ब्रिटन ने बनाया पहला स्पेस इफेक्ट्स स्क्वॉड्रन, दुश्मन के सैटेलाइट सिग्नल जाम करने की तैयारी
ब्रिटन ने सितंबर 2026 में अपनी पहली खास अंतरिक्ष यूनिट बनाई है। इसका काम दुश्मन के सैटेलाइट सिग्नल रोकना है।
ब्रिटन ने सितंबर 2026 में 'नंबर 3 स्पेस इफेक्ट्स स्क्वॉड्रन' (No. 3 Space Effects Squadron) की औपचारिक स्थापना की है। यह उसकी पहली खास अंतरिक्ष यूनिट है। इस स्क्वॉड्रन को जिम्मेदारी दी गई है कि वह अंतरिक्ष में दुश्मन देशों की संदिग्ध हरकतों पर नजर रखे, उनकी ताकत को रोके और उनके कामकाज में रुकावट डाले।
पश्चिमी देशों में रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमताओं को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है। दोनों देश सैटेलाइट पर नजर रखने और उन्हें तकनीकी तौर पर बेअसर करने में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। एक भरोसेमंद वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटन कुछ सालों से जमीन से चलने वाली ऐसी एडवांस तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे दुश्मन के सैटेलाइट को कोई शारीरिक नुकसान पहुंचाए या नष्ट किए बिना उनके सिग्नल पूरी तरह रोके जा सकते हैं। इससे साफ है कि आगे की लड़ाई में मिसाइलों से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक और साइबर हमलों पर भरोसा होगा।
लोग अक्सर सोचते हैं कि सैटेलाइट सिर्फ टीवी चैनल या मोबाइल इंटरनेट के लिए होते हैं। लेकिन आज की फौजी कार्रवाइयों में सैटेलाइट रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं। सेना का संपर्क, नेविगेशन, सटीक जासूसी, मिसाइल हमले की पहले से चेतावनी और सही वक्त तय करने (Precision Timing) में इनका इस्तेमाल होता है। ब्रिटन के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक उसके अहम सैटेलाइट फौजी जहाजों के नेविगेशन, मोबाइल कनेक्टिविटी और मिसाइल हमले की जानकारी देने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
ब्रिटन की आधिकारिक अंतरिक्ष नीति के मुताबिक ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) कुछ घंटे या दिन भी बंद रहे तो नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं। इससे सिर्फ फौजी कार्रवाइयां नहीं रुकेंगी, आम आदमी की जिंदगी भी बिगड़ जाएगी। बैंकिंग, शेयर बाजार, हवाई यातायात, समुद्री जहाजों का नेविगेशन, रेलवे, सड़क ट्रैफिक और मोबाइल नेटवर्क ठप पड़ सकते हैं। ब्रिटन के अंदाजे के मुताबिक सैटेलाइट सेवा में सिर्फ एक दिन की रुकावट से 1.4 अरब पाउंड का और एक हफ्ते की रुकावट से 7.64 अरब पाउंड का भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसलिए अंतरिक्ष युद्ध अब सिर्फ मिसाइल से सैटेलाइट तोड़ने तक सीमित नहीं रहा, उसमें लेजर, साइबर हमले और सिग्नल जैमिंग का इस्तेमाल भी बढ़ा है।
ब्रिटन ने सिर्फ एक स्क्वॉड्रन बनाकर बात खत्म नहीं की है। 'यूके स्पेस कमांड' के तहत पहले से नंबर 1 स्पेस ऑपरेशंस स्क्वॉड्रन और नंबर 2 स्पेस वॉर्निंग स्क्वॉड्रन काम कर रहे हैं। अब नंबर 3 के बाद ब्रिटन की योजना आगे नंबर 4, 5 और 6 यूनिटें शुरू करने की है। ये नई टुकड़ियां अंतरिक्ष युद्ध की ट्रेनिंग, एडवांस रडार तकनीक और रणनीति तैयार करने का काम करेंगी।
ब्रिटिश सरकार ने 2026-27 से 2029-30 के बीच अंतरिक्ष में फौजी कार्रवाइयों, खुफिया जानकारी जुटाने और सर्विलांस क्षमता बढ़ाने के लिए 880 मिलियन पाउंड के निवेश का ऐलान किया है। साथ ही ब्रिटन ने साफ किया है कि वह अंतरिक्ष में कचरा फैलाने वाले या सैटेलाइट नष्ट करने वाले सीधे मिसाइल टेस्ट से दूर रहेगा और सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक या साइबर रोकथाम के उपायों पर जोर देगा।
भारत के लिए ये घटनाक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। भारत सीमा की हिफाजत और देश के भीतर की सेवाओं के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र पर बहुत ज्यादा निर्भर है। 2019 में भारत ने 'मिशन शक्ति' के तहत एक मिसाइल से पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में मौजूद अपना ही सैटेलाइट कामयाबी से उड़ाकर एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता साबित की थी। ऐसी क्षमता रखने वाले दुनिया के गिने-चुने देशों में भारत भी है।
लेकिन ब्रिटन के इस नए कदम से भारत को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। दुश्मन का सैटेलाइट नष्ट करने से ज्यादा जरूरी अब अपने सैटेलाइट को जैमिंग और साइबर हमलों से बचाना हो गया है। इस लिहाज से इसरो (ISRO) का 'नेत्रा' (NETRA, यानी Network for Space Objects Tracking and Analysis) प्रोजेक्ट अहम साबित हो रहा है। इसके जरिए अंतरिक्ष के कचरे, दुश्मन के सैटेलाइट और संभावित खतरों पर टेलिस्कोप और रडार की मदद से 24 घंटे नजर रखी जा रही है।
इसरो की जानकारी के मुताबिक अभी भारत के 22 सैटेलाइट निचली कक्षा (LEO) में और 31 सैटेलाइट भूस्थिर कक्षा (GEO) में लगातार काम कर रहे हैं। इसके अलावा भारत का अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम 'नाविक' (NavIC) सेना की रणनीतिक जरूरतों और आम नागरिकों के इस्तेमाल, दोनों के लिए अहम है। NavIC का दायरा भारत की मुख्य भूमि के साथ सीमा से 1500 किलोमीटर तक फैला है। अगर इन सिस्टमों पर दुश्मन की तरफ से जैमिंग या लेजर हमला हुआ, तो भारत की सुरक्षा को बड़ा झटका लग सकता है।
अंतरिक्ष में फौजी हलचल बढ़ी है, फिर भी 'आउटर स्पेस ट्रीटी' (Outer Space Treaty) के तहत वहां परमाणु हथियार या सामूहिक संहार के हथियार तैनात करने पर पूरी तरह पाबंदी है। मगर जैमिंग, स्पूफिंग और लेजर हथियारों को लेकर साफ अंतरराष्ट्रीय नियम अब भी नहीं हैं। आगे की जंग की पहली चिंगारी जमीन पर पड़ने से पहले सैकड़ों किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में पड़ सकती है। इसलिए भारत को सिर्फ अंतरिक्ष मिसाइलों के भरोसे न रहकर अपने पूरे सैटेलाइट नेटवर्क को जैमिंग-प्रूफ, साइबर-सुरक्षित और ज्यादा मजबूत बनाने पर जोर देना होगा।