विदेशी जानवर पालने के बढ़ते चलन पर मुंबई के वन्यजीव विशेषज्ञों ने जताई चिंता
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वडाला के एक फ्लैट से 50 विदेशी पक्षी छुड़ाए जाने के बाद विशेषज्ञों ने कहा कि पालतू के तौर पर एक्सोटिक जानवरों की मांग से कई खतरे जुड़े हैं।
मुंबई के वडाला ईस्ट में हाल ही में एक फ्लैट से 50 विदेशी पक्षी छुड़ाए गए। फ्लैट में तिलचट्टे भरे हुए थे। इस घटना के बाद वन्यजीव विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि अनोखे जानवर पालने का शौक अक्सर उनकी बुनियादी जरूरतों पर भारी पड़ जाता है। रंग-बिरंगे तोते और विदेशी सरीसृप भले ही आकर्षक लगें, लेकिन उनकी खास देखभाल, उन्हें रखने के हालात और छोड़ दिए जाने पर पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की बात कम होती है।
यह कार्रवाई 18 अक्टूबर को हुई। ठाणे वन विभाग (टेरिटोरियल) की मुंबई रेंज ने एक वन्यजीव संरक्षण NGO की मदद से वडाला ईस्ट के भक्ति पार्क में एक घर की जांच की। शक था कि वहां विदेशी पक्षी गैरकानूनी तरीके से रखे जा रहे हैं। छुड़ाए गए पक्षियों में 18 सन कोन्यूर, तीन कॉकटील, 28 ग्रीन-चीक्ड कोन्यूर और एक पाइनएपल ग्रीन-चीक्ड कोन्यूर थे। वन विभाग ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत, जो 2022 में संशोधित हुआ, वन अपराध दर्ज किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चिंता सिर्फ एक मामले की नहीं है। असली सवाल पालतू के तौर पर विदेशी प्रजातियों की बढ़ती मांग का है। मुंबई के मानद वन्यजीव वार्डन और वन्यजीव संरक्षण NGO RAWW के अध्यक्ष एडवोकेट पवन शर्मा ने कहा, "विदेशी वन्यजीवों के व्यापार का काला पहलू एक बेहद पेचीदा संकट है। यह सिर्फ क्रूरता नहीं, बल्कि संगठित अपराध का परिष्कृत गिरोह है। विदेशी वन्यजीव खरीदकर, बेचकर या अदला-बदली करके लोग अनजाने में ऐसे अवैध नेटवर्क को पैसा देते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शांति के लिए खतरा हैं।"
शर्मा का संगठन वन विभाग के साथ मिलकर विदेशी जानवर पालने के जोखिमों पर जागरूकता फैला रहा है। उनके मुताबिक मांग बढ़ने से बिना नियम के ब्रीडिंग और बिक्री को भी बढ़ावा मिला है। उन्होंने जानवरों को उनके प्राकृतिक ठिकानों से पकड़ने और अनोखे रंग पाने के लिए उनके जीन से छेड़छाड़ करने के खिलाफ भी चेताया। ऐसे रंग-भेद को मॉर्फ कहा जाता है। शर्मा ने कहा कि खरीदारों को ऐसे वन्यजीवों को रखने और बेचने से जुड़े कानूनी नियम समझने चाहिए। कौन सा प्रावधान लागू होगा, यह प्रजाति, उसकी कानूनी स्थिति और उसे रखने या बेचने के हालात पर निर्भर करता है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम और उसके 2022 के संशोधनों में कुछ विदेशी प्रजातियों के नियमन और रिपोर्टिंग के प्रावधान जोड़े गए, जिनमें CITES में आने वाली प्रजातियां भी हैं। CITES लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यापार को लेकर बनी अंतरराष्ट्रीय संधि है।
शर्मा के मुताबिक असर मालिकों तक ही नहीं रुकता। जानवर बड़े हो जाएं, संभालना मुश्किल हो जाए या अंदाजे से ज्यादा देखभाल मांगने लगें, तो कुछ लोग उन्हें छोड़ देते हैं या जंगल में छोड़ आते हैं। ऐसे में बाहरी प्रजातियां अपनी आबादी बना लें, तो वे खाने और रहने की जगह के लिए स्थानीय प्रजातियों से होड़ करती हैं या स्थानीय पारिस्थितिकी में रोगाणु ले आती हैं। बताया गया है कि पवई झील में रेड-ईयर्ड स्लाइडर कछुए और एलिगेटर गार जैसी बाहरी प्रजातियां मौजूद हैं, जिससे स्थानीय कछुओं और मछलियों पर असर की आशंका है। शर्मा ने कहा, "बाहरी प्रजातियां ऐसे संक्रमण या बीमारियां ले जा सकती हैं जो स्थानीय वन्यजीवों में फैल सकती हैं। अगर कोई लाई गई प्रजाति किसी इकोसिस्टम में जम जाए, तो वह स्थानीय जानवरों से होड़ भी करती है और खाद्य श्रृंखला बिगाड़ सकती है।" उन्होंने चेताया कि अनचाहे विदेशी पालतू को जंगल या जलाशय में छोड़ देना उसे कैद में रखने का जिम्मेदाराना विकल्प नहीं है।
स्वतंत्र पशु चिकित्सक और RAWW की एसोसिएट पशु चिकित्सक डॉ. प्रीति साठे के मुताबिक सबसे बड़ी दिक्कत विदेशी पालतुओं के आकर्षण और उनकी देखभाल की समझ के बीच के फासले की है। उन्होंने कहा, "विदेशी प्रजातियां रखने में आसान दिखती हैं, पर लोग समझते नहीं कि कैद में उन्हें एनरिचमेंट, शारीरिक और अतिरिक्त जरूरतें और इलाज जैसी बहुत सारी देखभाल चाहिए।" साठे ने बताया कि जानवर का जीवन स्तर कई बातों पर टिका है: बाड़े का आकार और उसकी उपयुक्तता, एनरिचमेंट के मौके, खास खुराक, अतिरिक्त पोषण और सप्लीमेंट, और सही पशु चिकित्सा। उन्होंने कहा, "ज्यादातर पालतू मालिकों को अपने जानवरों की जरूरतें पता नहीं होतीं और वे वही करते हैं जो उनके लिए आसान हो।"
साठे ने यह भी बताया कि कुछ मालिक कानूनी जांच के डर से अपने विदेशी पालतू को डॉक्टर के पास नहीं ले जाते और खुद ही इलाज करते हैं। उनके शब्दों में, "कई लोग जानते हैं कि इन पालतुओं पर कानून लागू होते हैं, इसलिए वे वेट के पास जाने से बचते हैं और खुद इलाज करते हैं, जो पूरी तरह गैरकानूनी और अनैतिक है।" उनके मुताबिक इसका नतीजा लंबी तकलीफ, अधूरा इलाज और जानवर के जीवन स्तर में गिरावट हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बात खरीद से पहले शुरू होनी चाहिए। संभावित मालिकों को जानवर की उम्र, खुराक, जगह की जरूरत, व्यवहार की जरूरतें और खास पशु चिकित्सा की उपलब्धता समझनी चाहिए, और किसी भी प्रजाति को लाने से पहले लागू कानूनी नियम जांचने चाहिए।
कंजर्वेशन फिल्ममेकर त्रिशला अशोक ने कहा कि सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि जो जानवर घर में रखा जा सकता है, उसे पाला भी जा सकता है। उनके मुताबिक, "सोशल मीडिया ने विदेशी जानवर रखने को आम बना दिया है। हम लोगों को दुर्लभ जानवरों की अनबॉक्सिंग करते, उन्हें कपड़े पहनाते, वीडियो के लिए सरीसृप पकड़ते और वन्यजीवों को एक्सेसरी की तरह बरतते देखते हैं। पर्दे के पीछे क्या होता है, ये जानवर कहां से आते हैं, इनकी जिंदगी कैसी है और इनकी जरूरतें पूरी हो रही हैं या नहीं, यह हमें नहीं दिखता। इनमें से कई की तापमान, नमी, खुराक, जगह और व्यवहार को लेकर बहुत खास जरूरतें होती हैं। नीयत अच्छी हो तब भी लोग शायद न समझ पाएं कि दशकों तक इनकी देखभाल में क्या लगता है। और जब नयापन खत्म हो जाता है, तो कुछ को छोड़ दिया जाता है, सौंप दिया जाता है या सबसे बुरे हालात में जंगल में छोड़ दिया जाता है।"
अशोक ने कहा कि इस मांग का असर एक जानवर से कहीं आगे जाता है। "जब तक विदेशी वन्यजीवों का बाजार है, उन्हें सप्लाई करने वाले भी रहेंगे। यह मांग वन्यजीव तस्करी को हवा दे सकती है, जंगली आबादी पर दबाव डाल सकती है और बाहरी जानवरों के पर्यावरण में छोड़े जाने पर आक्रामक प्रजातियों को जमने का मौका दे सकती है।" उन्होंने यह भी कहा, "तोता सजावट की चीज नहीं है। बॉल पाइथन एक्सेसरी नहीं है। शुगर ग्लाइडर को स्वेटर नहीं चाहिए। ये जानवर हजारों साल में खास ठिकानों, व्यवहार और अनुकूलन के साथ विकसित हुए हैं। और कृपया, आजाद करने के भ्रम में किसी विदेशी जानवर को जंगल में कभी न छोड़ें। वह शायद बच न पाए, बीमारी फैला सकता है और आक्रामक प्रजाति बनकर स्थानीय वन्यजीवों को नुकसान पहुंचा सकता है।"
जानकारी के लिए: एक्जिम (EXIM) नीति के प्रावधानों के तहत वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और CITES में दर्ज जीवित जानवरों का आयात सख्ती से नियंत्रित है। वैध CITES एक्सपोर्ट परमिट, DGFT लाइसेंस, मुख्य वन्यजीव वार्डन और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEF&CC) की NOC और एनिमल क्वारंटीन सर्टिफिकेट के बिना ऐसे जानवरों का आयात प्रतिबंधित है। CITES के परिशिष्ट-I और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-IV में दर्ज प्रजातियों का व्यावसायिक व्यापार भी प्रतिबंधित है।
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