डिजिटल इकॉनमी के लिए लचीला कॉम्पिटिशन फ्रेमवर्क ज़रूरी, 'द डायलॉग' की कॉन्फ्रेंस में बोले जानकार
'द डायलॉग' की चौथी सालाना अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में जानकारों ने कहा कि एआई के दौर में सख्त नियमों की जगह लचीला कॉम्पिटिशन फ्रेमवर्क बेहतर रहेगा।
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भारत ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करने वाली डिजिटल अर्थव्यवस्था खड़ी करने की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि इनोवेशन, निवेश और स्टार्टअप्स की ग्रोथ को रोके बिना बाज़ारों को खुला और कॉम्पिटिटिव कैसे रखा जाए। 'द डायलॉग' की चौथी सालाना अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में इसी मुद्दे पर गहराई से चर्चा हुई।
कॉन्फ्रेंस का विषय था "कॉम्पिटिशन, इनोवेशन और ग्रोथ: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियाद"। इसमें जानकारों ने तीन बड़ी चुनौतियों पर ज़ोर दिया। पहली, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) की डिजिटल पहुंच बढ़ाना। दूसरी, भारत के एआई इकोसिस्टम को ग्लोबल लेवल पर मज़बूत करना। तीसरी, दुनिया के आर्थिक हालात को देखते हुए संतुलित कॉम्पिटिशन पॉलिसी बनाना।
आईई लॉ स्कूल के असिस्टेंट प्रोफेसर और आईसीएलई के सीनियर स्कॉलर डॉ. लाज़ार राडिक ने कहा कि डिजिटल बाज़ारों में पहले से सख्त 'एक्स-अँटे' नियम थोपने की बजाय हर केस की मेरिट पर चलने वाला लचीला कॉम्पिटिशन फ्रेमवर्क ग्राहकों की हिफाज़त और इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए ज़्यादा कारगर होता है।
कॉम्पिटेर ग्रुप के अध्यक्ष शंकर ए. सिंघम ने कहा कि पहले से तय नियमों से छोटी कंपनियों का कंप्लायंस खर्च बढ़ता है। इसलिए विकासशील अर्थव्यवस्था को ऐसा फ्रेमवर्क चुनना चाहिए जो कारोबार को कॉम्पिटिशन और निवेश की आज़ादी दे। स्कोप ग्लोबल एक्सचेंज की संस्थापक एलिसा रामुंडो ने बताया कि टेक्नोलॉजी की असली कीमत उसके असल इस्तेमाल और बड़े पैमाने पर अपनाए जाने में है। मौजूदा क्षमताओं का पूरा फायदा उठाना पॉलिसी के लिहाज़ से बेहतर रास्ता है।
'द डायलॉग' के संस्थापक निदेशक काज़िम रिज़वी ने भारत के लिए सबूतों पर टिके और आगे की सोच रखने वाले डिजिटल कॉम्पिटिशन फ्रेमवर्क की ज़रूरत बताई। उन्होंने कहा कि जनरेटिव एआई के उभरने से बाज़ार की सीमाएं बदल रही हैं। नई सख्त एक्स-अँटे व्यवस्था लाने की बजाय भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की अमल करने की ताकत बढ़ानी चाहिए, डिजिटल मार्केट्स डिवीज़न के तहत खास महारत तैयार करनी चाहिए और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल के कामकाज में सुधार को तरजीह देनी चाहिए। उनके मुताबिक इससे स्टार्टअप्स और निवेश को झटका दिए बिना कॉम्पिटिशन की दिक्कतें सुलझाई जा सकेंगी।
कॉन्फ्रेंस में 'द डायलॉग' की 2026 की शुरुआत में आई स्टडी "कॉम्पिटिशन, इनोवेशन एंड मार्केट स्ट्रक्चर इन इंडियाज़ एआई इकोसिस्टम" के नतीजों पर भी खास चर्चा हुई। इस स्टडी के मुताबिक भारत के 85% एआई डेवलपर्स पब्लिक क्लाउड पर निर्भर हैं और 74.5% डेवलपर्स के पास कंप्यूट प्रोवाइडर्स काफी तादाद में उपलब्ध हैं। 96.2% डेवलपर्स ओपन-सोर्स टूल्स इस्तेमाल करते हैं, और 79% से ज़्यादा डेवलपर्स ओपन-सोर्स मॉडल्स को प्रोप्राइटरी विकल्पों से बेहतर मानते हैं।
मांग की तरफ देखें तो 85% कारोबारों ने कहा कि एआई के इस्तेमाल से उन्हें अच्छा नतीजा मिला। इनमें 61% कंपनियों ने बेहतर फैसले लेने की क्षमता और 55% कंपनियों ने तेज़ सर्विस डिलीवरी का ज़िक्र किया। 74% ग्राहकों ने माना कि डिजिटल सेवाओं में एआई से उनका अनुभव बेहतर हुआ है। इन नतीजों से साफ है कि भारत की कॉम्पिटिशन पॉलिसी को सख्त पाबंदियां लगाने की बजाय इनोवेशन, स्किल डेवलपमेंट और एआई के व्यापक इस्तेमाल को सक्रिय रूप से सहारा देना चाहिए।
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