संजय गांधी नेशनल पार्क के ESZ में आठ प्रोजेक्ट मंज़ूर, 468 पेड़ कटेंगे
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महाराष्ट्र स्टेट वाइल्डलाइफ बोर्ड ने संजय गांधी नेशनल पार्क के एनवायरनमेंटली सेंसिटिव ज़ोन में आठ प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी है, जिनके लिए कुल 468 पेड़ काटे जाएंगे।
महाराष्ट्र स्टेट वाइल्डलाइफ बोर्ड ने मुंबई और ठाणे की सीमा से लगे संजय गांधी नेशनल पार्क के एनवायरनमेंटली सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) में आठ प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दे दी है। इन प्रोजेक्ट्स के लिए कुल 468 पेड़ काटे जाएंगे।
यह मंज़ूरी ऐसे वक़्त आई है, जब सरकार ने कड़े विरोध के बाद कर्जत में एक पावर प्रोजेक्ट के लिए 32,000 से ज़्यादा पेड़ काटने का प्रस्ताव कुछ समय के लिए रोक दिया है। दूसरी तरफ़, संजय गांधी नेशनल पार्क के एनवायरनमेंटली सेंसिटिव एरिया में डेवलपमेंट के कामों के लिए पेड़ काटने को हरी झंडी मिल गई है।
सबसे ज़्यादा 236 पेड़ ठाणे के मजीवडा में एक प्राइवेट रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए काटे जाएंगे। इस प्रोजेक्ट में 476 पेड़ रखे जाएंगे और 372 पेड़ फिर से लगाए जाएंगे।
कांदिवली में खटाऊ मिल साइट पर एक प्राइवेट रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए 228 पेड़ काटे जाएंगे और 92 पेड़ फिर से लगाए जाएंगे। वाइल्डलाइफ बोर्ड ने कहा है कि इस साइट पर पुरानी चॉल हैं, इसलिए उनका रीडेवलपमेंट ज़रूरी है। बोरीवली के देवीपाड़ा में स्लम रीडेवलपमेंट अथॉरिटी (SRA) के प्रोजेक्ट के लिए तीन पेड़ काटे जाएंगे, जबकि ठाणे के कवेसर में एक हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए एक पेड़ कटेगा।
बोर्ड ने विहार झील के पास IIM मुंबई के रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट को भी मंज़ूरी दी है। यह इंस्टीट्यूशन नेशनल पार्क की बाउंड्री से सिर्फ़ 530 मीटर दूर है और इसे 306 करोड़ रुपये की लागत से रेनोवेट किया जाएगा।
भायंदर में एक रेजिडेंशियल और कमर्शियल प्रोजेक्ट और ठाणे के कोलशेत के एक प्रोजेक्ट को भी हरी झंडी मिली है। कहा गया है कि इन दोनों प्रोजेक्ट से पेड़ों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। म्हाडा के रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट को भी मंज़ूरी मिल गई है, जो बोरीवली में एनवायरनमेंट के हिसाब से सेंसिटिव इलाके की सीमा पर है। बोर्ड ने साफ़ किया है कि संबंधित बिल्डिंग 35 साल से ज़्यादा पुरानी हैं और उन्हें रीडेवलपमेंट की ज़रूरत है।
कंस्ट्रक्शन के दौरान इंसानों या जंगली जानवरों को किसी भी तरह के खतरे से बचाने के लिए काम की जगह पर प्रोटेक्टिव बैरियर लगाने के निर्देश दिए गए हैं। एनवायरनमेंट के हिसाब से सेंसिटिव इलाकों में ब्लास्टिंग या पहाड़ों को काटने पर भी रोक लगा दी गई है।
हालांकि, इन प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने के लिए नेशनल वाइल्डलाइफ़ बोर्ड की मंज़ूरी भी ज़रूरी होगी।
इस फ़ैसले की पर्यावरणविद और NGO वनशक्ति के प्रतिनिधि डी. स्टालिन ने आलोचना की है। उनका कहना है, "इको-सेंसिटिव ज़ोन का कॉन्सेप्ट अब मज़ाक बन गया है। हालांकि इस ज़ोन का मकसद पर्यावरण की रक्षा करना है, लेकिन असल में रियल एस्टेट डेवलपमेंट को प्राथमिकता दी जा रही है।"
स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि मुंबई के हर अनअर्बनाइज़्ड इलाके को डेवलपमेंट के लिए तैयार किया जा रहा है। उनके मुताबिक नेशनल पार्क के कंज़र्वेशन एरिया को बढ़ाने के बजाय डेवलपमेंट को उसके चारों ओर लपेटा जा रहा है।
मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने खुद माना है कि शहर में मुआवज़े के तौर पर पेड़ लगाने के लिए काफ़ी जगह नहीं है। इसी पर स्टालिन ने साफ़ किया कि मुंबई में एक भी पेड़ काटना सही नहीं ठहराया जा सकता।
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