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दिंडोशी POCSO केस में तीन महिलाओं को बॉम्बे हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली

जुर्म PT24 अपराध डेस्क

हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न के आरोप मुख्य आरोपी पर हैं और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, इसलिए तीनों से हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिंडोशी पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में तीन महिलाओं को अग्रिम जमानत दे दी है। मामला बच्चों को यौन अपराधों से बचाने वाले कानून (POCSO) और दूसरे कानूनों के तहत दर्ज हुआ था। कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न के आरोप मुख्य रूप से मुख्य आरोपी के खिलाफ हैं और चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद इन आवेदकों से हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं है।

जस्टिस प्रफुल्ल एस खुबालकर ने 23 अक्टूबर 2026 को यह आदेश दिया। तीनों महिलाओं की अर्जी दिंडोशी पुलिस स्टेशन में 9 नवंबर 2025 को दर्ज केस से जुड़ी थी।

आदेश में दर्ज अभियोजन पक्ष की कहानी के मुताबिक FIR की जड़ एक कमरे के कब्जे को लेकर पक्षों के बीच चल रहा विवाद है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि 5 अप्रैल 2025 को झगड़ा हुआ। उस दौरान मुख्य आरोपी ने उन्हें और उनकी बेटी को गालियां दीं और अश्लील इशारे किए। शिकायत में यह भी आरोप है कि उसने बेटी के साथ यौन उत्पीड़न किया और शिकायतकर्ता के साथ भी मारपीट की। तीनों आवेदक महिलाएं आरोपी नंबर 2, 3 और 4 हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता को गालियां दीं और मुख्य आरोपी को उकसाया।

आवेदकों की तरफ से एडवोकेट महेश राजपोपट, अक्षित कोठारी और जैना शाह पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि महिलाओं को इस केस में मुख्य रूप से इसलिए फंसाया गया कि वे कथित तौर पर मौके पर मौजूद थीं। उनके मुताबिक इन महिलाओं ने इन अपराधों से जुड़ा कोई खास काम नहीं किया था।

बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि मुख्य आरोपी को हाईकोर्ट पहले ही 7 अगस्त 2026 को जमानत दे चुका है। आवेदकों की दलील थी कि FIR करीब सात महीने की देरी से दर्ज हुई और बेटी की विकलांगता वाले आरोप के पक्ष में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है। आदेश में दर्ज दलीलों के मुताबिक दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 92(b) के तहत लगा आरोप चार्जशीट दाखिल होते वक्त हटा दिया गया।

अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध किया। उसका कहना था कि FIR में ऐसे आरोप हैं जिनसे लगता है कि आवेदकों ने मुख्य आरोपी को उकसाया, जिस पर POCSO के तहत अपराध करने का आरोप है।

FIR और रिकॉर्ड के दस्तावेज देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि POCSO से जुड़े अपराधों के आरोप मुख्य रूप से आरोपी नंबर 1 के खिलाफ हैं। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि मामला एक कमरे के कब्जे को लेकर चल रहे दीवानी विवाद की पृष्ठभूमि में उठा है।

कोर्ट ने शर्त रखी कि अगर इस केस में इन महिलाओं को गिरफ्तार किया जाता है, तो हर एक को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही रकम के एक सॉल्वेंट जमानती पर रिहा कर दिया जाए। उन्हें जांच और ट्रायल में सहयोग करने का भी निर्देश दिया गया है। जांच एजेंसी जब भी बुलाए, उन्हें पुलिस स्टेशन में हाजिर होना होगा।

आवेदकों की ओर से पेश हुए एडवोकेट महेश राजपोपट, अक्षित कोठारी और जैना शाह ने कहा, "हम बॉम्बे हाईकोर्ट के शुक्रगुजार हैं कि उसने केस के तथ्यों और हालात को देखकर हमारे मुवक्किलों को अग्रिम जमानत दी। कोर्ट ने FIR दर्ज करने में सात महीने की देरी, पीड़ित की विकलांगता को साबित करने वाले सबूत की कमी, चार्जशीट दाखिल होने, इस मोड़ पर हिरासत में पूछताछ की जरूरत न होने और आवेदकों के जांच एजेंसी को सहयोग करने की बात दर्ज की।"

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