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वाडिया अस्पताल में पहली बार बच्चे का दिल बदला गया, 17 साल के तन्मय को मिली नई ज़िंदगी

मुंबई के बाई जेरबाई वाडिया हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन ने अपना पहला बच्चों का हार्ट ट्रांसप्लांट किया है।

वाडिया अस्पताल में पहली बार बच्चे का दिल बदला गया, 17 साल के तन्मय को मिली नई ज़िंदगी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मुंबई के बाई जेरबाई वाडिया हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन ने पहली बार किसी बच्चे का हार्ट ट्रांसप्लांट किया है। नवी मुंबई के घनसोली में रहने वाले 17 साल के तन्मय शिंदे को इससे नई ज़िंदगी मिली है। यह सर्जरी 6 अक्टूबर को की गई।

तन्मय को डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी की वजह से गंभीर हार्ट फेलियर हुआ था। इस कंडीशन में दिल की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं और खून पंप करने की उसकी क्षमता पर असर पड़ता है।

यह चैरिटेबल अस्पताल के लिए बड़ा पड़ाव है। उसे 2024 में कार्डियक ट्रांसप्लांट का लाइसेंस मिला था। ऑपरेशन बच्चों के कार्डियक सर्जन डॉ. बिस्वा पांडा की अगुवाई वाली टीम ने किया।

तन्मय की बीमारी का पता दिसंबर 2015 में चला था। दवा चलती रही और वह बार-बार अस्पताल में भर्ती भी हुआ, फिर भी उसकी हालत बिगड़ती गई। पिछले एक साल में लगातार सीने में दर्द, सांस फूलना और थकान ने उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और पढ़ाई पर बहुत बुरा असर डाला। इसी वजह से वह क्लास 12 की परीक्षा नहीं दे पाया।

आखिर में डॉक्टरों ने तय किया कि हार्ट ट्रांसप्लांट ही उसके इलाज का एकमात्र सही ऑप्शन है। तन्मय को 22 साल के एक ब्रेन-डेड डोनर का दिल मिला, जिसके परिवार ने ऑर्गन डोनेशन के लिए हाँ कर दी थी।

डोनर के दिल को ग्रीन कॉरिडोर की मदद से मुलुंड के फोर्टिस हॉस्पिटल से परेल के वाडिया हॉस्पिटल पहुँचाया गया। करीब 23.9 km का यह रास्ता लगभग 25 मिनट में तय हुआ। डोनर का दिल रुकने से लेकर तन्मय के सीने में लगाए गए दिल के धड़कने तक कुल समय लगभग तीन घंटे रहा। वार्ड में शिफ्ट होने से पहले तन्मय सात दिन इंटेंसिव केयर यूनिट में रहे।

उनकी माँ सुजाता शिंदे ने डोनर के परिवार का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें अपने अंग दान करने का वादा करने और दूसरों को भी ऑर्गन डोनेशन के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया।

तन्मय ठीक हो रहे हैं, लेकिन परिवार के सामने एक और मेडिकल चुनौती है। उनके 11 साल के भाई प्रणव को भी जेनेटिक हार्ट कंडीशन का पता चला है और उसे भी ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है।

हॉस्पिटल के आंकड़ों के मुताबिक वाडिया हॉस्पिटल में करीब 300 से 370 बच्चों का दिल की बीमारियों का इलाज चल रहा है। इनमें से करीब 20 को तुरंत हार्ट ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है। हॉस्पिटल ने ऑर्गन के लिए ज़ोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC) में और बच्चों को भी रजिस्टर किया है।

डॉ. पांडा ने बच्चों के ट्रांसप्लांट में सही डोनर हार्ट की कमी को बड़ी चुनौती बताया। कम्पैटिबिलिटी ब्लड ग्रुप, शरीर के साइज़ और डोनर ऑर्गन की मेडिकल कंडीशन जैसे फैक्टर्स पर निर्भर करती है। सही चाइल्ड डोनर कम मिलने से यह प्रोसेस और मुश्किल हो जाता है।

तन्मय के इलाज का खर्च करीब Rs 20 लाख आने का अनुमान था, जो परिवार की आर्थिक हैसियत से बाहर था। उनके पिता अशोक शिंदे BEST बस कंडक्टर के तौर पर काम करते हैं। डॉ. पांडा के मुताबिक अस्पताल और उसके सपोर्ट नेटवर्क ने, जिसमें क्राउडफंडिंग भी शामिल है, मेडिकल टेस्ट, ऑर्गन निकालने और ट्रांसपोर्टेशन, सर्जरी और ऑपरेशन के बाद की देखभाल का खर्च उठाया।

तन्मय का सफल ट्रांसप्लांट जान बचाने वाले इलाज का इंतज़ार कर रहे दूसरे बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है। लेकिन गंभीर हार्ट फेलियर से जूझ रहे ज़्यादा बच्चों की मदद के लिए ऑर्गन डोनेशन के बारे में ज़्यादा जागरूकता और सही डोनर ऑर्गन तक बेहतर पहुंच ज़रूरी है।

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