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5.16 करोड़ मुकदमे लंबित, इंसाफ के इंतजार में बीत रही हैं लोगों की जिंदगियाँ

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक जिला अदालतों में करीब 5.16 करोड़ मामले लंबित हैं। जजों की कमी और बुनियादी सुविधाओं की दिक्कत भी सामने है।

5.16 करोड़ मुकदमे लंबित, इंसाफ के इंतजार में बीत रही हैं लोगों की जिंदगियाँ तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नागपुर : किसी भी लोकतंत्र में न्याय की अहमियत सबसे ऊपर है। संविधान हर नागरिक को बराबरी, आजादी और न्याय का भरोसा देता है। मगर जब इंसाफ के लिए बरसों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ें, जमा-पूंजी वकीलों की फीस में चली जाए और घर की शांति टूट जाए, तो सवाल उठता है कि क्या सिर्फ न्याय का हक मिल जाना काफी है, या वक्त पर न्याय मिलना भी उतना ही जरूरी है?

भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं लंबित मुकदमे, जजों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और प्रक्रिया की उलझनें। मुकदमा सिर्फ एक फाइल नहीं होता। उसके पीछे किसी का घर, रोजी-रोटी, इज्जत और पूरे परिवार का भविष्य जुड़ा होता है।

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक जिला और अधीनस्थ अदालतों में करीब 5.16 करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें 4.04 करोड़ आपराधिक और 1.12 करोड़ दीवानी मामले हैं। ये आंकड़े बदलते रहते हैं, लेकिन मतलब साफ है कि करोड़ों लोग आखिरी फैसले का इंतजार कर रहे हैं। सबसे फिक्र की बात यह है कि कई बार फैसले से पहले ही वादी की मौत हो जाती है और अगली पीढ़ी वही लड़ाई आगे लड़ती है।

आम आदमी का सबसे ज्यादा वास्ता जिला अदालतों से पड़ता है। वहाँ गवाही, दस्तावेजों की जांच और जमानत में वक्त लगता है, फिर अपील हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाती है। अपील का हक जरूरी है, पर हर स्तर पर होने वाली देरी प्रक्रिया को ही सजा बना देती है। इसलिए सिर्फ कुल संख्या नहीं, यह भी बताया जाना चाहिए कि कितने मामले 5, 10, 15 और 20 साल से लंबित हैं।

जजों की कमी भी बड़ी वजह है। कानून मंत्रालय के 1 जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में मंजूर 38 पदों में से 32 पर जज हैं और 6 पद खाली हैं। 25 हाईकोर्ट में 1,122 मंजूर पदों में से 789 भरे हैं और 333 पद खाली हैं, यानी करीब 30% कुर्सियाँ खाली पड़ी हैं। जिला अदालतों में भी नियमित मूल्यांकन जरूरी है। नियुक्तियों में देरी से हालात और बिगड़ते हैं।

तीनों स्तरों पर नजर डालें तो जिला अदालतों में 5.16 करोड़, हाईकोर्ट में 65.43 लाख और सुप्रीम कोर्ट में 95,739 मामले लंबित हैं। यानी यह दिक्कत किसी एक स्तर की नहीं, पूरे तंत्र की है।

फरवरी 2026 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिला न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के 25,894 पद मंजूर हैं, जबकि 21,027 काम कर रहे हैं। अदालत कक्ष 22,712 हैं। कई जगह रिकॉर्ड मैनेजमेंट, प्रतीक्षालय और डिजिटल सुविधाओं का इस्तेमाल बराबर नहीं है। गाँव के लोगों के लिए तो अदालत तक पहुँचना ही महँगा पड़ता है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला खर्च निवेश है।

जिला अदालतों में आपराधिक मामले दीवानी मामलों से 3.6 गुना ज्यादा हैं। सवाल यह है कि क्या छोटे विवाद वक्त पर निपट रहे हैं? पुलिस जांच, चार्जशीट और गवाहों की पेशी में होने वाली देरी कम की जा सकती है। जहाँ कानून इजाजत दे, वहाँ लोक अदालत और मध्यस्थता से समाधान हो सकता है, पर हर आपराधिक मामले में समझौता मुमकिन नहीं।

बोझ घटाने के लिए सोची-समझी योजना बन सकती है। इसमें कम नुकसान वाले और गंभीर हिंसा से जुड़े न होने वाले छोटे अपराधों की सूची बने, बरसों से लंबित छोटे मामले छांटे जाएँ, और समझौते व लोक अदालत को बढ़ावा मिले। संसद पात्र मामलों में साफ पात्रता, अपवाद और न्यायिक निगरानी के साथ सीमित राहत दे सकती है। हत्या, बलात्कार और महिलाओं-बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराध इससे बाहर रहें। पहली बार मामूली अपराध करने वालों के लिए चेतावनी और परिवीक्षा जैसे सुधार वाले विकल्प देखे जाएँ। मकसद अपराध को बढ़ावा देना नहीं, संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल है।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी जोर है। न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं। नागरिक को जानने का हक है कि देरी क्यों हो रही है, और NJDG जैसे मंच इसमें अहम हैं। हर मुकदमे की स्थिति ऑनलाइन हो, बार-बार टलने वाले मामलों की समीक्षा हो, स्थगन की वजहें दर्ज हों, पुराने मामलों की सार्वजनिक रिपोर्ट आए, खाली पदों और लंबित मामलों के आंकड़े नियमित अपडेट हों और समन तामील में देरी दूर की जाए। मगर पारदर्शिता के नाम पर सिर्फ संख्या देखकर जजों के फैसलों की गुणवत्ता आंकना ठीक नहीं।

सुधार के लिए 12 सुझाव दिए गए हैं। खाली पद वक्त पर भरे जाएँ और काम के बोझ के हिसाब से पदों की समीक्षा हो। 5, 10, 15, 20 साल से पुराने मामलों के लिए खास अभियान चले, पर नए जरूरी मामले नजरअंदाज न हों। बिना वजह तारीख पर तारीख, गवाहों की गैरहाजिरी और समन तामील की दिक्कत सुलझे। छोटे मामलों के लिए आसान और समयबद्ध प्रक्रिया बने। ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का दायरा बढ़े और साथ में सहायता केंद्र हों। इमारतों, कक्षों, कर्मचारियों और तकनीक के लिए पूरा बजट मिले। पुलिस जांच, फोरेंसिक, अभियोजन और अदालत के बीच बेहतर तालमेल हो। पारिवारिक, व्यापारिक और संपत्ति विवादों में वैकल्पिक समाधान को बढ़ावा मिले। गरीबों को मुफ्त कानूनी मदद की क्वालिटी सुधरे। काम के बोझ, निपटारे और स्थगन की नियमित समीक्षा हो, जिसका मकसद दबाव नहीं, कमी पहचानना हो। जमीन और उत्तराधिकार जैसे दीवानी विवादों पर खास ध्यान दिया जाए। और हर साल सार्वजनिक रिपोर्ट आए कि कितने मामले दायर हुए, कितने निपटे, कितने पुराने खत्म हुए और देरी की वजहें क्या रहीं। सफलता का पैमाना फाइल बंद होना नहीं, बल्कि नागरिक का वक्त और खर्च बचना और निष्पक्ष न्याय मिलना हो।

इसकी सबसे बड़ी कीमत आम आदमी चुकाता है। जमीन के लिए जूझता गरीब परिवार, संपत्ति विवाद का फैसला देखने को तरसता बुजुर्ग, मुआवजे की राह देखता हादसे का पीड़ित और मुकदमा झेलता विचाराधीन आरोपी, सबकी जिंदगी पर असर पड़ता है। खर्च सिर्फ फीस का नहीं होता, सफर, छुट्टी, दस्तावेज, इंतजार और मानसिक तकलीफ भी इसमें शामिल हैं।

निष्कर्ष यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था ने संविधान की रक्षा में बड़ी भूमिका निभाई है, पर सुधार लगातार जरूरी है। यह काम किसी एक संस्था के बस का नहीं। न्यायपालिका, सरकार, पुलिस, बार और नागरिक, सबको अपनी भूमिका निभानी होगी। रफ्तार बढ़ाने के नाम पर गुणवत्ता, निष्पक्षता और अधिकारों से समझौता नहीं होना चाहिए। निर्दोष को बचाना, दोषी को सजा, पीड़ित को न्याय और आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई, यही मकसद है।

न्याय सुधार को सरकारी योजना भर नहीं, नागरिक की गरिमा से जुड़ा राष्ट्रीय दायित्व समझना होगा, क्योंकि इंसाफ के इंतजार में बीतता हर साल किसी की उम्मीद तोड़ता है। न्याय तभी मायने रखता है जब वह निष्पक्ष, सुलभ, किफायती और वक्त पर मिले।

(लेखक : संजय अग्रवाल, सामाजिक चिंतक, नागपुर)

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