देर रात खाना और कैफीन बिगाड़ रहे शहरी भारतीयों की सेहत, आयवा की स्टडी में खुलासा
आयवा कंपनी की स्टडी में सामने आया कि देर रात खाना, कैफीन और नींद की कमी शहरी भारतीयों के मेटाबॉलिक हेल्थ को कैसे बिगाड़ रही है।
शहरी भारतीयों की मेटाबॉलिक यानी चयापचय सेहत को लेकर एक बड़ी स्टडी में चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। रोजमर्रा की कुछ आदतें लोगों की सेहत और लाइफस्टाइल पर लगातार बुरा असर डाल रही हैं। यह स्टडी टच-सेंसिंग टेक्नोलॉजी पर बना दुनिया का पहला मेटाबॉलिक वेलनेस ट्रैकर बनाने वाली कंपनी आयवा (EYVA) ने की है।
'इंडिया वेलनेस इंडेक्स 2026' नाम की इस रिपोर्ट में 30,000 से ज्यादा प्लेटफॉर्म यूजर्स के 35 लाख से अधिक अनाम हेल्थ रिकॉर्ड्स की जांच की गई। जिन लोगों का वेलनेस स्कोर कम पाया गया, उनमें कुछ आदतें कॉमन थीं - लंबे समय तक बैठकर सफर करना, रात में देर से और भरपेट खाना, खाने के बाद कोई फिजिकल एक्टिविटी न करना, देर से कैफीन लेना और पूरी नींद न लेना।
रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 54 फीसदी लोग रात 9 बजे के बाद खाना खाते हैं, और यह ट्रेंड बड़े शहरों में और ज्यादा है। सबसे देर से खाना खाने के मामले में मुंबई सबसे आगे है, जहां 64 फीसदी लोग रात 9:30 बजे के बाद डिनर करते हैं, जबकि दिल्ली में लोग सबसे ज्यादा मात्रा में खाना खाते हैं। जो लोग देर से खाना खाते हैं, उनकी नींद की क्वालिटी खराब पाई गई और अगली सुबह उनके ब्लड ग्लूकोज का लेवल सामान्य से ज्यादा दर्ज हुआ।
आयवा के फाउंडर और सीईओ सुनील मधिकटला ने इस बारे में कहा कि देश भर में देर रात खाने की आदत बढ़ रही है। इसकी एक बड़ी वजह लंबा सफर है, लेकिन घर में काम करने वाले किसी सदस्य के देर से आने पर पूरे परिवार का खाने का टाइम ही बदल जाता है। उनके मुताबिक रात में देर से भरपेट खाना, तनाव और कैफीन की वजह से रातभर दिल की धड़कन तेज रहती है और सुबह शरीर पूरी तरह तरोताजा महसूस नहीं करता। इस स्थिति को उन्होंने 'मेटाबॉलिक हैंगओवर' नाम दिया।
अलग-अलग शहरों में भी काफी फर्क देखा गया। मुंबई में 52 फीसदी यूजर्स रोज के आने-जाने के लिए लोकल ट्रेन या पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करते हैं, इस वजह से उनका पैदल चलना ज्यादा है, लेकिन पीक आवर्स की भीड़ और तनाव के चलते उनमें हार्ट रेट से जुड़े इंडेक्स ज्यादा पाए गए। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के स्मॉग के चलते लोगों की बाहरी फिजिकल एक्टिविटी 30 फीसदी तक घट गई, जिससे सांस से जुड़ी दिक्कतें बढ़ीं और मेटाबॉलिक वेलनेस स्कोर 6 से 9 फीसदी तक गिर गया।
बेंगलुरु में 44 फीसदी नौकरीपेशा लोगों को वर्किंग डे पर लंबे समय तक बैठकर सफर करना पड़ता है, जिससे उनकी रोजाना की फिजिकल एक्टिविटी 18 फीसदी कम पाई गई। हालांकि पार्क और हरियाली वाली जगहों पर समय बिताने वाले 10 में से 7 लोगों ने बताया कि उनका मूड ज्यादा पॉजिटिव रहता है। हैदराबाद में 64 फीसदी नौकरीपेशा और प्रोफेशनल्स रात 10 बजे के बाद खाना खाते हैं, जिसकी वजह से उनमें बार-बार 'मेटाबॉलिक हैंगओवर' का पैटर्न देखा गया और अगली सुबह ब्लड ग्लूकोज लेवल व मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी दर्ज हुई।
रिपोर्ट में यह भी साफ हुआ कि एक ही परिवार में एक जैसा खाना खाने पर भी दो लोगों के शरीर पर असर अलग-अलग होता है, यानी सबके लिए एक जैसी डाइट एडवाइस कारगर नहीं होती। हालांकि खाने के बाद थोड़ी देर टहलने वाले करीब 37 फीसदी यूजर्स में ब्लड ग्लूकोज लेवल 12 से 16 फीसदी बेहतर तरीके से कंट्रोल रहा और उनकी नींद भी अच्छी पाई गई। जिन लोगों ने अपनी लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे पॉजिटिव बदलाव किए, उनके वेलनेस स्कोर में तीन महीने के भीतर 8 से 12 फीसदी तक सुधार दर्ज हुआ।