माण तालुका में पानी का संकट गहराया, खरीफ गया, रब्बी पर खतरा, 30 टैंकर से सप्लाई
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बारिश और लौटते मानसून के धोखा देने से माण तालुका के कई गांवों में भूजल स्तर गिरा है और लोग पीने के पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर हैं।
दहिवडी : माण तालुका में इस साल बारिश ने मानसून की शुरुआत से ही हाथ खींच लिया था। किसानों की नजर लौटते मानसून पर टिकी थी, लेकिन उसने भी पीठ फेर ली। नतीजा यह है कि तालुका में पानी का संकट और गहराता जा रहा है। कई गांवों में भूजल स्तर नीचे चला गया है और लोगों को पीने के पानी के लिए टैंकरों के भरोसे रहना पड़ रहा है। फिलहाल तालुका के अलग-अलग गांवों में 30 टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है।
माण तालुका हमेशा से सूखा प्रभावित इलाका माना जाता है। दहिवडी, शिंगणापूर, म्हसवड, मार्डी, वरकुटे-मलवडी और वरकुटे कुकुडवाड समेत तालुका के कई गांवों को हर गर्मी में पानी की किल्लत झेलनी पड़ती है। इस साल बारिश बहुत कम और छिटपुट हुई। बारिश की मात्रा कम रहने और बीच में लंबे अंतराल पड़ने से पानी सप्लाई का सवाल गंभीर होने की आशंका है।
जलाशयों की हालत भी अच्छी नहीं है। तालुका के आंधळी बांध में 49 प्रतिशत पानी बचा है, जबकि राणंद तालाब में सिर्फ 0.2 प्रतिशत और जाशी तालाब में 2.53 प्रतिशत पानी है। तालाबों और दूसरे जल स्रोतों में पानी घटता जा रहा है, इसलिए आने वाले दिनों में किल्लत और तेज होने का डर जताया जा रहा है। तालाबों में पानी भले हो, पर उसके इस्तेमाल, बचे हुए स्टॉक और बढ़ती मांग को देखते हुए प्रशासन के सामने सप्लाई का नियोजन करना बड़ी चुनौती है।
पानी के साथ चारे का संकट
पानी की कमी के साथ-साथ जानवरों के चारे का सवाल भी गंभीर होता जा रहा है। बारिश न होने से हरे चारे की उपलब्धता घटी तो पशुपालकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए पानी और चारा, दोनों समस्याओं पर प्रशासन को वक्त रहते उपाय करने की जरूरत है।
उरमोडी और जिहे कटापूर योजना से बही माणगंगा
इस साल बहुत कम बारिश होने से माणगंगा नदी अपने आप नहीं बही। नदी को बहाने और पानी की किल्लत को देखते हुए जिहे कटापूर योजना का पानी आंधळी बांध से माणगंगा नदी में छोड़ा गया। उरमोडी योजना की नहर से आने वाला पानी लोधवडे, काळेवाडी, गोंदवले बुद्रुक, गोंदवले खुर्द और पिंपरी होते हुए माणगंगा में छोड़ा गया और नदी बहने लगी। इससे माणगंगा किनारे के इलाके में खेती की सिंचाई और पीने के पानी का सवाल हल हो गया था। अब नदी में छोड़ा गया यह पानी खत्म होने की कगार पर है। नदी पर बने कोल्हापुर पद्धति के बांध और सीमेंट के श्रृंखलाबद्ध बांध सूखने लगे हैं।
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