दमा या COPD: खांसी-सांस फूलने की दिक्कत में असली बीमारी कौन सी, बिना टेस्ट पता नहीं चलेगा
खांसी, सांस फूलना और छाती में घरघराहट होने पर लोग तुरंत दमा समझ लेते हैं, लेकिन यही लक्षण COPD के भी हो सकते हैं। मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर की डॉ. गीता चोप्रा ने बताया कि दोनों बीमारियों में फर्क कैसे पता चलता है।
खांसी आना, सांस फूलना और छाती में घरघराहट होना, ये लक्षण दिखते ही ज्यादातर लोग मान लेते हैं कि दमा हो गया। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि ऐसा सोचना हमेशा सही नहीं है। यही लक्षण एक दूसरी बीमारी के भी हो सकते हैं जिसका नाम है COPD। दोनों बीमारियां देखने में एक जैसी लगती हैं, मगर अंदर से इनमें काफी फर्क है, और यहीं पर ज्यादातर लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं। मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर में बड़े पद पर काम कर रहीं डॉ. गीता चोप्रा ने इस बारे में जरूरी जानकारी दी है।
डॉ. चोप्रा के मुताबिक, भारत में होने वाली कुल मौतों में दमा और COPD मिलाकर दूसरे नंबर पर आते हैं। करीब 10.9 प्रतिशत मौतें इन्हीं दो बीमारियों की वजह से होती हैं। बाहर का प्रदूषण, घर के अंदर का धुआं, सिगरेट-तंबाकू का धुआं और पहले हो चुका कोई इन्फेक्शन, इनको इसकी मुख्य वजह बताया गया है। भारत में प्रदूषण ज्यादा होने की वजह से ये बीमारियां भी ज्यादा देखने को मिलती हैं। बुजुर्गों में इन बीमारियों से मौत का खतरा और भी ज्यादा रहता है।
दोनों बीमारियों में असल में होता क्या है, इस बारे में बताया गया कि सांस की नली में सूजन आ जाती है। नली के आसपास की मांसपेशियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे नली संकरी हो जाती है और हवा ठीक से अंदर-बाहर नहीं जा पाती। जब अटैक आता है तो अंदर कफ भी ज्यादा बनने लगता है, जिससे सांस लेना और मुश्किल हो जाता है।
दमा और COPD में फर्क समझाते हुए बताया गया कि दमा कम उम्र में भी शुरू हो सकता है, यहां तक कि छोटे बच्चों में भी दमा देखा जाता है। वहीं COPD आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद शुरू होता है। दमा के लक्षण दिन में बदलते रहते हैं, कभी ठीक लगता है तो कभी रात या सुबह के वक्त तकलीफ ज्यादा बढ़ जाती है। धूल लगने, ठंड लगने, एक्सरसाइज करने या टेंशन होने पर दमा की तकलीफ बढ़ जाती है, जबकि तकलीफ न हो तो फेफड़े बिल्कुल सामान्य तरीके से काम करते हैं। घर में किसी को दमा हो तो दूसरे सदस्य को भी होने की संभावना रहती है, और सबसे अहम बात यह कि इनहेलर लेते ही तुरंत आराम मिल जाता है।
COPD में ऐसा नहीं होता। इसके लक्षण लगातार बने रहते हैं और दवा लेने के बाद भी पूरी तरह आराम नहीं मिलता। थोड़ा चलने या सीढ़ी चढ़ने पर सांस फूलने लगती है, लगातार खांसी और कफ बना रहता है। यह तकलीफ धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, कम नहीं होती, और इनहेलर से भी थोड़ा ही आराम मिलता है, पूरा नहीं।
सिर्फ छाती में घरघराहट होने से यह नहीं कहा जा सकता कि यह दमा है या COPD, इसके लिए डॉक्टर जांच करते हैं। सबसे पहले डॉक्टर स्टेथोस्कोप लगाकर छाती की जांच करते हैं और देखते हैं कि घरघराहट की आवाज आ रही है या नहीं। इसके बाद छाती का एक्स-रे कराया जाता है, जिससे यह पता चलता है कि कहीं निमोनिया, टीबी या कैंसर तो नहीं है। कुछ मामलों में सीटी स्कैन भी करना पड़ता है, जिससे अंदर असल में क्या दिक्कत है, कोई इन्फेक्शन है या गांठ है, यह पता चलता है।
इसके बाद फेफड़ों के काम करने की टेस्ट की जाती है, जिसे Lung Function Test कहते हैं। इसमें Peak Flow Meter नाम की एक छोटी मशीन होती है, जिसमें मरीज को फूंक मारने को कहा जाता है। इससे पता चलता है कि फेफड़े कितनी ताकत से काम कर रहे हैं। अब कई नई लैब टेस्ट भी आ गई हैं। खून की जांच और थूक की जांच करके देखा जाता है कि टीबी है या कोई और इन्फेक्शन है। इसके लिए TB-PCR और कल्चर टेस्ट की जाती है। दमा में किस चीज से एलर्जी है, यह भी टेस्ट से पता चलता है, धूल हो, प्रदूषण हो या कोई और चीज, पता चलने पर उस चीज से बचा जा सकता है। कुछ मुश्किल मामलों में बायोप्सी भी करनी पड़ती है, यानी शरीर का एक छोटा टुकड़ा निकालकर जांचा जाता है।
डॉ. चोप्रा के मुताबिक, वक्त पर सही बीमारी का पता चल जाए तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है। दमा में किस चीज से एलर्जी है यह पता चलने पर उससे बचा जा सकता है, जबकि COPD में अगर इन्फेक्शन हो तो उस पर जल्दी दवा शुरू की जा सकती है। इसलिए लगातार खांसी या सांस फूलने की तकलीफ को मामूली समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि डॉक्टर के पास जाकर सही टेस्ट करवाना चाहिए, क्योंकि दमा है, COPD है या कुछ और, यह बिना टेस्ट के पता ही नहीं चलेगा।