शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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भिलार के हिलरेंज स्कूल में बच्चों ने बनाए इको-फ्रेंडली आकाश कंदील, दिवाली पर पर्यावरण का संदेश

भिलार के हिलरेंज स्कूल में बच्चों ने बनाए इको-फ्रेंडली आकाश कंदील, दिवाली पर पर्यावरण का संदेश तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पढ़ाई PT24 टीम

वाई के भिलार में हिलरेंज माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने बेकार और पर्यावरण के अनुकूल सामान से दिवाली के आकाश कंदील तैयार किए।

वाई में दिवाली का त्योहार पर्यावरण का ख्याल रखते हुए मनाया जाए, इसी सोच के साथ भिलार के हिलरेंज माध्यमिक विद्यालय में एक खास पहल हुई। स्कूल में बच्चों से पर्यावरण के अनुकूल आकाश कंदील बनवाए गए। इसका मकसद सिर्फ त्योहार को इको-फ्रेंडली बनाना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों में क्रिएटिविटी, कलात्मकता और पर्यावरण बचाने की समझ भी जगाना था।

इस उपक्रम का आयोजन हिलरेंज एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष नितीन भिलारे, सचिव जतीन भिलारे, संचालिका डॉ. तेजस्विनी भिलारे और स्कूल के प्रधानाध्यापक मुकुंद शिंदे के मार्गदर्शन में किया गया।

बच्चों ने बेकार चीजों और पर्यावरण के अनुकूल सामान का इस्तेमाल करके एक से बढ़कर एक आकर्षक आकाश कंदील तैयार किए। विज्ञान के शिक्षक राजू मोरे और चित्रकला के शिक्षक शांताराम जाधव ने इस काम में विद्यार्थियों को रास्ता दिखाया। स्कूल की कोशिश यही थी कि इस गतिविधि के जरिए बच्चों में रचनात्मकता, कलात्मकता और पर्यावरण संवर्धन की जागरूकता पैदा हो।

इस उपक्रम में अलग-अलग तरह का पर्यावरण के अनुकूल सामान काम में लिया गया और बच्चों ने नए ढंग के आकाश कंदील बनाए। बेकार पड़ी चीजों का दोबारा इस्तेमाल, आसपास उपलब्ध साधनों का सूझबूझ से उपयोग और कलात्मक नजरिया, इन तीनों का सुंदर मेल इन कंदीलों में देखने को मिला।

विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशक्ति को खुली छूट देकर जो आकाश कंदील बनाए, उनके जरिए पर्यावरण की रक्षा का संदेश दिया गया। संदेश साफ था कि त्योहार और उत्सव मनाते समय इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि प्रकृति को कोई नुकसान न पहुंचे।

इस मौके पर नंदकुमार शिंदे, संगीता खरात, सुजाता पारठे, कल्पेश गायकवाड, विनायक बगाडे, योगिता रांजणे और संतोष मालुसरे मौजूद थे।

बच्चों के हुनर को मंच देने के साथ पर्यावरण संवर्धन की सीख को उनके भीतर बैठाने वाला यह उपक्रम रहा। इसने दिवाली की खुशी को सामाजिक जागरूकता से जोड़ने का काम किया। स्कूल में हुई इस गतिविधि से यह भी दिखा कि कम खर्च और बेकार सामान से भी सुंदर चीजें बन सकती हैं, बशर्ते बच्चों को सोचने और हाथ से बनाने का मौका मिले।

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