आलापल्ली में धम्मक्रांति को गति देने के लिए सामाजिक बदलाव की जरूरत: सूर्यभान डोंगरे
आलापल्ली के संघमित्रा बौद्ध विहार में वर्षावास प्रवचनमाला का 'पुष्प अठारहवां' कार्यक्रम हुआ।
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अशोक विजयादशमी और धम्मचक्र प्रवर्तन दिन के मौके पर आलापल्ली के संघमित्रा बौद्ध विहार में वर्षावास प्रवचनमाला का 'पुष्प अठारहवां' कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ हुआ। इसमें 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की धम्मक्रांति को गति कैसे दें?' विषय पर सूर्यभान डोंगरे ने मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि धम्मक्रांति का विचार समाज के सबसे निचले तबके तक पहुंचाने के लिए शिक्षा, प्रज्ञा, समता, बंधुता, नैतिक आचरण और सामाजिक सेवा के जरिए व्यापक बदलाव लाने की जरूरत है।
यह कार्यक्रम मंगलवार, 20 अक्टूबर को भारतीय बौद्ध महासभा और कई सामाजिक संस्थाओं ने मिलकर रखा था। इसमें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की धम्मक्रांति के इतिहास, बौद्ध तत्त्वज्ञान, आज की सामाजिक चुनौतियों और धम्म के प्रसार के लिए जरूरी उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम से यह संदेश दिया गया कि बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों का अध्ययन करके उन्हें आज के सामाजिक सवालों से जोड़ना जरूरी है। महापुरुषों के विचार सिर्फ जयंती, उत्सव या कार्यक्रम तक सीमित न रहें, बल्कि उनके तत्त्वज्ञान के मुताबिक सामाजिक प्रतिबद्धता निभाना अहम है।
आयोजन डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति आलापल्ली, भारतीय बौद्ध महासभा गडचिरोली (दक्षिण, उत्तर), महिला समिति आलापल्ली, भारतीय बौद्ध महासभा तालुका शाखा अहेरी, महामाया महिला मंडळ आलापल्ली और बहुउद्देशीय महिला मंडळ आलापल्ली ने मिलकर किया।
रूपरेखा के मुताबिक बुद्धवंदना, त्रिशरण और पंचशील ग्रहण, भीमस्मरण और प्रवचन हुए। सूत्रसंचालन बी. एम. दुर्गम सर ने किया। भीमगीतों की प्रस्तुति और आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम खत्म हुआ। आलापल्ली और अहेरी परिसर के बौद्ध उपासक और उपासिका बड़ी संख्या में मौजूद थे। "नमो बुद्धाय! जय भीम!" के जयघोष के बीच धम्मक्रांति का विचार समाज के हर घटक तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।
सूर्यभान डोंगरे ने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धम्म स्वीकार करके भारतीय समाज को समता, स्वतंत्रता, बंधुता और मानवता का नया रास्ता दिखाया। उनके मुताबिक यह धम्मक्रांति सिर्फ धर्मांतरण तक सीमित नहीं है। यह इंसान के विचारों, आचरण और सामाजिक रिश्तों में बदलाव लाने वाली व्यापक प्रक्रिया है। इसका मूल मकसद समाज की विषमता दूर करना, विवेकवादी विचारों को बढ़ावा देना और हर व्यक्ति को सम्मान से जीने का अधिकार दिलाना है। इसलिए धम्म का तत्त्वज्ञान सिर्फ प्रवचनों तक न रखकर असल जिंदगी में उतारना जरूरी है, यह उन्होंने साफ किया।
डॉ. आंबेडकर के लिखे ग्रंथ 'बुद्ध और उनका धम्म' के विचारों का हवाला देकर डोंगरे ने बुद्ध के तत्त्वज्ञान की सामाजिक उपयोगिता समझाई। उन्होंने कहा कि बुद्ध का धम्म विवेक, प्रज्ञा, करुणा और नैतिक आचरण पर टिका है। समाज को वैज्ञानिक नजरिया अपनाकर अंधश्रद्धा और अनिष्ट प्रथाओं से दूर रहना चाहिए। अशोक विजयादशमी का ऐतिहासिक महत्त्व और धम्मक्रांति की पृष्ठभूमि बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि यह परिवर्तनवादी विचार नई पीढ़ी तक पहुंचाना वक्त की जरूरत है।
धम्मक्रांति को व्यापक रूप देने के लिए डोंगरे ने समाज से सामूहिक कोशिश की अपील की और कई मुद्दे गिनाए। पहला, शिक्षा को प्राथमिकता, ताकि नई पीढ़ी में चिकित्सक ढंग से सोचने की क्षमता बने। दूसरा, युवाओं की सक्रिय भागीदारी, यानी धम्म और आंबेडकर का तत्त्वज्ञान उन तक पहुंचाकर उन्हें सामाजिक काम में जोड़ना। तीसरा, महिला सशक्तीकरण, जिसमें महिलाओं को शिक्षा, बराबरी के मौके और सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने के ठोस प्रयास हों।
चौथा मुद्दा अंधश्रद्धा निर्मूलन का है, यानी विवेकवादी और वैज्ञानिक नजरिया बैठाकर अंधश्रद्धा और अनिष्ट प्रथाओं के खिलाफ जनजागरण। पांचवां, जातिभेद निर्मूलन, यानी जातीय विषमता दूर करके समता और बंधुता पर टिकी समाज व्यवस्था बनाना। छठा, नैतिक आचरण, यानी बुद्ध की शिक्षा के नैतिक मूल्य रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाकर सामाजिक जिम्मेदारी का भान रखना। सातवां, सामाजिक सेवा और संगठन, यानी समाज के वंचित तबके की समस्याएं सुलझाने के लिए संगठित होकर काम करना। आठवां, वैश्विक स्तर पर धम्म का प्रसार, यानी बुद्ध के मानवतावादी विचारों का अलग-अलग स्तर पर प्रचार।
कार्यक्रम में यशवंत मनोहर के प्रबंध 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने विपश्यना क्यों ठुकराई?' के साथ 'अस्पृश्य कौन थे?' और 'बुद्ध और कार्ल मार्क्स' विषयों के विचारों का भी हवाला दिया गया। इन विषयों के जरिए सामाजिक विषमता, अस्पृश्यता के इतिहास, बौद्ध विचारधारा और परिवर्तनवादी नजरिए पर विचारमंथन हुआ।
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