करने तक ही सीमित न रहें। इसके बजाय उन्हें खुद आगे आकर यह पहचानना चाहिए कि मरीजों की कौन सी जरूरतें अब तक पूरी नहीं हो पाई हैं, और उसी हिसाब से नई तकनीक बनवाने में एक्टिव रोल निभाना चाहिए।

एम्स नागपुर के डॉ. प्रशांत पी. जोशी ने कहा कि अस्पतालों को इंजीनियरों, रिसर्चरों और नई सोच रखने वालों के साथ मिलकर ऐसी तकनीक बनानी चाहिए जो असल में मरीजों के काम आए। उन्होंने कहा कि मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों के बीच साथ मिलकर रिसर्च, एकेडमिक प्रोग्राम, फेलोशिप और ट्रेनिंग को और मजबूत करने की जरूरत है।

डॉ. जोशी ने बताया कि एम्स नागपुर अब आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों के साथ इसी तरह का साथ मिलकर काम करने की संभावनाएं तलाश रहा है। उनका कहना था कि दो अलग-अलग फील्ड के संस्थानों का इस तरह साथ आना भारत में मेडिकल तकनीक के नए आइडिया को मजबूती दे सकता है और साथ ही मरीजों की देखभाल भी बेहतर कर सकता है।

राज्यसभा सांसद और आईएमपीएफ के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुखदेवराव बोंडे ने कहा कि सिर्फ नई तकनीक बना लेना काफी नहीं है, उसका मरीज तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर तकनीक मरीजों तक नहीं पहुंचती तो उसका असर सीमित ही रहता है, और अगर उसके पीछे भरोसेमंद सबूत यानी ठोस डेटा न हो तो तकनीक की पहुंच को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।

डॉ. बोंडे ने कहा कि भारत में दुनिया के मुकाबले खड़ी हो सके ऐसी मेडटेक इंडस्ट्री खड़ी करने के लिए देश में ही रिसर्च और डेवलपमेंट, भरोसेमंद क्लिनिकल सबूत, हेल्थ टेक्नोलॉजी असेसमेंट और भुगतान की टिकाऊ व्यवस्था को मजबूत करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि रोबोटिक्स जैसी एडवांस तकनीक जैसे-जैसे ज्यादा इस्तेमाल में आएगी, वैसे-वैसे डॉक्टरों की स्किल, इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी सिस्टम को भी उतना ही मजबूत करना पड़ेगा। उनके मुताबिक लक्ष्य ऐसा हेल्थ सिस्टम होना चाहिए जिसमें भारतीय नवाचार और दुनिया जैसी क्वालिटी की तकनीक जरूरतमंद मरीजों को किफायती दाम में मिल सके।

सम्मेलन में डॉ. गौरव शंकर प्रधान ने कहा कि कोई भी उपकरण अस्पताल में होने से ही काम नहीं आता, बल्कि तभी सार्थक है जब डॉक्टर, टेक्नीशियन और बाकी स्टाफ उसे सुरक्षित और सही तरीके से इस्तेमाल करना जानते हों। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के संयुक्त निदेशक डॉ. शैलेश कुमार यादव ने कहा कि नई मेडिकल तकनीक को मरीजों तक पहुंचाने के लिए सिर्फ उसका क्लिनिकल असर दिखना काफी नहीं, साथ ही सही फंडिंग और पेमेंट व्यवस्था का होना भी जरूरी है।

इसके अलावा डॉ. नेहा दुमका और डॉ. जशवंतसिंह परमार समेत बाकी एक्सपर्ट्स ने भी हेल्थ सिस्टम में तकनीक के इस्तेमाल, उसकी लागत, ट्रेनिंग, प्राइमरी हेल्थ सेवाओं को मजबूत करने और पिछड़े इलाकों तक मेडटेक पहुंचाने पर अपनी बात रखी।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे