अंधानुयायी नहीं, खुद वक्ता बनो: 'हनुमान अंश' के संगीतकार ऋषि पाठक ने नागपुर में युवाओं से की बात
गीतकार-संगीतकार ऋषि पाठक ने नागपुर दौरे पर 'हनुमान अंश' के गानों, अपनी लाइन प्रोड्यूसर की भूमिका और युवाओं के लिए अपने संदेश पर खुलकर बात की।
यह मुल्क ऐसा है जहां हर किसी को अपनी बात खुलकर रखने का हक है, तो फिर किसी और का अंधानुयायी बनने की बजाय खुद वक्ता बनना चाहिए। यह बात गीतकार और संगीतकार ऋषि पाठक ने नागपुर दौरे के दौरान कही। फिल्म 'हनुमान अंश' के संगीत को मिली जबरदस्त कामयाबी के बाद ऋषि पाठक इन दिनों चर्चा में हैं।
ऋषि पाठक का कहना है कि सिनेमा में दिखने वाले दृश्य तो कहानी बताते ही हैं, लेकिन उसमें जो भावनाएं और गहराई आती है वो संगीत और शब्दों से ही आती है। 'हनुमान अंश' के गानों में उन्हें कहानी, भक्ति और संवेदना का ऐसा मेल देखने को मिला जो कम ही जगह मिलता है।
इस फिल्म में ऋषि पाठक का काम सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं रहा। शुरुआत से ही उन्होंने लाइन प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी भी संभाली। फिल्म के तीन मुख्य गानों में उनका सीधा हाथ रहा है। मशहूर भजन 'वैष्णव जन' को उन्होंने अपने अलग अंदाज में संगीतबद्ध किया, वहीं 'जय हनुमान' गाने में उनका सह-लेखन रहा। 'राम भजन की ओर' गाने का लेखन और संगीत संयोजन भी उन्होंने खुद किया।
अपनी इस कामयाबी पर ऋषि पाठक ने कहा कि उन्होंने पूरी लगन और समर्पण से काम किया, और जो भी सफलता मिली उसे उन्होंने पूरे भाव से भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। उनका कहना है कि इसी वजह से अब सफलता और असफलता के फर्क से वो ऊपर उठ गए हैं। फिल्म के निर्माता विशाल का कहना है कि मुश्किल हालात में भी निष्ठा और भक्ति से ही जीत हासिल हुई है।
गानों की बनावट पर बात करते हुए ऋषि पाठक ने बताया कि इनके बोल बेहद आसान और सीधे हैं, फिर भी दिल को छूते हैं, यही वजह है कि लोग खुद को इनसे जोड़ पाते हैं। संगीत में पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ-साथ गिटार और मेंडोलिन जैसे मॉडर्न और क्लासिकल तार वाद्ययंत्रों का भी बढ़िया इस्तेमाल हुआ है। इस पूरे सफर में धीरेंद्र मुल्कलवार, शांतनु सुदामे, अभिजीत सत्पथी, ईशान शर्मा और निवेदिता पद्मनाभन का भी अहम योगदान रहा। ऋषि पाठक ने यह भी बताया कि साधु तिवारी का लिखा गाना 'पार्वती' उन्हें व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा पसंद है।
युवाओं के नाम अपना संदेश देते हुए ऋषि पाठक ने कहा कि बाहर की दुनिया देखने से पहले युवाओं को अपनी समृद्ध संस्कृति और अपनी जड़ों को समझना चाहिए। उनके मुताबिक जिंदगी की हर मुश्किल का हल हमारी अपनी संस्कृति में ही छुपा है, और आखिरकार हमें वहीं लौटना है। 'हनुमान अंश' फिल्म से यही मकसद पूरा हुआ है और इससे लोगों में एक नई सांस्कृतिक जागरूकता आई है। ऋषि पाठक ने बताया कि अब लोग 'हेलो' की जगह 'सीताराम' कहने लगे हैं। इस बड़े बदलाव को उन्होंने 'रामसेतु' के निर्माण से जोड़ते हुए कहा कि इसमें उनका योगदान एक छोटी सी गिलहरी जैसा ही है।