बाप्पा को विसर्जन के वक्त शिदोरी क्यों बांधते हैं, जानिए इस परंपरा के पीछे की वजह
गणेश विसर्जन के दौरान कुछ घरों में बाप्पा को शिदोरी बांधने की परंपरा निभाई जाती है, जिसके पीछे की भावना और मान्यता जानिए।
गणेशोत्सव की बात हो तो भक्ति और उत्साह के साथ-साथ बाप्पा को विदा करने का भावुक पल भी सामने आ जाता है। डेढ़ दिन, पांच दिन या जिस भी दिन गणपति का विसर्जन होता है, उससे पहले आरती, नैवेद्य और उत्तरपूजा की जाती है। इसके बाद 'गणपति बाप्पा मोरया, अगले साल जल्दी आना' का जयघोष करते हुए बाप्पा को विदाई दी जाती है। लेकिन महाराष्ट्र के कुछ परिवारों में इस विदाई की रस्म में एक और आत्मीयता भरी परंपरा देखने को मिलती है, वो है विसर्जन के वक्त गणपति बाप्पा को शिदोरी बांधकर देना।
शिदोरी शब्द पुराने ग्रामीण और पारंपरिक जीवन से जुड़ा हुआ है। पहले जब कोई घर से लंबे सफर पर निकलता था, तो रास्ते में खाने के लिए घर से कुछ पकवान बांधकर दिए जाते थे। इस खाने की पोटली को शिदोरी कहा जाता था। सफर में भूख लगने पर घर से दिया हुआ खाना खाया जाए, इस सोच के साथ ही उसमें घरवालों का प्यार, फिक्र और अपनापन भी समाया रहता था। इसी भावना को गणपति विसर्जन की परंपरा से जोड़ा जाता है। भक्तों की मान्यता के अनुसार, गणेशोत्सव के लिए घर आए बाप्पा विसर्जन के बाद अपने मूल स्थान यानी कैलाश की ओर लौट जाते हैं। इसलिए बाप्पा अब सफर पर निकल रहे हैं, इस भावुक सोच के साथ उनके साथ खाने-पीने का सामान शिदोरी के रूप में दिया जाता है।
इसके पीछे यह कोई धार्मिक सिद्धांत नहीं माना जाता कि बाप्पा को सच में खाने की जरूरत है। बल्कि शिदोरी को भक्त की भावना का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह घर का कोई सदस्य या प्यारा मेहमान सफर पर निकलते वक्त उसे रास्ते के लिए कुछ खाने को दिया जाता है, उसी अपनेपन के साथ बाप्पा को भी विदाई के वक्त शिदोरी दी जाती है। कई भक्तों के मन में गणपति को घर के सदस्य या प्यारे मेहमान की तरह मानने की भावना होती है।
शिदोरी में क्या रखा जाए, इसके लिए पूरे महाराष्ट्र में कोई एक तय नियम नहीं है। यह परंपरा परिवार, गांव, इलाके और स्थानीय रिवाज के हिसाब से बदल सकती है, इसलिए एक घर की शिदोरी दूसरे घर की शिदोरी से अलग हो सकती है। कहीं दही-भात या दही-पोहे रखे जाते हैं, तो कुछ परिवारों में लड्डू, गुड़-खोबरा, पोहे, लाही या घर के बने दूसरे पकवान शिदोरी में रखने का रिवाज है। यहां मुख्य बात पकवानों से ज्यादा उनके जरिए जताई जाने वाली भावना है।
भारतीय संस्कृति में घर से सफर पर निकलने वाले को कुछ खाने के लिए देने की परंपरा काफी पुरानी है। गणपति को घर का सदस्य या प्यारा मेहमान मानने की भावना से ही शिदोरी देने की परंपरा बनी मानी जाती है। यह सबसे अहम सवाल है कि गणपति विसर्जन के वक्त शिदोरी देना हर जगह जरूरी धार्मिक रिवाज नहीं है। यानी शिदोरी न दी जाए तो विसर्जन की पूजा अधूरी रह जाती है, ऐसा कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है। यह रिवाज कुछ परिवारों और स्थानीय स्तर पर निभाई जाने वाली श्रद्धा और लोकपरंपरा है। जिन घरों में पीढ़ियों से शिदोरी देने की परंपरा चली आ रही है, वहां इसे श्रद्धा से निभाया जाता है, वहीं कुछ परिवार उत्तरपूजा, आरती और नैवेद्य करके विधिवत विसर्जन कर देते हैं। इसलिए शिदोरी देना या न देना परिवार की श्रद्धा और परंपरा पर निर्भर करता है।