भातकुली में बारिश के डर से सोयाबीन कटाई की दौड़, त्योहार से पहले किसान परेशान
अमरावती के भातकुली तालुका में लौटती बारिश के माहौल से किसान जल्दी-जल्दी सोयाबीन काट रहे हैं। घटे उत्पादन के बीच दशहरा-दिवाली से पहले सरकारी मदद की मांग उठी है।
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दशहरा और दिवाली के त्योहार नजदीक हैं, लेकिन अमरावती जिले के भातकुली तालुका के किसानों के सामने बारिश का संकट खड़ा हो गया है। लौटती बारिश का माहौल बनने से तालुका में सोयाबीन की कटाई तेज हो गई है और किसानों की भागदौड़ बढ़ गई है। कटी हुई फसल खेत में ही खराब होने का डर है, इसलिए किसान सुबह से ही खेतों में पहुंच रहे हैं।
इस खरीफ सीजन में भातकुली तालुका में सबसे ज्यादा रकबा सोयाबीन का है। यहां 22 हजार 207 हेक्टेयर में सोयाबीन की बुआई हुई है। इसके अलावा 19 हजार 128 हेक्टेयर में कपास, 9 हजार 361 हेक्टेयर में तूर, 75 हेक्टेयर में उड़द, 10 हेक्टेयर में दूसरी तिलहन फसलें, 7.20 हेक्टेयर में मक्का और 2.40 हेक्टेयर में मूंग बोई गई है। यानी तालुके के बड़े तबके के किसानों का आर्थिक हिसाब सोयाबीन समेत खरीफ की फसलों पर टिका है।
टाकरखेडा संभू के साथ पूर्णानगर, आष्टी, देवरी निपाणी, जळका हिरापूर, रामा, साऊर, लसणापूर, कृष्णापूर और कळमगाव इलाके में सोयाबीन की कटाई का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है। कहीं मजदूरों से कटाई कराई जा रही है तो कहीं मशीन से। कटी हुई सोयाबीन को बारिश से बचाने के लिए किसान उसे फौरन खेत से घर या किसी सुरक्षित जगह पर ले जा रहे हैं।
मंगलवार की रात कुछ इलाकों में बादल छाए रहे और बिजली कड़कती रही, जिससे किसानों की चिंता और बढ़ गई। बुधवार सुबह से ही कई किसान खेतों में पहुंच गए थे। दिन भर कटाई करके तैयार हुई फसल बारिश की मार में न आ जाए, इसी वजह से सबकी भागदौड़ चल रही थी।
इस साल बारिश की अनियमितता और दूसरे कई कारणों से सोयाबीन के उत्पादन पर असर पड़ा है। ऐसे में जो फसल बची है, वह भी बारिश से खराब हो गई तो किसानों की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। किसानों को डर है कि कटाई के बाद खेत में रखी सोयाबीन भीग गई तो उसकी क्वालिटी पर असर पड़ेगा और बाजार भाव भी गिरेगा।
एक किसान ने कहा कि आज किसान कभी आसमानी तो कभी सुलतानी संकट से परेशान है। उनके गांव के कम से कम 50 प्रतिशत इलाके में बहुत कम बारिश की वजह से फसल का नुकसान हुआ है। कुछ किसानों ने जून के आखिर में सोयाबीन बोई थी, उसमें दो से तीन क्विंटल का उतारा आ रहा है, लेकिन देर से बोई गई सोयाबीन में तो उतना भी उत्पादन नहीं मिलेगा, यह पक्का हो चुका है। इसलिए सरकार को खर्च और उत्पादन के आधार पर प्रति हेक्टेयर कम से कम एक लाख रुपये की मदद देकर रबी सीजन की तैयारी में सहारा देना चाहिए।
एक दूसरे किसान ने बताया कि लगातार बदलते मौसम की वजह से इस साल उनके खारपाण पट्टे में किसी को सोयाबीन का एक दाना तक नहीं हुआ। सोयाबीन के उत्पादन में जबरदस्त गिरावट आई है और सरकार ने ट्रिगर वन लागू कर दिया, फिर भी अब तक किसी किसान को नुकसान भरपाई नहीं मिली है। दशहरा सिर पर है, दिवाली भी है, इसलिए उम्मीद यही है कि त्योहार से पहले किसानों को ठोस मदद मिले।
दशहरा-दिवाली के मौके पर किसान परिवारों पर आर्थिक संकट आ गया है। किसान चाहते हैं कि सरकार सिर्फ आश्वासन न दे, बल्कि असल मदद फौरन किसानों के खाते में जमा करे।