पनवेल कोर्ट ने चिंचवली फार्महाउस में चार हत्याओं के दो आरोपियों को सबूत न होने पर बरी किया
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करीब चौदह साल पहले चिंचवली के फार्महाउस में चार लोगों की हत्या हुई थी। पनवेल की अतिरिक्त सत्र अदालत ने जीवित बचे दोनों आरोपियों को सबूत की कमी बताकर बरी कर दिया।
चिंचवली के एक फार्महाउस में चार लोगों की हत्या को करीब चौदह साल हो चुके हैं। अब पनवेल की अतिरिक्त सत्र अदालत ने इस मामले के दो जीवित आरोपियों, 42 साल के रामदास गोविंद पाटिल और 59 साल के सुरेंद्रकुमार राजमणि शुक्ला को सबूत की कमी के आधार पर बरी कर दिया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संतोष आर चव्हाण ने अपने हालिया फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आपराधिक साजिश, हथियार की सप्लाई की कड़ी और हत्या, धोखाधड़ी व आर्म्स एक्ट के आरोपों में इन दोनों की भूमिका साबित नहीं कर पाया। इस केस के दो और सह-आरोपी, चंद्रकांत वाघमारे और संजय खुटले, मुकदमे के दौरान गुजर गए, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही खत्म कर दी गई।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक शिकायतकर्ता दत्तात्रय नागो पाटिल का चिंचवली में साढ़े तीन एकड़ का पाटिल फार्म है, जिसकी देखरेख चौकीदार लाडकू दुर्गे करता था। 10 नवंबर 2012 को दत्तात्रय ने जमीन के सौदों के सिलसिले में फार्म की चाबियां अपने चचेरे भाई रामदास पाटिल को दीं। तीन दिन बाद दत्तात्रय को रामदास का फोन आया। रामदास ने फोन एक अनजान मराठीभाषी आदमी को थमा दिया, जिसने जायदाद खरीदने में दिलचस्पी जताई।
अगले दिन रामदास का फोन बंद मिला तो परिवार ने चौकीदार के बेटे को फार्म पर देखने भेजा। वहां खून-खराबे का भयानक मंजर था। खबर मिलते ही दत्तात्रय के बेटे मौके पर दौड़े। खड़ी गाड़ियों के पास बाहर रामदास की लाश पड़ी थी, उन पर पत्थर से वार किए गए थे। हॉल के अंदर तीन और लोग, बालाराम टोपले, नितिन जोशी और प्रीतम घरत, मृत मिले। तीनों के सिर में गोली लगी थी।
जांच करने वालों का आरोप था कि मुख्य आरोपी वाघमारे ने "पैसों की बारिश" की एक स्कीम का झांसा देकर इन लोगों को बुलाया था। कहा गया कि एक लाख रुपये के करोड़ों बन जाएंगे, और उसने इन्हें फार्महाउस पर बड़ी रकम नकद लाने के लिए मना लिया। आरोप है कि हत्याओं से पहले वह रकम उसने अपने कब्जे में ले ली।
पुलिस का दावा था कि वाघमारे के बयान के आधार पर 2.99 लाख रुपये, कपड़े, एक मोटरसाइकिल और चाबियां बरामद हुईं। लेकिन अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष जीवित बचे आरोपियों को न इस ठगी की स्कीम से जोड़ सका और न हत्याओं से।
अभियोजन के केस का एक अहम हिस्सा देसी कट्टे के आरोपियों के बीच घूमने पर टिका था। राज्य का दावा था कि शुक्ला ने हथियार खुटले को दिया, खुटले ने रामदास गोविंद पाटिल को, और उन्होंने वह वाघमारे को सौंपा, जिसने हत्याएं कीं। अभियोजन की दलील थी कि वाघमारे की मौत के बावजूद जुटाए गए सबूत इन दोनों की भूमिका साबित करने के लिए काफी हैं। बचाव पक्ष ने कहा कि हथियार के लेन-देन या हत्याओं से इन दोनों को जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है और राज्य संदेह से परे अपना केस साबित नहीं कर पाया। अदालत ने सामग्री परखकर कहा कि हथियार के कथित लेन-देन की कड़ी साबित नहीं हुई, न ही हत्याओं में जीवित आरोपियों की संलिप्तता।
अभियोजन ने तीन गवाहों से पूछताछ कराई। शिकायतकर्ता दत्तात्रय पाटिल ने फार्महाउस, चाबियां सौंपने और लाशें मिलने के बारे में बताया। डॉ भूषण जैन ने पोस्टमॉर्टम किया था। जांच अधिकारी सुनील बजारे ने जांच और जब्तियों की जानकारी दी, जो मृत मुख्य आरोपी के कथित बयान से जुड़ी बताई गई थीं।
मेडिकल सबूत से साबित हुआ कि टोपले, जोशी और घरत की मौत सिर में गोली लगने से हुई, जबकि रामदास पाटिल की मौत पत्थर से लगी चोटों से हुई। फिर भी अदालत ने कहा कि मौतों का हत्या होना साबित होने भर से जीवित आरोपियों की संलिप्तता संदेह से परे साबित नहीं होती।
अदालत ने कहा कि दोनों के खिलाफ आईपीसी, आर्म्स एक्ट और मुंबई पुलिस एक्ट के आरोप साबित नहीं हुए और सीआरपीसी की धारा 235(1) के तहत दोनों को बरी कर दिया। उनके जमानत बॉन्ड रद्द कर दिए गए, पर धारा 437-ए के तहत हर एक को 50,000 रुपये का निजी बॉन्ड और जमानतदार देने को कहा गया, ताकि जरूरत पड़ने पर वे ऊपरी अदालत में हाजिर हो सकें।
पनवेल सिटी पुलिस के सीनियर पीआई बाला कुंभार ने कहा, "हम ऑर्डर की कॉपी देखेंगे और अपने पुलिस अभियोजक से सलाह करेंगे, उसके बाद ही मैं इस बारे में कुछ कह पाऊंगा।" डीसीपी (जोन तीन, पनवेल) रश्मि नांदेडकर ने कहा, "मुझे अभी कोर्ट का ऑर्डर नहीं मिला है। मैं उसे पढ़ूंगी और फिर आगे की कार्रवाई तय करूंगी।"
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