पुणे के लक्ष्मी रोड और कुमठेकर रोड पर त्योहारी रोशनी की चकाचौंध से खरीदारों को परेशानी
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लक्ष्मी रोड और कुमठेकर रोड पर दिवाली की सजावट की तेज एलईडी लाइट से लोगों की आंखों पर जोर पड़ रहा है। डॉक्टर और वन्यजीव स्वयंसेवक भी चिंता जता रहे हैं।
सेंट्रल पुणे के लोग पहले ही खराब हवा, गंदे पानी और लगातार शोर झेल रहे हैं। अब शहर के इस कारोबारी इलाके में एक और दिक्कत सामने आई है, और वो है लाइट पॉल्यूशन। बहुत तेज एलईडी लाइट, चुभने वाले डिस्प्ले बोर्ड और बिना शेड वाले सजावटी फिक्सचर अंधेरा होते ही बड़े हिस्से को तेज रोशनी में डुबो देते हैं। पुरानी सड़कों की खूबसूरती निखरने के बजाय चकाचौंध में दब जाती है। रहने वालों, खरीदारों और आने-जाने वालों की आंखें थक जाती हैं और चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती है।
यह दिक्कत सबसे ज्यादा लक्ष्मी रोड और कुमठेकर रोड पर दिखती है। पुणेकर 'अक्टूबर हीट' से जूझ रहे हैं और ठीक इसी वक्त यहां त्योहारी रोशनी की नई कतार चालू कर दी गई है।
लक्ष्मी रोड पर बेलबाग चौक से विजय टॉकीज तक करीब 700 से 1,000 मीटर के हिस्से में ऊंचाई पर चारों तरफ छोटी लाइटों की लगातार लड़ियां लगाई गई हैं। पूरा रास्ता जगमगा रहा है। लोगों का कहना है कि इतनी लंबी दूरी तक बिना रुके ऐसी रोशनी यहां पहले कभी नहीं देखी गई। कुमठेकर रोड पर चितले स्वीट मार्ट से खलकर तालीम तक ऐसा ही नजारा है। सूरज ढलने के बाद दोनों सड़कों पर रोशनी इतनी तेज होती है कि आंखें चौंधिया जाती हैं।
पुणे कैंप में रहने वाली और टीचर भारती चौधरी अक्सर लक्ष्मी रोड आती हैं। उनका कहना है कि इस दिवाली का अनुभव अलग है। उन्होंने कहा, "ज्यादा लाइटें आंखों पर जोर डालती हैं और बिजली बर्बाद करती हैं, और इतनी खपत से बिल ही बढ़ता है। लेकिन असली सवाल यह है कि इन लोगों को कनेक्शन कैसे मिला। क्या ये MSEDCL के खंभों से गैरकानूनी तरीके से बिजली ले रहे हैं? अधिकारियों को इसकी जांच करनी चाहिए।"
मोहम्मदवाड़ी की रहने वाली प्रणीता राजेशिर्के दिवाली की खरीदारी के लिए लक्ष्मी रोड पर थीं। उन्होंने कहा कि चकाचौंध में दोपहिया चलाना मुश्किल हो जाता है। उनके शब्दों में, "गर्म रंग की लाइटें अच्छी लगती हैं, लेकिन ज्यादा तेज लाइट आंखें थका देती है। चकाचौंध से आंखें चौंधिया जाती हैं और सामने दिखना बंद-सा हो जाता है, इसलिए यहां दोपहिया चलाना मुश्किल है।"
लक्ष्मी रोड की यह सजावट एक जानी-मानी कपड़े और टेलरिंग की दुकान ने अपने प्रचार के तौर पर लगाई लगती है। दुकान ने प्रचार को अपने शोरूम तक रखने के बजाय सार्वजनिक सड़क के लंबे हिस्से का इस्तेमाल किया है। नतीजा यह है कि त्योहारी सजावट अब कारोबारी प्रचार का भी काम कर रही है और सार्वजनिक जगह विज्ञापन के कैनवास की तरह इस्तेमाल हो रही है। दुल्या मारुति चौक से विजय टॉकीज और उससे आगे भी कई दुकानों में पहले से तेज विज्ञापन चल रहे हैं। सड़क के दोनों तरफ की रोशनी और ऊपर की नई लड़ियों ने चकाचौंध और बढ़ा दी है। गर्मी और भारी ट्रैफिक के साथ यह हिस्सा कुछ नागरिकों के लिए बेचैन करने वाला हो गया है। उम्मीद है कि ये लाइटें दिवाली खत्म होने तक जलती रहेंगी।
बाजारों में सजावट और दुकानों की रोशनी तेज होने से आंखों पर पड़ने वाला जोर अब सेहत की चिंता बन रहा है। वरिष्ठ डॉक्टर विनोद शहा ने बताया कि तेज रोशनी का असर किन पर सबसे ज्यादा पड़ता है। उन्होंने कहा, "बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि उम्र के साथ आंखें नाजुक हो जाती हैं। जिनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो चुका है, वे तेज रोशनी के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं और उन्हें यह बहुत परेशान कर सकती है।"
डॉ. शहा के मुताबिक जो लोग पहले से चश्मा लगाते हैं, उन्हें भी राहत नहीं मिलती, क्योंकि तेज रोशनी में बार-बार पलकें झपकानी पड़ती हैं और आंखों पर जोर पड़ता है। चौंधिया देने वाली रोशनी में आंखें खुली रखना मुश्किल होता है। यह दिक्कत सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं है। बच्चों की आंखों पर भी असर हो सकता है और माता-पिता को खास ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा, "दिवाली की खरीदारी के लिए बाजारों में भीड़ है, और दुकानों व सड़कों की तेज और चमकदार लाइटिंग आंखों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।" उनकी सलाह है कि जहां तक हो सके ऐसी तेज रोशनी से बचें, जरूरी एहतियात बरतें और आंखों पर जोर न पड़ने दें। उन्होंने कहा, "बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सबको इसे गंभीरता से लेना चाहिए।"
आम तौर पर दिवाली के साथ पहली सर्दी की ठंडक आती है, लेकिन इस बार वह गायब है। रहने वालों का कहना है कि यह इलाका शहर के बाकी हिस्सों से ज्यादा गर्म लगता है। इसमें लाइटों का कितना हाथ है, यह असल तापमान नापे बिना नहीं कहा जा सकता। लेकिन गर्मी का एहसास और तेज रोशनी से आंखों पर जोर, ये दोनों अलग समस्याएं हैं और दोनों पर ध्यान देना जरूरी है।
परिंदे भी इस रोशनी से बचे नहीं हैं। वन्यजीव स्वयंसेवकों का कहना है कि तेज रोशनी रात में सफर करने वाली प्रवासी प्रजातियों को भटका सकती है, टकराने का खतरा बढ़ा सकती है और घोंसले व नींद में खलल डाल सकती है। वन्यजीवों के रेस्क्यू और संरक्षण पर काम करने वाले NGO फेदर एंड फैंग्स, WAR ट्रस्ट के स्वयंसेवक अनिकेत कांबले ने कहा, "रात में प्रवास करने वाले कई पक्षी रास्ता ढूंढने के लिए चांद, तारों और प्राकृतिक रोशनी पर निर्भर रहते हैं। शहर की तेज रोशनी उन्हें भटका सकती है और उनके आम उड़ान मार्ग से हटा सकती है।" उनके मुताबिक तेज रोशनी पक्षियों को अपनी ओर खींच भी सकती है या इमारतों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल कर सकती है, जिससे कांच के अग्रभाग से टकराने का खतरा बढ़ता है।
कांबले ने यह भी कहा कि रात में पेड़ों पर बसेरा करने वाले पक्षियों का प्राकृतिक नींद का चक्र कृत्रिम रोशनी से बिगड़ सकता है। उल्लू जैसी रात में सक्रिय प्रजातियों पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा, "असर कितना होगा, यह रोशनी की तीव्रता, उसकी दिशा और प्रजाति पर निर्भर करता है।" उनके अनुसार घोंसले के पास लगातार तेज रोशनी रहने से कुछ पक्षियों के आराम और बर्ताव का तरीका भी बदल सकता है।
अब सवाल यह है कि इसका जवाब कौन देगा। यह रोशनी किसकी इजाजत से और किन शर्तों पर लगी? क्या नगर निगम ने सार्वजनिक सड़कों पर सजावटी और विज्ञापन वाली लाइटों की चमक, ऊंचाई या समय की कोई सीमा तय की है? क्या कोई शोर की तरह चकाचौंध भी नापेगा? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, सेंट्रल पुणे की सड़कें और चमकती रहेंगी, और वहां रहने और खरीदारी करने वाले लोग चकाचौंध में आंखें सिकोड़ते रहेंगे।
इसी बीच दिवाली से पहले के 'दूसरे आखिरी' रविवार का फायदा उठाते हुए पुणेकर त्योहारी खरीदारी के लिए लक्ष्मी रोड और कुमठेकर रोड पर उमड़ पड़े। परिवार सुबह से आने लगे और जल्द ही पूरा इलाका भर गया। कपड़े, साड़ियां, गहने, चप्पल-जूते, रंगोली का सामान और दीये सबसे ज्यादा बिके, और लक्ष्मी रोड किसी मेले जैसा दिख रहा था। दिवाली 5 नवंबर से शुरू हो रही है, इसलिए कई खरीदारों ने इसी रविवार को चुना। दिन भर परिवारों का आना जारी रहा और शाम को भीड़ और बढ़ गई, आसपास की गलियां भी खरीदारों से भर गईं। कई परिवारों ने एक ही चक्कर में त्योहार का पूरा सामान ले लिया।
उत्साह के साथ ट्रैफिक की अफरा-तफरी भी रही। लक्ष्मी रोड की ओर आने वाली सड़कों और गलियों में दोपहिया गाड़ियां बेतरतीब खड़ी थीं, और सदाशिव पेठ व नारायण पेठ से आने वाली गलियां जाम हो गईं। खरीदारों को आने-जाने में दिक्कत हुई और कई परेशान दिखे। ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ने के बावजूद लोग सामान देखने और खरीदने खुद पहुंचे, जिनमें महिलाएं खास तौर पर ज्यादा थीं। स्थानीय लोगों के मुताबिक भीड़ सुबह 10 बजे शुरू हुई और रात 10 बजे तक रही। गणेशोत्सव के दौर को छोड़ दें तो इस साल लक्ष्मी रोड पर यह सबसे बड़ी भीड़ थी।
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